दीपावली का पर्व केवल लक्ष्मी–पूजन तक ही सीमित नहीं है। इसके बाद आने वाली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा, जिसे बलिप्रतिपदा कहा जाता है, का भी अपना अलग महत्व है। यह दिन दानवीर राजा बलि की कथा और उनकी पूजा से जुड़ा हुआ है।
बलि कौन थे?
बलि, प्रह्लाद (विष्णु के महान भक्त) के पौत्र और विरोचन के पुत्र थे। वह असुर होते हुए भी बहुत तेजस्वी और बलशाली राजा थे। कई ग्रंथों में उनका उल्लेख मिलता है – ब्रह्मपुराण, कूर्मपुराण, वामनपुराण, स्कन्दपुराण और भविष्योत्तरपुराण में उनकी कथा विस्तार से लिखी गई है।
बलि ने अश्वमेध यज्ञ भी किया था और उनकी शक्ति इतनी अधिक थी कि देवताओं तक का तेज उन्होंने छीन लिया था।
वामन अवतार और तीन पग भूमि की कथा
जब बलि ने यज्ञ किया, तो भगवान विष्णु वामन (बौने ब्राह्मण) के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने बलि से केवल तीन पग भूमि माँगी।
गुरु शुक्राचार्य ने बलि को सावधान किया कि यह वामन वास्तव में स्वयं विष्णु हैं, लेकिन बलि अपने वचन से पीछे नहीं हटे। उन्होंने प्रतिज्ञा कर ली।
पहले पग से वामन ने स्वर्ग को नापा
दूसरे पग से पृथ्वी को
तीसरे पग के लिए जगह न बची तो बलि ने अपना सिर झुका दिया।
विष्णु ने उनके सिर पर पग रखकर उन्हें पाताल लोक भेजा, लेकिन प्रसन्न होकर उन्हें पाताल का अधिपति बना दिया और भविष्य में इन्द्र पद का वचन भी दिया।
यह कथा इतनी प्राचीन है कि महाभाष्य (पाणिनि 3.1.26) में तक इसका उल्लेख मिलता है। वहाँ कहा गया है कि यदि कोई "बलि बन्धन" की कथा सुनाए या मंच पर उसका अभिनय करे, तो लोग कहते– "बलि बन्धयति" अर्थात् बलि को बाँधना।
बलिप्रतिपदा के अन्य नाम
वीरप्रतिपदा
द्यूतप्रतिपदा
कहा जाता है कि इसी दिन माता पार्वती ने भगवान शिव को द्यूत (जुआ) में पराजित किया था। जीत और हार का असर पूरे वर्ष के सुख–दुख पर पड़ता है, इसलिए इस दिन कई स्थानों पर जुआ खेलने की परंपरा भी जुड़ी हुई है।
नेपाल में तो 1955 ईस्वी में बलिप्रतिपदा के दिन 30 लाख रुपये की बाजी लगी थी।
दीपदान का महत्व
बलिप्रतिपदा पर दीपदान की भी परंपरा है। धर्मसिन्धु में लिखा है कि बलिराज्य के दिनों में दीपदान करने से लक्ष्मी स्थिर होती हैं। इसी कारण इस पर्व को दीपावली के रूप में मनाया जाता है।
मान्यता है कि जो बलिराज्य आने पर दीपोत्सव नहीं करता, उसके घर से दीपों की रोशनी भी दूर हो जाती है।
इस दिन के प्रमुख अनुष्ठान
बलिप्रतिपदा पर कई धार्मिक कृत्य करने का विधान है:
बलि-पूजन
दीपदान
गौ, बछड़े और बैलों की पूजा
गोवर्धन पूजन
मार्गपाली (सड़क की रक्षा हेतु प्रतीक बाँधना)
नए वस्त्र धारण करना
जुआ खेलना (कुछ क्षेत्रों में परंपरा)
घर के पुरुषों और सुहागिन स्त्रियों के सामने दीप घुमाना
आजकल इन सबमें से मुख्य रूप से बलि-पूजन, दीपदान और द्यूत-क्रीड़ा ही रह गए हैं।
गौ-पूजन की विशेष परंपरा
इस दिन गायों और बैलों को सजाकर उनकी पूजा की जाती है। मंत्रों से आराधना करने के बाद उन्हें विश्राम दिया जाता है।
इस दिन गायों का दूध नहीं दुहा जाता
बैलों से कोई बोझ नहीं उठवाया जाता
देवल के अनुसार, प्रतिपदा को गौ-पूजन करने से राजा, प्रजा और स्वयं गौएँ – सब समृद्ध होते हैं।
विशेष नियम
यदि प्रतिपदा द्वितीया से संयुक्त हो, तो बलिपूजन और गौ-पूजन जैसे कृत्य वर्जित माने गए हैं। ऐसा करने से पुत्र, पत्नी या धन की हानि का भय रहता है। इसीलिए कहा गया है कि केवल अमावस्या से संयुक्त प्रतिपदा ही मान्य है।
निष्कर्ष
बलिप्रतिपदा केवल एक तिथि नहीं, बल्कि दान, वचनबद्धता और परंपरा का प्रतीक है। इस दिन दीपदान, गौ-पूजन और राजा बलि की स्मृति हमें यह संदेश देती है कि शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण है दान और धर्म। #बलिप्रतिपदा #दानवीरबलि #वामनअवतार #दीपावलीमहिमा #बलिपूजन #दीपदान #हिंदूपर्व #सनातनसंस्कृति #पौराणिककथा #भारतीयपरंपरा #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami
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