माघ मास की शुक्ल सप्तमी को मनाया जाने वाला रथसप्तमी व्रत भारतीय सनातन परम्परा में एक विशेष स्थान रखता है। यह दिन सूर्यदेव को समर्पित होता है और माना जाता है कि इसी तिथि से सूर्य का रथ उत्तरायण की गति में पूर्ण तेज के साथ अग्रसर होता है। गाँव-कस्बों से लेकर नगरों तक, इस दिन की एक अलग ही आभा देखने को मिलती है।
रथसप्तमी का धार्मिक महत्व
रथसप्तमी को कई स्थानों पर महासप्तमी भी कहा जाता है। मान्यता है कि सृष्टि के प्रारम्भिक काल में इसी दिन सूर्यदेव को उनका दिव्य रथ प्राप्त हुआ था। इसलिए यह तिथि केवल एक व्रत नहीं, बल्कि सूर्य के तेज, स्वास्थ्य और जीवनशक्ति से जुड़ा पर्व है।
कहते हैं, जो व्यक्ति श्रद्धा से इस व्रत का पालन करता है, उसके जीवन से रोग, आलस्य और दुर्भाग्य धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं।
व्रत का संकल्प और प्रारम्भ
इस व्रत का संकल्प षष्ठी तिथि की रात्रि में लिया जाता है। उसी समय से व्रती संयम, शुद्ध आहार और मन की पवित्रता का ध्यान रखता है।
सप्तमी के दिन उपवास रखने की परम्परा है। कुछ लोग फलाहार करते हैं, तो कुछ केवल जल ग्रहण करते हैं। यहाँ नियमों से अधिक भावना को महत्व दिया जाता है, यही इस व्रत की खास बात है।
रथ और सूर्य पूजन की विधि
रथसप्तमी में रथ का विशेष महत्व है। शास्त्रों में सोने या चाँदी से बने अश्व, सारथी और रथ का वर्णन मिलता है। आज के समय में लोग अपनी सामर्थ्य अनुसार प्रतीकात्मक रथ भी बनाते हैं।
मध्याह्न काल में रथ को वस्त्र से ढके मण्डप में रखा जाता है। कुंकुम, पुष्प, अक्षत आदि से रथ की पूजा होती है। रथ के भीतर सूर्यदेव की स्वर्ण प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है।
इसके बाद मंत्रोच्चारण के साथ सूर्य की स्तुति की जाती है और मन ही मन अपनी कामना कही जाती है। यह क्षण बड़ा भावुक होता है, कई बार आँखें अपने-आप नम हो जाती हैं।
रात्रि जागरण की परम्परा
रथसप्तमी की रात्रि को जागरण का विधान है। नृत्य, संगीत, भजन-कीर्तन के माध्यम से सूर्यदेव का स्मरण किया जाता है।
मान्यता है कि इस रात व्रती को सोना नहीं चाहिए, यानी पलकें बंद नहीं करनी चाहिए। यह नियम कठिन लगता है, पर इसी में साधना छुपी है। पूरी रात जागते हुए इंसान अपने भीतर भी एक नई रोशनी महसूस करता है।
अगले दिन का विधान
अगले दिन प्रातःकाल स्नान के बाद दान-पुण्य किया जाता है। अन्न, वस्त्र या यथाशक्ति दान देना शुभ माना गया है।
अंत में गुरु या योग्य ब्राह्मण को रथ का दान किया जाता है। यह दान केवल वस्तु का नहीं, बल्कि अहंकार छोड़ने का प्रतीक भी है।
पुराणों में रथसप्तमी की कथा
धर्मग्रंथों में एक प्रसिद्ध कथा आती है जिसमें बताया गया है कि इस व्रत के प्रभाव से एक वृद्ध राजा को संतान प्राप्त हुई। वह संतान जन्म से रोगग्रस्त थी, पर रथसप्तमी व्रत के पुण्य से न केवल स्वस्थ हुई, बल्कि आगे चलकर महान चक्रवर्ती राजा बनी।
इस कथा को सुनते समय मन में अपने-आप विश्वास जाग उठता है कि श्रद्धा में सच में बहुत शक्ति होती है।
आज के समय में रथसप्तमी
आज की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में शायद हम पूरा विधान न कर पाएं, पर मन से सूर्यदेव को स्मरण करना, प्रातःकाल सूर्य को जल अर्पित करना और उस दिन संयम रखना भी अपने-आप में बड़ा पुण्य है।
रथसप्तमी हमें यह याद दिलाती है कि सूर्य केवल आकाश का पिंड नहीं, बल्कि हमारे जीवन की धड़कन हैं।
अंत में
रथसप्तमी कोई बोझिल नियमों वाला व्रत नहीं, बल्कि भीतर की रोशनी को जगाने का पर्व है। अगर इस दिन थोड़ी-सी भी श्रद्धा और सच्चा भाव जुड़ जाए, तो व्रत अपने-आप सफल हो जाता है।
कभी-कभी लगता है, असली रथ तो हमारे भीतर चलता है… बस उसे सही दिशा देनी होती है।

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