Tuesday, October 14, 2025

गोवर्धन पूजा और उससे जुड़ी परम्पराएँ

 गोवर्धन पूजा का महत्व


दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर गोकुलवासियों को इन्द्र की प्रचण्ड वर्षा से बचाया था। उसी स्मृति में यह पूजा की जाती है।

जो लोग गोवर्धन पर्वत के पास रहते हैं, वे प्रातःकाल सीधे वहाँ जाकर पूजा करते हैं। परन्तु जो लोग दूर रहते हैं, वे घर में ही गोबर, अन्न या चित्र बनाकर गोवर्धन तैयार करते हैं और श्रीकृष्ण के साथ उसका पूजन करते हैं। पूजा में सोलह उपचार, मंत्रोच्चार और भोग लगाना शामिल होता है।

अन्नकूट उत्सव क्यों कहा जाता है?

इस दिन घरों और मंदिरों में बड़े पैमाने पर नैवेद्य यानी भोग अर्पित किया जाता है। अन्न और पकवानों का इतना विशाल टीला सजाया जाता है कि उसे देखकर पर्वत का आभास होता है। यही कारण है कि इस दिन को अन्नकूट उत्सव भी कहा जाता है।

बिहार और उड़ीसा का ‘गायदाँड़ उत्सव’

भारत के अलग-अलग हिस्सों में गोवर्धन पूजा अलग अंदाज में होती है। बिहार और उड़ीसा में इसे गायदाँड़ या गायदाणु नाम से मनाया जाता है।

इस दिन गायों को सजाया जाता है – शरीर पर लाल और पीला रंग, सींगों पर तेल और गेरू लगाया जाता है। फिर उनके बीच एक छोटा सूअर का बच्चा (छौना) छोड़ा जाता है। गाएँ क्रोधित होकर उसका पीछा करती हैं और सींगों से घायल कर देती हैं। यह परम्परा देखने में थोड़ी कठोर और डरावनी लग सकती है, लेकिन ग्रामीण समाज में इसे आज भी उत्सव का हिस्सा माना जाता है।

मार्गपाली-बन्धन और रस्साकशी

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मार्गपाली-बन्धन की परम्परा भी है। इसमें कुश या काश की रस्सी बनाकर किसी पेड़ या ऊँचे खम्भे से बाँधा जाता है। फिर उसका पूजन कर राजा से लेकर आमजन तक, गायों और हाथियों सहित, सब उस रस्सी के नीचे से गुजरते हैं।

इसके बाद रस्साकशी होती है – एक ओर राजपरिवार के लोग और दूसरी ओर सामान्य जन। यदि साधारण लोग जीत जाते हैं तो इसे राजा की आगामी विजय का संकेत माना जाता है। यह अनोखी परम्परा आदित्यपुराण और व्रतराज जैसे ग्रंथों में भी वर्णित है।

स्त्रियों द्वारा नीराजन और मंगलमालिका

  • यदि प्रतिपदा द्वितीया से संयुक्त हो, तो सुबह स्त्रियाँ नीराजन उत्सव करती हैं।

  • यदि प्रतिपदा का समय छोटा हो तो द्वितीया की संध्या में मंगलमालिका नामक शुभ अनुष्ठान किया जाता है।

कौमुदी महोत्सव – तीन दिनों का उत्सव

आश्विन शुक्ल चतुर्दशी से लेकर प्रतिपदा तक के तीन दिनों को कौमुदी महोत्सव कहा जाता है। इसका अर्थ है – पृथ्वी पर लोगों का आपस में प्रसन्न होना। कुछ ग्रंथों में यह भी उल्लेख है कि इस दिन बलि को कुमुदिनी फूल अर्पित किये जाते थे।

वैदिक काल की झलक

वैदिक युग में भी आश्विन मास में कई धार्मिक कृत्य होते थे, जैसे – आश्वयुजी और आग्रयण (नवसस्येष्टि)। आश्वयुजी सात पाकयज्ञों में से एक था और आश्विन पूर्णिमा को किया जाता था। हालाँकि उन अनुष्ठानों में हमें दीपावली या गोवर्धन जैसी परम्परा का स्पष्ट संकेत नहीं मिलता।

दीपावली के उद्गम पर विचार

दीपावली का प्रारंभ कब और कैसे हुआ, इसका कोई पक्का प्रमाण नहीं है। विद्वानों ने कई परिकल्पनाएँ दी हैं, लेकिन सभी थोड़ी-बहुत अनुमान पर आधारित लगती हैं। इतना निश्चित है कि यह पर्व समय के साथ विकसित होकर आज एक विशाल सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव का रूप ले चुका है।

निष्कर्ष
गोवर्धन पूजा केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि यह हमारी परम्पराओं, कृषि और पशुपालन से जुड़ा उत्सव भी है। अन्नकूट, गायदाँड़, मार्गपाली-बन्धन जैसी विविध परम्पराएँ इसे और भी रोचक बना देती हैं। यह पर्व हमें यह भी याद दिलाता है कि सामूहिकता, श्रद्धा और प्रसन्नता ही जीवन का असली उत्सव है। #गोवर्धन_पूजा #अन्नकूट_उत्सव #गोवर्धन_महिमा #श्रीकृष्ण_भक्ति #दीपावली_के_बाद #भारतीय_संस्कृति #धार्मिक_परंपरा #गोमाता_पूजन #कृष्ण_कथा #हिंदू_त्योहार #GovardhanPuja2025 #AnnakootFestival #KrishnaDevotion #IndianTraditions #SpiritualIndia #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswamiFor more information: www.benimadhavgoswami.com

Website: www.himachalpublications.com WhatsApp 9540166678 Phone no. 9312832612 Facebook: Ribhukant Goswami Instagram: Ribhukant Goswami Twitter: Ribhukant Goswami Linkedin: Ribhukant Goswami Youtube: AstroGurukulam Youtube: Ribhukant Goswami

No comments:

Post a Comment

मकर-संक्रान्ति गीत

   मकर-संक्रान्ति आई रे, ले आई उजियारा, सूरज बदले अपनी चाल, जग बोले जय-जयकारा। तिल-गुड़ की ये मिठास में, घुल जाए हर एक दूरी, दान, स्ना...