भारतीय सनातन परंपरा में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा गया है। जब जीवन में बार-बार रुकावटें आने लगती हैं, काम बनते-बनते बिगड़ जाते हैं, तब श्रद्धालु संकष्टहर गणपति व्रत का सहारा लेते हैं। यह व्रत न केवल धार्मिक है, बल्कि मन को धैर्य और विश्वास भी देता है।
संकष्टहर गणपति व्रत कब किया जाता है
यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है। इसे तिथिव्रत माना गया है।
इस दिन भगवान गणेश की पूजा चन्द्रोदय के बाद की जाती है। मान्यता है कि चंद्रमा के दर्शन के बाद ही पूजा का फल पूर्ण रूप से प्राप्त होता है।
व्रत का शास्त्रीय आधार
धार्मिक ग्रंथ व्रतरत्नाकर में इस व्रत का बहुत विस्तार से उल्लेख मिलता है। इसमें ऋग्वेद के मंत्र, पुरुषसूक्त के श्लोक, नारदपुराण तथा अन्य पौराणिक मंत्रों का संदर्भ दिया गया है।
कहा जाता है कि इस व्रत की विधि स्वयं व्यास जी ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताई थी।
संकष्टहर गणपति व्रत की पूजा विधि
इस व्रत में भगवान गणेश की पूजा षोडशोपचार विधि से की जाती है।
पूजा के समय विशेष रूप से इन बातों का ध्यान रखा जाता है:
गणपति के 21 नामों के साथ पूजा
उतनी ही संख्या में दूर्वा की गांठें
भृंगराज, बिल्व, बदरी, धतूरा और शमी के पत्ते
लाल फूल, जो गणेश जी को अत्यंत प्रिय माने जाते हैं
इसके अतिरिक्त भगवान गणेश के 108 नामों से भी पूजन किया जाता है, जिससे व्रत का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है।
मोदक और दक्षिणा का महत्व
पूजा के अंत में व्रत करने वाले व्यक्ति को पाँच मोदक और दक्षिणा अर्पित करने का विधान बताया गया है।
मोदक गणेश जी का प्रिय भोग है, इसलिए इसे अर्पित करना शुभ माना जाता है। कई लोग मानते हैं कि मोदक चढ़ाने से मनोकामना जल्दी पूर्ण होती है।
‘संकष्ट’ शब्द का अर्थ क्या है
यहाँ संकष्ट शब्द बहुत गहरा अर्थ रखता है।
कष्ट का मतलब है क्लेश या पीड़ा और सम् उपसर्ग उस पीड़ा की अधिकता को दर्शाता है।
अर्थात जब कष्ट सामान्य न होकर बहुत अधिक हो जाए, तब संकष्टहर गणपति व्रत किया जाता है।
क्यों किया जाता है यह व्रत
मान्यता है कि यह व्रत करने से
जीवन की बाधाएँ कम होती हैं
मानसिक तनाव में शांति मिलती है
कार्यों में आ रही रुकावटें धीरे-धीरे दूर होती हैं
बहुत से श्रद्धालुओं का अनुभव है कि इस व्रत को सच्चे मन से करने पर रास्ते अपने-आप खुलने लगते हैं… हालाँकि हर किसी का अनुभव थोड़ा अलग भी हो सकता है।
अंत में एक बात
संकष्टहर गणपति व्रत केवल विधि या नियमों तक सीमित नहीं है। इसमें सबसे ज़रूरी है श्रद्धा।
अगर मन सच्चा हो और भाव शुद्ध हों, तो भगवान गणेश किसी न किसी रूप में सहारा ज़रूर देते हैं।
कभी-कभी समाधान तुरंत नहीं मिलता, लेकिन धैर्य अपने-आप आ जाता है… और शायद वही सबसे बड़ा चमत्कार है।
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