हमारे जीवन में कुछ तिथियाँ सिर्फ कैलेंडर की तारीख नहीं होतीं, वे हमें भीतर की ओर देखने का अवसर देती हैं। 22 फरवरी 2026 को आने वाली महर्षि याज्ञवल्क्य जयंती भी ऐसी ही एक तिथि है। यह दिन किसी उत्सव या शोर-शराबे का नहीं, बल्कि शांति, स्मरण और आत्मचिंतन का दिन है।
आज के भागदौड़ भरे समय में, जब हर उत्तर बाहर खोजा जा रहा है, तब महर्षि याज्ञवल्क्य हमें याद दिलाते हैं कि असली उत्तर तो भीतर छिपा है।
महर्षि याज्ञवल्क्य कौन थे?
एक ऋषि, जो प्रश्न पूछने से नहीं डरते थे
महर्षि याज्ञवल्क्य वैदिक काल के ऐसे ऋषि थे, जिनकी पहचान सिर्फ शास्त्र-ज्ञान से नहीं, बल्कि निर्भीक प्रश्नों और गहरे उत्तरों से होती है। वे परंपरा का सम्मान करते थे, लेकिन आँख मूँदकर कुछ भी स्वीकार करना उनके स्वभाव में नहीं था।
कहते हैं, वे जहाँ जाते थे, वहाँ संवाद होता था। बहस नहीं, बल्कि संवाद… जिसमें सत्य को खोजा जाता था। उनका जीवन यह सिखाता है कि अध्यात्म का अर्थ दुनिया छोड़ देना नहीं, बल्कि दुनिया में रहते हुए सच को पहचानना है।
शुक्ल यजुर्वेद और उपनिषदों की रोशनी
ज्ञान जो आज भी रास्ता दिखाता है
महर्षि याज्ञवल्क्य को शुक्ल यजुर्वेद से जोड़ा जाता है। लेकिन आम साधक के लिए उनका सबसे बड़ा उपहार है — बृहदारण्यक उपनिषद्।
इस उपनिषद् में आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष की बातें इतनी सहज भाषा में कही गई हैं कि आज भी पढ़ते समय ऐसा लगता है, जैसे कोई सामने बैठकर समझा रहा हो। “नेति-नेति” का सिद्धांत — यानी यह नहीं, वह नहीं — हमें सिखाता है कि सत्य को किसी एक परिभाषा में बाँधा नहीं जा सकता।
कभी-कभी लगता है, हम सब चीज़ों को नाम देना चाहते हैं, टैग लगाना चाहते हैं। याज्ञवल्क्य कहते हैं, थोड़ा रुकिए… सब कुछ नाम से परे भी है।
मैत्रेयी संवाद: जब वैराग्य बोलता है
संबंधों के बीच आत्मज्ञान
महर्षि याज्ञवल्क्य का जीवन यह भी दिखाता है कि ज्ञान सिर्फ वन में नहीं मिलता। वे गृहस्थ थे, लेकिन भीतर से पूर्ण वैरागी। मैत्रेयी के साथ उनका संवाद आज भी हृदय को छू जाता है।
वे स्पष्ट कहते हैं कि पति, पत्नी, धन या संसार किसी के लिए प्रिय नहीं होते, प्रिय तो आत्मा होती है। यह सुनने में कठोर लगता है, लेकिन भीतर उतर जाए तो बड़ा सुकून देता है। शायद इसी वजह से यह संवाद आज भी उतना ही सजीव है।
राजा जनक और आत्मज्ञान की परीक्षा
जब राजसभा में ब्रह्म बोला
मिथिला के राजा जनक के दरबार में हुआ याज्ञवल्क्य का संवाद बहुत प्रसिद्ध है। वहाँ उन्होंने यह साबित किया कि सच्चा ज्ञान पद, प्रतिष्ठा या वेश से नहीं पहचाना जाता।
कई विद्वान थे, बड़े-बड़े नाम थे, लेकिन याज्ञवल्क्य का आत्मविश्वास किसी अहंकार से नहीं, अनुभव से भरा था। यह बात मन को छूती है कि सच्चा ज्ञानी शांत होता है, ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता।
आज के समय में याज्ञवल्क्य क्यों ज़रूरी हैं?
थोड़ी शांति, थोड़ा ठहराव
आज हम बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन खुद को नहीं जानते। महर्षि याज्ञवल्क्य की शिक्षाएँ हमें धीमा होने को कहती हैं। मोबाइल एक तरफ रखकर, दो पल चुप बैठने को कहती हैं।
उनका संदेश है —
कम जोड़ो, ज्यादा समझो।
बाहर नहीं, भीतर देखो।
जयंती कैसे मनाएँ?
सरल, शांत और सच्चे तरीके से
महर्षि याज्ञवल्क्य जयंती (22 फरवरी 2026) पर किसी बड़े आयोजन की ज़रूरत नहीं।
थोड़ा स्वाध्याय कर लें
उपनिषद् की कोई पंक्ति पढ़ लें
या बस मौन में बैठकर खुद से पूछ लें — मैं कौन हूँ?
शायद यही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।
अंत में…
महर्षि याज्ञवल्क्य कोई इतिहास की किताब में बंद नाम नहीं हैं। वे आज भी हमारे सवालों में जीवित हैं। जब भी मन उलझे, जब भी उत्तर न मिले, उन्हें याद कर लेना।
कभी-कभी उत्तर तुरंत नहीं मिलता… और शायद वही ठीक है। #महर्षि_याज्ञवल्क्य #YajnavalkyaJayanti #आत्मज्ञान #भारतीय_ऋषि #VedanticWisdom #Upanishad #SpiritualIndia #सनातन_धर्म #SelfRealization #AncientWisdom #हिंदू_दर्शन #BrahmaGyan #ऋषि_परंपरा #SpiritualJourney #IndianPhilosophy #SanatanDharma #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami
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