Tuesday, December 02, 2025

शिवचतुर्दशी व्रत – मत्स्यपुराण में वर्णित दिव्य साधना

 भारतीय परंपराओं में कुछ व्रत ऐसे होते हैं जिनकी महिमा शब्दों में नहीं समा पाती। शिवचतुर्दशी व्रत भी ऐसा ही एक दुर्लभ और अत्यंत पूजनीय व्रत है। मत्स्यपुराण में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है, परंतु यहाँ हम इसे सरल भाषा में, अपने अनुभव जैसे अंदाज़ में समझने की कोशिश करेंगे।




🕉 शुरुआत कब और कैसे होती है

इस व्रत की शुरुआत मार्गशीर्ष महीने की शुक्ल त्रयोदशी से की जाती है।

  • इस दिन व्रती एक बार भोजन करता है।

  • अगले दिन यानी चतुर्दशी को पूरा उपवास, बिना अन्न-जल के, शिवजी का पूजन किया जाता है।

ये दो दिन आध्यात्मिक रूप से एक तरह की आंतरिक शुद्धि का अनुभव कराते हैं।

 शिव पूजा की विधि – सरल और सहज भाषा में

🛁 1. शिवजी का स्नान और अंग-पूजन

पूजन की शुरुआत शिवलिंग या शिवमूर्ति को शुद्ध जल से स्नान कराकर होती है।
इसके बाद शिव के प्रत्येक अंग का अलग-अलग मंत्रों के साथ पूजन किया जाता है।
जैसे—

  • शिवाय नमः” – चरण पूजन

  • सर्वात्मने नमः” – शिरो-पूजन

  • त्रिनेत्राय नमः” – ललाट

  • हराय नमः” – नेत्र

  • इन्दुमुखाय नमः” – मुख

  • श्रीकण्ठाय नमः” – कंधे

  • और इसी क्रम से पूरे शरीर का पूजन…

मान्यता है कि ऐसे अंग-न्यास से शिव का संपूर्ण स्वरूप पूजित होता है और भक्त के भीतर भी एक दिव्य ऊर्जा जागृत होने लगती है।

2. माँ पार्वती का विशेष पूजन

अंग-पूजन के बाद पार्वतीजी का वन्दन “नमः पुष्ट्यै, नमस्तुष्ट्यै” मंत्रों के साथ किया जाता है।
शिव-पार्वती का संयुक्त पूजन जीवन में सुख और स्थिरता लाता है—ऐसा बुजुर्ग अक्सर घर में कहते थे।

3. अर्पण सामग्री और प्रार्थना

भगवान को वृषभ (नंदी का प्रतीक), सुवर्ण, सुगंधित गंध, पाँच रत्न, और विविध प्रकार के नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं।
प्रार्थना इस मंत्र से की जाती है—

“प्रीयतां देवदेवोऽत्र सद्योजातः पिनाकधृक्”
—हे शिव! आप इस पूजा को स्वीकार करें।

4. रात्रि-व्रत और शयन

पूजा समाप्त होने के बाद थोड़ा-सा घी ग्रहण करने का नियम है।
फिर भूमि पर, उत्तरी दिशा की ओर मुख करके, सोया जाता है।
इससे मन स्थिर होता है और शरीर भी साधना के लिए तैयार होता है।

5. अगले दिन पूर्णिमा का कार्य

अगली सुबह ब्राह्मणों का पूजन किया जाता है और उन्हें भोजन कराया जाता है।
इसी प्रकार का व्रत कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भी किया जाता है।

महीने के अनुसार करने योग्य भक्षण

यह भाग थोड़ा अनोखा है—मत्स्यपुराण हर महीने के लिए अलग व्रत-विधान बताता है। चतुर्दशी के दिन शिव पूजन के बाद निम्न वस्तुओं का सेवन करना चाहिए—


मास

क्या ग्रहण करना चाहिए

मार्गशीर्ष

गोमूत्र

पौष

गोबर (यहाँ अर्थ वैद्यकीय-उपचार में प्रयुक्त गोमय)

माघ

दूध

फाल्गुन

दही

चैत्र

घी

वैशाख

कुशोदक (कुश से छना जल)

ज्येष्ठ

पंचगव्य

आषाढ़

बिल्व का तत्व

श्रावण

जौ

भाद्रपद

गो-शृंग जल

आश्विन

शुद्ध जल

कार्तिक

काले तिल

इनका महत्व प्रतीकात्मक है—शिव पूजा में शुद्धता और संयम को दर्शाता है।

मासानुसार पुष्प—शिव पूजन की सौंदर्य परंपरा

हर महीने शिवजी को अलग-अलग फूल चढ़ाने का विधान लिखा है—

  • मार्गशीर्ष – श्वेत कमल

  • पौष – मन्दार

  • माघ – मालती

  • फाल्गुन – धतूरा

  • चैत्र – सिन्दुवार

  • वैशाख – अशोक

  • ज्येष्ठ – मल्लिका

  • आषाढ़ – पाटल

  • श्रावण – विविध पुष्प

  • भाद्रपद – कदम्ब

  • आश्विन – शतपत्री

  • कार्तिक – उत्पल

कहते हैं कि सही मास में सही पुष्प अर्पित करने से शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं।

व्रत का फल – क्या मिलता है इस साधना से?

शास्त्रों के अनुसार इस व्रत का फल अनंत बताया गया है।
जो व्यक्ति श्रद्धा और नियम से यह साधना करता है, उसे—

  • मानसिक शांति

  • पापों से मुक्ति

  • पारिवारिक कल्याण

  • और आध्यात्मिक उन्नति

जैसे अद्भुत परिणाम प्राप्त होते हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि यह व्रत धीरे-धीरे जीवन में छिपी उलझनों को खोल देता है—जैसे भगवान शिव हाथ पकड़कर आगे बढ़ा रहे हों।

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