चैत्र मास का कृष्ण पक्ष अपने आप में ही साधना और संयम का समय माना जाता है। लेकिन जब इसी पक्ष की त्रयोदशी तिथि आती है, और वह विशेष नक्षत्रों के साथ जुड़ती है, तब बनता है वारुणी पर्व। इस वर्ष यह पावन संयोग 17 मार्च को पड़ रहा है।
सच कहूँ तो बहुत से लोग इस पर्व के बारे में ज़्यादा नहीं जानते, परन्तु हमारे शास्त्रों में इसका बड़ा ही अद्भुत महत्त्व बताया गया है।
वारुणी पर्व क्या है?
चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को यदि शतभिषा नक्षत्र (जिसे वारुण नक्षत्र भी कहा जाता है) उपस्थित हो, तो उस दिन को वारुणी कहा जाता है।
यह कोई साधारण तिथि नहीं मानी गई है। मान्यता है कि यह दिन विशेष रूप से जल, स्नान और दान से जुड़ा हुआ है। शायद इसीलिए इसका संबंध भगवान वरुण से भी जोड़ा जाता है।
वारुणी पर्व के तीन प्रकार
शास्त्रों में इस पर्व के तीन अलग-अलग रूप बताए गए हैं।
1. वारुणी
यदि चैत्र कृष्ण त्रयोदशी के दिन शतभिषा नक्षत्र हो, तो वह सामान्य वारुणी कहलाती है।
2. महावारुणी
अगर उसी दिन शतभिषा नक्षत्र के साथ शनिवार भी पड़ जाए, तो यह योग और भी प्रभावशाली हो जाता है। तब इसे महावारुणी कहा जाता है।
3. महामहावारुणी
और यदि त्रयोदशी, शतभिषा नक्षत्र, शनिवार तथा शुभ योग — ये सभी एक साथ मिल जाएँ, तो वह अत्यंत दुर्लभ संयोग महामहावारुणी पर्व कहलाता है।
ऐसा योग बार-बार नहीं आता… इसलिए इसे बहुत विशेष माना गया है।
स्नान और दान का अद्भुत फल
धर्मग्रंथों में उल्लेख है कि इस दिन गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान करने से करोड़ों सूर्यग्रहणों के समान पुण्यफल प्राप्त होता है।
यह तुलना यूँ ही नहीं की गई। सूर्यग्रहण का समय अपने आप में अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली माना जाता है, और जब कहा जाए कि उसका फल करोड़ों गुना है, तो बात अपने आप समझ में आ जाती है।
इस दिन प्रातःकाल स्नान, फिर दान — विशेषकर जल, वस्त्र, अन्न या तिल का दान — शुभ माना गया है। कई लोग उपवास भी रखते हैं।
किन तीर्थों में विशेष महत्त्व?
इस तिथि पर काशी, प्रयाग और हरिद्वार जैसे तीर्थस्थलों में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है।
काशी
काशी में गंगा स्नान को मोक्षदायी कहा गया है। वारुणी के दिन यहाँ स्नान करने से जीवन के पाप क्षीण होते हैं, ऐसी मान्यता है।
प्रयाग
प्रयाग का संगम तो वैसे भी पुण्यभूमि है। यहाँ स्नान का महत्व हर पर्व पर रहता है, पर इस दिन विशेष फल की बात कही गई है।
हरिद्वार
हरिद्वार में हर की पौड़ी पर स्नान करना भक्तों के लिए एक अलग ही अनुभव होता है। वारुणी पर्व पर यहाँ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।
एक छोटी सी भावना
कभी-कभी हम बड़े-बड़े उपाय ढूँढते हैं, लेकिन हमारे धर्म में साधारण दिखने वाले कर्म — जैसे स्नान, दान, संयम — ही सबसे बड़े माने गए हैं।
17 मार्च को आने वाला यह वारुणी पर्व हमें यही याद दिलाता है कि जल की पवित्रता, मन की सादगी और श्रद्धा — यही असली साधना है।
अगर संभव हो तो इस दिन प्रातः स्नान करें, थोड़ा सा दान दें, और मन ही मन प्रार्थना कर लें।
सब कुछ बहुत विधि-विधान से हो यह ज़रूरी नहीं… भावना सच्ची होनी चाहिए।
शायद यही इस पर्व का असली रहस्य है।
No comments:
Post a Comment