Thursday, December 04, 2025

पुत्रदा एकादशी व्रत: संतान प्राप्ति और सुख-शांति का पावन मार्ग

 हमारे शास्त्रों में एकादशी तिथि को अत्यंत पवित्र माना गया है। इन्हीं में से एक है पौष शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी, जिसे संतान की इच्छा रखने वाले दंपत्तियों के लिए विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, उपवास और भक्ति से न केवल मनोकामनाएँ पूरी होती हैं बल्कि घर में सुख और शांति भी आती है।


पुत्रदा एकादशी का महत्व

कहा जाता है कि जो दंपत्ति श्रद्धा से यह व्रत करते हैं, उनके जीवन में संतान का सुख अवश्य आता है। इसके अलावा यह व्रत मन को शुद्ध करता है और जीवन के दुःख दूर करता है।

पुत्रदा एकादशी की पौराणिक कथा

भद्रावती नगरी का दुखी राजा

बहुत समय पहले भद्रावती नाम की एक सुंदर और समृद्ध नगरी थी। वहाँ के राजा सुकेतु और उनकी रानी दानशील, धर्मपरायण और जनता के हित को अपना प्रथम कर्तव्य मानने वाले थे।
राज्य में किसी भी चीज़ की कमी नहीं थी – धन, अन्न, सेना, सम्मान… सब कुछ।
पर एक बड़ा दुःख था – संतान का अभाव

राजा और रानी बार-बार ईश्वर से प्रार्थना करते, लेकिन वर्षों बीत गए और उनके जीवन में यह सुख नहीं आया। यह कमी उनके मन पर इतना भारी पड़ने लगी कि उन्होंने राज्य का भार मंत्रियों को सौंप दिया और दुखी मन से वन की ओर चल पड़े।

आत्मसंघर्ष और जीवन की कड़वी सच्चाई

वन में पहुँचकर निराशा इतनी बढ़ गई कि दोनों ने जीवन त्यागने तक का विचार बना लिया। लेकिन तभी उन्हें स्मरण हुआ –
“आत्महत्या सबसे बड़ा पाप है।”
यही सोच उन्हें रोक गई, और वे आगे बढ़ते हुए एक शांत और पवित्र स्थान पर पहुँच गए।

ऋषियों का आश्रम और शुभ संदेश

कुछ ही दूरी पर उन्हें ऋषियों का आश्रम दिखाई दिया। वहाँ की शांति और पवित्र वातावरण ने उनके मन को स्थिर कर दिया। राजा-रानी ने मुनियों को प्रणाम किया और चुपचाप बैठ गए।

ऋषियों ने अपने तप और अनुभव से तुरंत जान लिया कि दंपत्ति संतानहीनता से दुखी हैं।
उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा—
“पुत्रदा एकादशी का व्रत कीजिए, भगवान विष्णु अवश्य प्रसन्न होंगे और आपको पुत्र प्राप्त होगा।”

व्रत का फल: मनोकामना पूर्ण

राजा और रानी ने ऋषियों की सलाह मानकर अगली आने वाली पुत्रदा एकादशी का व्रत किया। पूरे दिन उपवास, पूजा और विष्णु भगवान का ध्यान किया।

कुछ ही समय बाद उन्हें एक उज्ज्वल, तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई।
राज्य में खुशी की लहर दौड़ गई।
और तभी से पुत्रदा एकादशी को संतान प्राप्ति का वरदान देने वाली तिथि के रूप में मान्यता मिली।

पुत्रदा एकादशी व्रत कैसे करें?

1. स्नान और संकल्प

सुबह पवित्र जल से स्नान कर भगवान विष्णु की आराधना का संकल्प लें।

2. उपवास

पूरा दिन उपवास रखने का नियम है। कुछ लोग फलाहार भी करते हैं।

3. विष्णु पूजा

भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र के सामने दीया जलाएँ, तुलसी, पीले पुष्प, चावल, और प्रसाद चढ़ाएँ।

4. कथा श्रवण

पुत्रदा एकादशी की पौराणिक कथा अवश्य सुनें या पढ़ें।

5. दान-पुण्य

संतान की मनोकामना से किया गया यह व्रत दान के बिना अधूरा माना गया है।

अंत में…

पुत्रदा एकादशी केवल संतान पाने का ही माध्यम नहीं, बल्कि जीवन में नई आशा, नई ऊर्जा और सकारात्मकता लाने का भी पावन अवसर है।
श्रद्धा, विश्वास और सच्चे मन से किया गया यह व्रत परिवार को खुशियाँ देने में समर्थ माना गया है।

यदि आप संतान की कामना रखते हैं या परिवार के लिए शुभता चाहते हैं, तो यह एकादशी अवश्य करें।

भगवान विष्णु आपकी हर मनोकामना पूरी करें। 🙏

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