Wednesday, December 31, 2025

भीष्माष्टमी: पितामह भीष्म को समर्पित एक विशेष तिथि

 सनातन धर्म में माघ मास का अपना ही आध्यात्मिक महत्व है। इसी मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को भीष्माष्टमी कहा जाता है। यह दिन महाभारत के महान योद्धा और आजीवन ब्रह्मचारी रहे पितामह भीष्म की स्मृति में मनाया जाता है।

यह केवल एक तिथि नहीं है, बल्कि त्याग, व्रत और धर्म के प्रति अडिग रहने वाले पुरुष के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का दिन है।

भीष्माष्टमी कब और क्यों मनाई जाती है?

भीष्माष्टमी माघ शुक्ल अष्टमी को आती है। मान्यता है कि इसी तिथि के आसपास भीष्म पितामह ने उत्तरायण में देह त्याग किया था। उन्होंने इच्छामृत्यु का वरदान पाकर सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की और धर्म के अनुसार शरीर छोड़ा।

इसी कारण यह दिन विशेष रूप से उनके तर्पण और स्मरण के लिए माना गया है।

भीष्म पितामह के लिए जल और श्राद्ध का विधान

शास्त्रों में बताया गया है कि जो व्यक्ति इस दिन भीष्म पितामह को जल अर्पित करता है और तर्पण करता है, वह एक वर्ष में किए गए पापों से मुक्त हो जाता है। कई ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि इस व्रत और तर्पण से संतान-सुख की प्राप्ति होती है।

हेमाद्रि, वर्षक्रिया-कौमुदी, तिथितत्त्व, निर्णयसिन्धु और समयमयूख जैसे ग्रंथों में इस विषय का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

क्या जिनके पिता जीवित हों वे तर्पण कर सकते हैं?

यह प्रश्न अक्सर लोगों के मन में आता है। सामान्यतः पितृ तर्पण को लेकर कुछ नियम होते हैं, लेकिन भीष्माष्टमी के संदर्भ में स्थिति अलग है।

समयमयूख ग्रंथ में साफ कहा गया है कि जिस व्यक्ति के पिता जीवित हों, वे भी भीष्म पितामह को जल दे सकते हैं। इसका कारण यह है कि भीष्म पितामह किसी एक कुल या वंश तक सीमित नहीं हैं, वे पूरे क्षत्रिय धर्म और आदर्श जीवन के प्रतीक माने जाते हैं।

भीष्म की तिथि पर विद्वानों में मतभेद

कुछ विद्वानों ने यह मत रखा है कि भीष्म पितामह की मृत्यु माघ कृष्ण अष्टमी को हुई थी। प्रोफेसर पी. सी. सेनगुप्त ने ‘समनुप्राप्त’ शब्द की अलग व्याख्या प्रस्तुत की, जिसे कुछ लोगों ने स्वीकार किया।

लेकिन कई अन्य विद्वानों ने इस मत से असहमति जताई है। उनका कहना है कि ‘समनुप्राप्त’ को ‘समनुप्राविष्ट’ मानना भाषिक और तर्क दोनों दृष्टि से ठीक नहीं बैठता। महाभारत के अनुशासन पर्व के श्लोक इस बात की ओर संकेत करते हैं कि तिथि शुक्ल पक्ष की ही रही होगी।

इस विषय पर 1954 में प्रकाशित एक शोध लेख (जे. ए. एस. बी.) में भी विस्तृत चर्चा मिलती है।

शास्त्रों में भीष्म तर्पण का स्पष्ट उल्लेख

भुजबलनिबन्ध में दो श्लोक मिलते हैं, जिन्हें तिथितत्त्व, निर्णयसिन्धु और अन्य ग्रंथों ने भी उद्धृत किया है। इन श्लोकों का भाव यह है कि:

  • माघ शुक्ल अष्टमी को भीष्म के लिए जल देने से

  • संवत्सर भर के पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं

यह जल-तर्पण उस महान योद्धा के लिए है जो अपुत्र रहे, जीवनभर व्रत में बंधे रहे और धर्म के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।

ब्राह्मणों के लिए भी है तर्पण का अधिकार

एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि भीष्म पितामह केवल क्षत्रियों तक सीमित नहीं हैं। शास्त्रों में ब्राह्मणों को भी उस उच्च व्यक्तित्व वाले धर्मवीर को तर्पण देने की अनुमति दी गई है।

यह बात अपने-आप में बताती है कि भीष्म पितामह को केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक आदर्श पुरुष के रूप में देखा गया है।

भीष्माष्टमी का वास्तविक संदेश

भीष्माष्टमी केवल जल देने या विधि निभाने का दिन नहीं है। यह दिन हमें सिखाता है कि:

  • व्रत और संकल्प जीवन को ऊँचा बनाते हैं

  • धर्म के लिए कठिन निर्णय भी लिए जा सकते हैं

  • शक्ति के साथ संयम होना कितना ज़रूरी है

आज के समय में, जब स्वार्थ सबसे ऊपर दिखता है, भीष्म पितामह का जीवन हमें चुपचाप बहुत कुछ सिखा जाता है। #Bhishmashtami #BhishmaPitamah #MahaBharat #SanatanDharma #HinduTraditions #VedicCulture #PitruTarpan #IndianMythology #DharmaAndKarma #SpiritualIndia #HinduFestivals #PuranicWisdom #AncientIndia #HinduRituals #VedicHeritage #SanatanDharma #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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