भारत की धरती विविध परंपराओं और उत्सवों की भूमि है, लेकिन बिहार का सूर्य षष्ठी व्रत, जिसे आम बोलचाल में छठ पर्व कहा जाता है, अपनी भव्यता और आध्यात्मिकता के लिए अद्वितीय है। यह पर्व भगवान सूर्य देव और माता षष्ठी की उपासना को समर्पित है। इस दिन महिलाएँ संतान की दीर्घायु, परिवार की समृद्धि और सुख-शांति की कामना करती हैं।
सूर्य षष्ठी व्रत का पौराणिक आधार
भारतीय संस्कृति में हर तिथि, हर पर्व के पीछे कोई न कोई पौराणिक कथा अवश्य जुड़ी होती है। जैसे गणेश जी की पूजा चतुर्थी तिथि को की जाती है, विष्णु भगवान की उपासना एकादशी को होती है, वैसे ही सूर्य देव की पूजा सप्तमी को करने की परंपरा है। लेकिन बिहार में सूर्य देव की पूजा षष्ठी तिथि को की जाती है, जो इस प्रदेश की एक अनोखी विशेषता है।
🌼 प्रकृति और षष्ठी देवी का संबंध
श्वेताश्वतर उपनिषद में कहा गया है कि सृष्टि की जननी प्रकृति ही परमात्मा की माया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में उल्लेख मिलता है कि सृष्टि रचना के समय परमात्मा ने स्वयं को दो भागों में विभक्त किया — एक भाग से पुरुष (शक्ति) और दूसरे से प्रकृति (सृष्टि) का जन्म हुआ।
प्रकृति ने अपने पाँच स्वरूपों को जन्म दिया — दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री। इन्हीं में से एक रूप है देवसेना देवी, जो सभी बालकों की रक्षक मानी जाती हैं। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन्हें षष्ठी देवी कहा गया।
षष्ठी देवी की कथा: जीवन देने वाली माता
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, प्रथम मनु स्वायम्भुव के पुत्र प्रियव्रत को संतान नहीं थी। उन्होंने महर्षि कश्यप से उपाय पूछा। ऋषि ने उन्हें पुत्रेष्टि यज्ञ करने का परामर्श दिया। यज्ञ के बाद रानी मालिनी ने पुत्र को जन्म दिया, परंतु वह शिशु मृत था।
राजा प्रियव्रत दुःख से व्याकुल हो उठे। तभी आकाश से एक दिव्य विमान उतरा, जिसमें षष्ठी देवी विराजमान थीं। उन्होंने मृत शिशु को स्पर्श किया, और वह जीवित हो गया। देवी ने कहा —
“मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री षष्ठी हूँ, जो अपुत्रों को पुत्र प्रदान करती हूँ।”
राजा ने देवी की आज्ञा से हर महीने की शुक्ल षष्ठी को देवी की पूजा आरंभ की। तभी से यह पर्व लोक में “षष्ठी पूजन” या “छठी” के रूप में प्रचलित हुआ।
सूर्य षष्ठी व्रत की उत्पत्ति
भविष्य पुराण और स्कंद पुराण दोनों में षष्ठी व्रत का उल्लेख मिलता है। परंतु बिहार की परंपरा में यह व्रत सूर्य देव की उपासना के साथ मनाया जाता है।
मैथिल ग्रंथ वर्षकृत्यविधि में इसे प्रतिहार षष्ठी कहा गया है। प्रतिहार का अर्थ होता है “चमत्कार करने वाला” — अर्थात यह व्रत भक्तों की मनोकामना पूरी करने में सक्षम है।
सूर्य षष्ठी व्रत विधि
🔹 व्रत का प्रारंभ
व्रत की शुरुआत पंचमी तिथि से होती है। इस दिन व्रती केवल एक बार भोजन करता है और संयमपूर्वक व्यवहार रखता है।
🔹 षष्ठी के दिन
व्रती पूर्ण रूप से निराहार रहता है।
दोपहर में नदी या तालाब के तट पर जाकर पूजा की जाती है।
भगवान सूर्य को लाल चंदन, लाल पुष्प, फल और घृत से बने पकवान अर्पित किए जाते हैं।
भक्त सूर्य की ओर मुख कर हाथ जोड़कर अर्घ्य देते हैं और लोकगीत गाते हैं।
“रक्तचंदन सम्मिश्रं, रक्तपुष्पाक्षतान्वितम्।”
🔹 पूजा का महत्व
षष्ठी देवी की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उनका पूजन किया जाता है। अगली सुबह पुनः पूजा कर देवी का विसर्जन किया जाता है।
बिहार में सूर्य षष्ठी का लोक रूप
बिहार में सूर्य षष्ठी व्रत सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था का उत्सव है। संध्या के समय जब महिलाएँ सूप और डलिया में दीप जलाकर घाट की ओर जाती हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।
ठेकुआ: प्रसाद का विशेष स्थान
इस पर्व का प्रमुख प्रसाद ठेकुआ होता है, जो आटे, गुड़ और घी से बनता है। ठेकुए पर लकड़ी के साँचे से सूर्य देव के रथ का चक्र उकेरा जाता है।
अर्घ्य का दृश्य
संध्या और प्रातःकालीन अर्घ्य का दृश्य अवर्णनीय होता है। जब उगते सूर्य की पहली किरण जल में झिलमिलाती है, तब हर व्रती की आँखों में श्रद्धा और आँसुओं का संगम होता है।
सूर्य और षष्ठी की संयुक्त उपासना
सूर्य देव प्रत्यक्ष देवता हैं — जो जीवन, प्रकाश और ऊर्जा के दाता हैं। वहीं माता षष्ठी संतान की रक्षिका हैं। दोनों की संयुक्त आराधना से भक्त को संतान-सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होती है।
बिहार के लोकगीतों में भी यही भावना झलकती है —
“काहे लागी पूजेलू तुहूं देवल घरवा हे,
पुत्र लागी करिहं हम छठी के बरतिया हे।”
यह गीत बताता है कि भक्ति सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि मातृत्व की गहराई से जुड़ी भावना है।
निष्कर्ष
सूर्य षष्ठी व्रत सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के मधुर संबंध का प्रतीक है। यह पर्व सिखाता है कि जब मनुष्य श्रद्धा, संयम और सेवा की भावना से पूजा करता है, तो प्रकृति स्वयं उसकी रक्षा करती है।
इस प्रकार सूर्य षष्ठी, सूर्य की तेजस्विता और माता षष्ठी के वात्सल्य का संगम है — जहाँ भक्ति और मातृत्व, दोनों एकाकार हो जाते हैं। #सूर्यषष्ठीव्रत #सूर्यदेवकीपूजा #छठव्रतकामहत्व #सूर्यउपासना #कार्तिकषष्ठी #छठमइया #सनव्रत #हिंदूत्योहार #आध्यात्मिकजीवन #भक्ति_भावना #सनातनसंस्कृति #सूर्यअर्चना #पौराणिकव्रत #धार्मिकव्रत #सूर्यभक्ति #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami
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