Monday, February 02, 2026

महर्षि याज्ञवल्क्य जयंती: आत्मज्ञान की याद दिलाने वाला दिन

 हमारे जीवन में कुछ तिथियाँ सिर्फ कैलेंडर की तारीख नहीं होतीं, वे हमें भीतर की ओर देखने का अवसर देती हैं। 22 फरवरी 2026 को आने वाली महर्षि याज्ञवल्क्य जयंती भी ऐसी ही एक तिथि है। यह दिन किसी उत्सव या शोर-शराबे का नहीं, बल्कि शांति, स्मरण और आत्मचिंतन का दिन है।

आज के भागदौड़ भरे समय में, जब हर उत्तर बाहर खोजा जा रहा है, तब महर्षि याज्ञवल्क्य हमें याद दिलाते हैं कि असली उत्तर तो भीतर छिपा है।

महर्षि याज्ञवल्क्य कौन थे?

एक ऋषि, जो प्रश्न पूछने से नहीं डरते थे

महर्षि याज्ञवल्क्य वैदिक काल के ऐसे ऋषि थे, जिनकी पहचान सिर्फ शास्त्र-ज्ञान से नहीं, बल्कि निर्भीक प्रश्नों और गहरे उत्तरों से होती है। वे परंपरा का सम्मान करते थे, लेकिन आँख मूँदकर कुछ भी स्वीकार करना उनके स्वभाव में नहीं था।

कहते हैं, वे जहाँ जाते थे, वहाँ संवाद होता था। बहस नहीं, बल्कि संवाद… जिसमें सत्य को खोजा जाता था। उनका जीवन यह सिखाता है कि अध्यात्म का अर्थ दुनिया छोड़ देना नहीं, बल्कि दुनिया में रहते हुए सच को पहचानना है।

शुक्ल यजुर्वेद और उपनिषदों की रोशनी

ज्ञान जो आज भी रास्ता दिखाता है

महर्षि याज्ञवल्क्य को शुक्ल यजुर्वेद से जोड़ा जाता है। लेकिन आम साधक के लिए उनका सबसे बड़ा उपहार है — बृहदारण्यक उपनिषद्

इस उपनिषद् में आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष की बातें इतनी सहज भाषा में कही गई हैं कि आज भी पढ़ते समय ऐसा लगता है, जैसे कोई सामने बैठकर समझा रहा हो। “नेति-नेति” का सिद्धांत — यानी यह नहीं, वह नहीं — हमें सिखाता है कि सत्य को किसी एक परिभाषा में बाँधा नहीं जा सकता।

कभी-कभी लगता है, हम सब चीज़ों को नाम देना चाहते हैं, टैग लगाना चाहते हैं। याज्ञवल्क्य कहते हैं, थोड़ा रुकिए… सब कुछ नाम से परे भी है।

मैत्रेयी संवाद: जब वैराग्य बोलता है

संबंधों के बीच आत्मज्ञान

महर्षि याज्ञवल्क्य का जीवन यह भी दिखाता है कि ज्ञान सिर्फ वन में नहीं मिलता। वे गृहस्थ थे, लेकिन भीतर से पूर्ण वैरागी। मैत्रेयी के साथ उनका संवाद आज भी हृदय को छू जाता है।

वे स्पष्ट कहते हैं कि पति, पत्नी, धन या संसार किसी के लिए प्रिय नहीं होते, प्रिय तो आत्मा होती है। यह सुनने में कठोर लगता है, लेकिन भीतर उतर जाए तो बड़ा सुकून देता है। शायद इसी वजह से यह संवाद आज भी उतना ही सजीव है।

राजा जनक और आत्मज्ञान की परीक्षा

जब राजसभा में ब्रह्म बोला

मिथिला के राजा जनक के दरबार में हुआ याज्ञवल्क्य का संवाद बहुत प्रसिद्ध है। वहाँ उन्होंने यह साबित किया कि सच्चा ज्ञान पद, प्रतिष्ठा या वेश से नहीं पहचाना जाता।

कई विद्वान थे, बड़े-बड़े नाम थे, लेकिन याज्ञवल्क्य का आत्मविश्वास किसी अहंकार से नहीं, अनुभव से भरा था। यह बात मन को छूती है कि सच्चा ज्ञानी शांत होता है, ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता।

आज के समय में याज्ञवल्क्य क्यों ज़रूरी हैं?

थोड़ी शांति, थोड़ा ठहराव

आज हम बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन खुद को नहीं जानते। महर्षि याज्ञवल्क्य की शिक्षाएँ हमें धीमा होने को कहती हैं। मोबाइल एक तरफ रखकर, दो पल चुप बैठने को कहती हैं।

उनका संदेश है —
कम जोड़ो, ज्यादा समझो।
बाहर नहीं, भीतर देखो।

जयंती कैसे मनाएँ?

सरल, शांत और सच्चे तरीके से

महर्षि याज्ञवल्क्य जयंती (22 फरवरी 2026) पर किसी बड़े आयोजन की ज़रूरत नहीं।

  • थोड़ा स्वाध्याय कर लें

  • उपनिषद् की कोई पंक्ति पढ़ लें

  • या बस मौन में बैठकर खुद से पूछ लें — मैं कौन हूँ?

शायद यही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।

अंत में…

महर्षि याज्ञवल्क्य कोई इतिहास की किताब में बंद नाम नहीं हैं। वे आज भी हमारे सवालों में जीवित हैं। जब भी मन उलझे, जब भी उत्तर न मिले, उन्हें याद कर लेना।

कभी-कभी उत्तर तुरंत नहीं मिलता… और शायद वही ठीक है। #महर्षि_याज्ञवल्क्य #YajnavalkyaJayanti #आत्मज्ञान #भारतीय_ऋषि #VedanticWisdom #Upanishad #SpiritualIndia #सनातन_धर्म #SelfRealization #AncientWisdom #हिंदू_दर्शन #BrahmaGyan #ऋषि_परंपरा #SpiritualJourney #IndianPhilosophy #SanatanDharma #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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श्री रामकृष्ण परमहंस जयंती 2026: जीवन बदल देने वाली शिक्षाएँ

 कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिन्हें याद करने के लिए कोई विशेष दिन नहीं चाहिए। वे हमारी सांसों, सोच और भीतर की चुप्पी में पहले से मौजूद रहते हैं। रामकृष्ण परमहंस ऐसे ही संत थे। फिर भी, उनकी जयंती आती है तो मन अपने आप थोड़ा रुक जाता है, भीतर झांकने लगता है।

19 फरवरी 2026, यह दिन केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन का निमंत्रण है। ऐसा लगता है जैसे गुरु पूछ रहे हों – “तू भीतर गया या अब भी बाहर ही भटक रहा है?”


श्री रामकृष्ण परमहंस का अवतरण : साधारण देह, असाधारण चेतना

रामकृष्ण परमहंस का जीवन बाहर से देखने पर बहुत साधारण लगता है। न कोई विद्वता का दिखावा, न तर्कों की लंबी कतारें। लेकिन भीतर… भीतर तो जैसे पूरा ब्रह्मांड जाग रहा था।
बचपन से ही उनके स्वभाव में एक अलग सी पवित्रता थी। खेत में काम करते हुए, मंदिर में सेवा करते हुए, कभी-कभी अचानक समाधि में चले जाना — यह सब उनके लिए असामान्य नहीं था, बल्कि सहज था।

ईश्वर उनके लिए कल्पना नहीं, अनुभव था

वे ईश्वर के बारे में बोलते नहीं थे, ईश्वर में रहते थे। यही कारण है कि उनकी बातें सीधे दिल को छूती हैं, दिमाग को नहीं।

भक्ति और साधना : रास्ता नहीं, डूब जाना

रामकृष्ण परमहंस की साधना किसी एक परंपरा में बंधी नहीं थी। उन्होंने मां काली की उपासना की, वैष्णव भक्ति को जिया, अद्वैत का अनुभव किया, इस्लाम और ईसाई मत के मार्ग पर भी चले।
और अंत में वही कहा जो आज भी उतना ही सटीक है —
“जितने मत, उतने पथ।”

हर रास्ता उसी एक की ओर

उनके लिए धर्म बहस का विषय नहीं था। धर्म तो अनुभव था।
वे कहते थे — जैसे तालाब तक पहुंचने के कई रास्ते होते हैं, लेकिन पानी एक ही होता है।
आज के समय में, जब धर्म अक्सर दूरी पैदा करता है, यह बात और भी जरूरी लगती है।

गुरु और शिष्य : एक दीप से दूसरा दीप

रामकृष्ण परमहंस केवल साधक नहीं थे, वे गुरु थे। और सच्चा गुरु वही होता है जो शिष्य को खुद से आगे भेज दे।
उनके जीवन में स्वामी विवेकानंद का आना कोई संयोग नहीं था। वह तो जैसे तय था।
गुरु ने शिष्य को संसार की ओर भेजा और कहा — “जाओ, पहले मनुष्य बनो।”

अध्यात्म का मतलब पलायन नहीं

रामकृष्ण की दृष्टि में अध्यात्म जीवन से भागना नहीं था।
घर में रहो, काम करो, लेकिन मन ईश्वर में रखो — बस यही साधना है।

आज के जीवन में रामकृष्ण परमहंस की बात

आज हम बहुत तेज दौड़ रहे हैं। मोबाइल, काम, चिंता, तुलना… सब कुछ है, बस शांति नहीं।
रामकृष्ण परमहंस कहते थे —

“शांति बाहर नहीं, भीतर मिलती है।”

छोटे-छोटे अभ्यास

  • हर दिन कुछ पल चुप बैठना

  • नाम-स्मरण, बिना दिखावे

  • अहंकार को थोड़ा ढीला करना

  • और सबसे जरूरी — अपने आप से ईमानदार रहना

यही उनकी साधना का सार था। कोई भारी नियम नहीं, कोई कठिन विधि नहीं।

श्री रामकृष्ण परमहंस जयंती : सिर्फ याद करने का दिन नहीं

19 फरवरी 2026 को जयंती मनाते समय अगर हम सिर्फ फूल चढ़ाकर लौट आए, तो शायद कुछ छूट जाएगा।
यह दिन पूछता है —
क्या हम भी थोड़ा सरल हो पाए?
क्या हम भी भीतर देखने का साहस कर पाए?

गुरु कभी जाता नहीं

देह चली जाती है, लेकिन चेतना नहीं।
रामकृष्ण परमहंस आज भी जीवित हैं —
किसी की भक्ति में,
किसी की आंखों के आंसू में,
और किसी की खामोशी में।

उपसंहार : एक व्यक्ति नहीं, एक अवस्था

रामकृष्ण परमहंस कोई इतिहास का नाम नहीं हैं। वे एक अवस्था हैं — जहां प्रेम है, सरलता है और ईश्वर सजीव है।
उनकी जयंती पर यही कामना है कि हम थोड़ा कम बोलें, थोड़ा ज्यादा महसूस करें।
शायद यही सच्ची श्रद्धांजलि है। 🌼

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फाल्गुनी अमावस्या 2026: पितरों के लिए सबसे पावन दिन

 हमारे सनातन धर्म में हर तिथि का अपना एक अलग महत्व होता है, लेकिन कुछ तिथियां ऐसी होती हैं जो सीधे आत्मा और पितरों से जुड़ी होती हैं। उन्हीं में से एक है फाल्गुनी अमावस्या। साल 2026 में यह पावन तिथि 17 फरवरी 2026 को पड़ रही है, और इस दिन का धार्मिक महत्व सामान्य अमावस्या से कहीं ज्यादा माना गया है।

फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को शास्त्रों में विशेष फल देने वाली तिथि कहा गया है। खासकर लिंगपुराण में इस दिन के व्रत, पूजा और श्राद्ध की महिमा विस्तार से मिलती है।




लिंगपुराण में फाल्गुनी अमावस्या का महत्व

लिंगपुराण के अनुसार फाल्गुनी अमावस्या के दिन भगवान रुद्र, अग्निदेव और ब्राह्मणों का पूजन करना चाहिए। इस दिन उन्हें उड़द, दही, पूरी जैसे सात्त्विक भोजन का नैवेद्य अर्पित करना शुभ माना गया है।

साथ ही यह भी कहा गया है कि व्यक्ति को स्वयं भी इसी तरह का सादा और सात्त्विक भोजन केवल एक बार करना चाहिए। ऐसा करने से शरीर और मन दोनों शुद्ध रहते हैं और पूजा का फल भी कई गुना बढ़ जाता है।

विशेष योग: सूर्यग्रहण से भी बड़ा फल

शास्त्रों में एक श्लोक आता है, जिसका अर्थ बहुत ही गहरा है। उसमें कहा गया है कि यदि अमावस्या सोमवार, मंगलवार, गुरुवार या शनिवार को पड़े, तो वह अमावस्या सामान्य नहीं रहती, बल्कि उसे पुष्कर पर्व कहा जाता है।

ऐसी अमावस्या का फल सौ सूर्यग्रहणों से भी अधिक बताया गया है। यानी इस दिन किया गया दान, जप और श्राद्ध जीवन भर का पुण्य दे सकता है।

आज के समय में हम लोग सूर्यग्रहण का इंतजार करते हैं, लेकिन शास्त्र बताते हैं कि कुछ अमावस्याएं उनसे भी ज्यादा शक्तिशाली होती हैं।

फाल्गुनी अमावस्या और युग का प्रारंभ

एक मान्यता यह भी है कि फाल्गुनी अमावस्या के दिन ही युग का प्रारंभ हुआ था। इसी कारण इस तिथि को पितरों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

इस दिन विशेष रूप से अपिंड श्राद्ध करने का विधान बताया गया है। अपिंड श्राद्ध उन पितरों के लिए किया जाता है जिनका विधिवत श्राद्ध किसी कारण से नहीं हो पाया हो या जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो।

पितरों के लिए क्या करें इस दिन?

अगर सरल शब्दों में कहें तो इस दिन ज्यादा बड़े कर्मकांड की जरूरत नहीं है। बस भाव होना चाहिए।

  • सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें

  • भगवान शिव या रुद्र का स्मरण करें

  • गाय, कुत्ता, कौआ और जरूरतमंद को भोजन दें

  • ब्राह्मण को यथाशक्ति दान करें

  • अपने पितरों का नाम लेकर जल अर्पण करें

इतना सा करने से भी पितरों की आत्मा को शांति मिलती है, ऐसा माना जाता है।

आज के समय में इसका मतलब क्या है?

आज हम सब बहुत बिजी हो गए हैं। मोबाइल, काम, जिम्मेदारियां… इन सब में हम अपने पूर्वजों को शायद याद ही नहीं करते। लेकिन सच यही है कि हम जो कुछ भी हैं, उन्हीं की वजह से हैं।

फाल्गुनी अमावस्या जैसे दिन हमें थोड़ा रुककर सोचने का मौका देते हैं —
कि हम सिर्फ अपने लिए नहीं जी रहे, हम एक परंपरा का हिस्सा हैं।

17 फरवरी 2026 को आने वाली फाल्गुनी अमावस्या सिर्फ एक तिथि नहीं है, बल्कि एक मौका है —
अपने पितरों को याद करने का,
उनके लिए प्रार्थना करने का,
और अपने जीवन को थोड़ा सा और पवित्र बनाने का।

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महाशिवरात्रि 2026: क्यों सबसे पावन है फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की यह रात्रि?

  यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मा को भीतर से झकझोर देने वाली साधना की रात्रि है।

ऐसी रात्रि जब शिव केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि साधक के मन में प्रकट होते हैं।



महाशिवरात्रि कब और क्यों मनाई जाती है?

महाशिवरात्रि का व्रत फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि यह व्रत अर्धरात्रि में आने वाली चतुर्दशी में ही करना चाहिए।

इस वर्ष 15 फरवरी को यह पावन तिथि पड़ रही है, और यही कारण है कि यह दिन साधकों के लिए अत्यंत विशेष माना जा रहा है।

चाहे चतुर्दशी पूर्वा हो या परा, जिस तिथि में आधी रात आती है — वही शिवरात्रि होती है।
यही शास्त्रसम्मत नियम है, और यही परंपरा।

चतुर्दशी तिथि का शिव से क्या संबंध है?

ज्योतिष के अनुसार हर तिथि का एक देवता होता है।
चतुर्दशी तिथि के स्वामी स्वयं भगवान शिव हैं।

इसी कारण यह रात्रि शिव को अत्यंत प्रिय है।
रात्रि + चतुर्दशी = शिवरात्रि

हर महीने की कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि आती है, लेकिन फाल्गुन मास की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है।
क्योंकि मान्यता है कि इसी रात्रि को शिवलिंग स्वरूप में ज्योति का प्राकट्य हुआ था।

क्या महाशिवरात्रि सभी कर सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल।
यह व्रत किसी एक वर्ग, जाति या उम्र के लिए सीमित नहीं है।

  • स्त्री या पुरुष

  • बालक या वृद्ध

  • गृहस्थ या सन्यासी

सबके लिए यह व्रत समान रूप से फलदायी है।
शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा गया है कि इस व्रत को न करने से जीवन में सूक्ष्म दोष भी लग सकता है।

महाशिवरात्रि व्रत का असली महत्व

शिवपुराण में स्पष्ट लिखा है कि शिवरात्रि व्रत से
भोग भी मिलता है और मोक्ष भी।

यानी संसार भी और उससे मुक्ति भी।
ऐसा संतुलन बहुत कम व्रतों में देखने को मिलता है।

कहा गया है कि मोक्ष की चाह रखने वाले साधक को चार बातों का पालन करना चाहिए:

  1. शिव की उपासना

  2. शिव मंत्रों का जप

  3. उपवास

  4. वैराग्य भाव

इन सबमें महाशिवरात्रि व्रत का स्थान सबसे ऊँचा है।

शिव की पूजा रात्रि में ही क्यों होती है?

यह प्रश्न अक्सर मन में आता है।
जब बाकी देवताओं की पूजा दिन में होती है, तो शिव की रात्रि में क्यों?

उत्तर बहुत गहरा है।

भगवान शिव तमोगुण के अधिष्ठाता हैं।
रात्रि स्वयं तमोगुण का प्रतीक है।

रात्रि आते ही:

  • प्रकाश समाप्त होता है

  • कर्म रुकते हैं

  • मन शांत होता है

पूरा संसार जैसे थोड़ी देर के लिए “ठहर” जाता है।
और यही शिव का समय है।

कृष्ण पक्ष और शिवरात्रि का रहस्य

कृष्ण पक्ष में चंद्रमा क्षीण होता जाता है।
चंद्रमा मन का स्वामी माना गया है।

जैसे-जैसे चंद्र क्षीण होता है,
वैसे-वैसे मन में भ्रम, डर और नकारात्मकता बढ़ती है।

इसी समय शिव की पूजा इसलिए की जाती है ताकि
मन की इन तामसिक वृत्तियों पर नियंत्रण पाया जा सके।

यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि गहरी मनोवैज्ञानिक समझ है।

उपवास और रात्रि जागरण क्यों जरूरी है?

उपवास केवल भूखा रहना नहीं है।
यह इंद्रियों को साधने का तरीका है।

गीता कहती है —
जो रात्रि सबके लिए सोने का समय है,
वही संयमी के लिए जागने का समय है।

शिव से मिलने के लिए
नींद नहीं, जागरण चाहिए।

महाशिवरात्रि की सरल पूजन विधि

हर व्यक्ति बड़े अनुष्ठान नहीं कर सकता, और यह ठीक भी है।
शिव भाव देखते हैं, दिखावा नहीं।

  • सुबह स्नान कर शिव का स्मरण करें

  • दिन भर मन में “नमः शिवाय” जपते रहें

  • रात्रि में दीप जलाकर शिवलिंग या चित्र के सामने बैठें

  • संभव हो तो उपवास रखें, नहीं तो फलाहार

बस इतना ही काफ़ी है।

एक छोटी-सी कथा, जो सब कुछ कह देती है

कहा जाता है कि एक चोर शिवरात्रि की रात मंदिर में छिपा रहा।
डर के कारण वह पूरी रात जागता रहा, भूखा रहा।

उसे पता भी नहीं था कि उससे अनजाने में व्रत हो गया।
और उसी कारण शिव ने उसे सद्गति दे दी।

शिव भाव देखते हैं, योग्यता नहीं।

महाशिवरात्रि का संदेश

शिव विरोधों का संतुलन हैं।

  • गृहस्थ होकर भी विरक्त

  • विष पीकर भी विष से मुक्त

  • उग्र होकर भी करुणामय

उनका शिवलिंग निराकार ब्रह्म का प्रतीक है।
जैसे गणित में शून्य — खुद कुछ नहीं, फिर भी सब कुछ।

शिव सिखाते हैं —
सह-अस्तित्व, संतुलन और करुणा।

अंत में…

15 फरवरी की यह महाशिवरात्रि
सिर्फ एक तिथि नहीं है।
यह अपने भीतर झाँकने का अवसर है।

अगर इस रात
आपने थोड़ी-सी भी शांति पा ली,
तो समझिए शिव ने आपको स्वीकार कर लिया।

हर हर महादेव 🙏 #महाशिवरात्रि #Mahashivratri2026 #15फरवरी #ShivBhakti #हरहरमहादेव #LordShiva #ShivratriVrat #ShivPuran #सनातनधर्म #HinduFestivals #SpiritualIndia #ShivUpasana #IndianCulture #BhaktiBlog #DevotionalContent #SanatanDharma #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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