ॐ समुद्र तनयां देवी सर्वकार्यर्थं साधिनीम्,
कुबेर धन दात्रीम् च लक्ष्मीम् आवाहयामहं।
माँ लक्ष्मी देवी का जन्म समुद्र मंथन के समय हुआ। वे चतुर्दश रत्नों में से एक हैं और उनका विवाह श्री नारायण, भगवान विष्णु से हुआ। कुछ कथाओं के अनुसार समुद्र ने अपनी पुत्री लक्ष्मी को स्वयं भगवान विष्णु को अर्पित किया।
समुद्र मंथन का अर्थ केवल रत्न प्राप्ति नहीं, बल्कि यह मेहनत और श्रम की शक्ति का प्रतीक है। जैसा कि समुद्र को मथने के लिए देव और दानव दोनों ने सहयोग किया, वैसे ही समाज में यदि मानव जाति अपने वर्ग, धर्म और मतभेद भूलकर एक होकर प्रयास करें, तो असंभव कार्य भी संभव हो सकता है। यही संदेश है कि जो व्यक्ति मेहनत करता है, वही जीवन में सुख-सम्पन्नता, ज्ञान और धन प्राप्त करता है।
लक्ष्मी और श्रम का संबंध
व्यवहारिक दृष्टि से देखा जाए तो, जो व्यक्ति श्रमशील है, वह जीवन निर्वाह आसानी से करता है। इसके विपरीत आलसी और निठल्ले व्यक्ति हमेशा संसाधनों के लिए संघर्षरत रहते हैं। लक्ष्मी देवी केवल सुख-सम्पन्नता देने वाली नहीं हैं, बल्कि वे कर्मशील और मेहनती व्यक्ति को ही आशीर्वाद देती हैं।
ऋषियों ने वेदों और पुराणों के माध्यम से यह प्रतिपादित किया कि जगत की सृष्टि ब्रह्माजी द्वारा हुई, पालन श्री विष्णु जी द्वारा और संहार श्री रुद्र (शिव) द्वारा किया जाता है। इस सृष्टि के पालन में माँ लक्ष्मी का पूर्ण सहयोग रहता है। जीवन निर्वाह में उनका आशीर्वाद अनिवार्य है, क्योंकि हर कदम पर धन-लक्ष्मी की आवश्यकता होती है।
लक्ष्मीहीन जीवन का प्रभाव
यदि किसी व्यक्ति के पास लक्ष्मी नहीं है, तो वह हर क्षेत्र में अभावग्रस्त और असहाय महसूस करता है। उसके पास भोजन, वस्त्र, आवास और समाज में मान-सम्मान की कमी रहती है। कर्ज और वित्तीय संकट उसके जीवन को कठिन बना देते हैं। इसलिए महालक्ष्मी की उपासना करना अत्यंत आवश्यक है।
शुद्ध हृदय और श्रद्धा से की गई पूजा से लक्ष्मी देवी धन, सुख-शान्ति और संतोष प्रदान करती हैं। उनके आशीर्वाद से व्यक्ति न केवल अपने जीवन में संपन्न होता है, बल्कि समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा भी प्राप्त करता है।
लक्ष्मी की चंचलता और सही साधन
लक्ष्मी देवी चंचल हैं। जो व्यक्ति नैतिक साधनों से धन अर्जित करता है, उसका उपयोग सुखप्रद और सकारात्मक होता है। परन्तु अनैतिक साधनों से अर्जित धन विनाशकारी होता है। इसलिए धन अर्जित करते समय सदाचार और नैतिकता का पालन करना अनिवार्य है।
श्री रहीम ने कहा है कि जैसे अधिक सोना किसी को पागल बना देता है, वैसे ही अत्यधिक धन का अनुचित प्रयोग व्यक्ति को अज्ञान और मोह-माया में फंसा देता है। इसलिए केवल लक्ष्मी की प्राप्ति ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उनकी सही पूजा और आदर्श जीवन भी आवश्यक है।
लक्ष्मी और विष्णु का संबंध
श्री लक्ष्मी देवी भगवान विष्णु की अखंड पत्नी हैं। जहाँ विष्णु निवास करते हैं, वहाँ स्वयं लक्ष्मी का सानिध्य स्वाभाविक रूप से होता है। नारद जी ने पूछा कि विष्णु जी कहाँ रहते हैं, तब उन्होंने उत्तर दिया:
“नाहं वसामि वैकुण्ठे, योगिना हृदय न वा।
मद् भक्ता यत्र गायन्ति, तत्र तिष्ठामि नारद।”
अर्थात जहाँ भक्त श्रद्धा और शुद्ध हृदय से लक्ष्मी-नारायण की पूजा करते हैं, वहाँ श्री विष्णु और लक्ष्मी निवास करते हैं।
दीपावली और महालक्ष्मी पूजन
दीपावली पर्व के दौरान, विशेष रूप से धन-त्रयोदशी, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज के समय महालक्ष्मी पूजा की जाती है। इस समय घरों को साफ-सुथरा, सजाया-रंगीन और रोशन किया जाता है। दीपक जलाने का अर्थ है अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाना।
साफ-सुथरा और रोशन घर लक्ष्मी देवी को आकर्षित करता है। इस प्रकार घर और मन की स्वच्छता के माध्यम से हम माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।
महालक्ष्मी पूजा का महत्व
महालक्ष्मी जी केवल धन की देवी नहीं हैं। वे समाज में सम्मान, शुद्धता, शिक्षा, सुख-सम्पन्नता और संतुलित जीवन की दात्री हैं। उनकी कृपा से व्यक्ति बुद्धिमान, सन्तान संपन्न, गुणी और सुखी बनता है।
इसलिए दीपावली या किसी शुभ मुहूर्त में महालक्ष्मी पूजन करना चाहिए। शुद्ध मन, श्रद्धा और निष्ठा से की गई पूजा से जीवन में धन, स्वास्थ्य, शक्ति, सुख-सम्पन्नता और सामाजिक मान-प्रतिष्ठा बनी रहती है।
श्री महालक्ष्मी पूजन से प्राप्त लाभ:
जीवन में सुख, शांति और समृद्धि
व्यवसाय और व्यापार में वृद्धि
परिवार और संतानों की भलाई
मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार
समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा
श्लोक से सार:
“सुखसौभाग्य सम्पन्नो, मनस्वी बुद्धिमान भवत्।
पुत्रवान् गुणवान् श्रेष्ठो, भोगभोक्ता च मानवः।”
अतः जो व्यक्ति नित्य लक्ष्मी पूजन करता है, वह सदा श्रीमहालक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त करता है और जीवन में अखंड समृद्धि का अधिकारी बनता है।

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