हमारे शास्त्रों में सूर्यदेव को जीवनदायी ऊर्जा का स्रोत माना गया है। मार्तण्ड सप्तमी का व्रत भी इसी ऊर्जा का आह्वान करता है। यह व्रत पौष मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी से शुरू होता है और इसकी विधि बड़ी ही सरल लेकिन अत्यंत पवित्र मानी गई है। नीचे पूरा विवरण एक सरल और ब्लॉग-जैसी शैली में लिखा गया है—जितना मानवीय, उतना ही सरल।
मार्तण्ड सप्तमी क्या है?
यह एक प्राचीन सूर्य-व्रत है, जिसे पौष शुक्ल 7 के दिन उपवास रखकर शुरू किया जाता है। इस दिन सूरज देव को ‘मार्तण्ड’ नाम से पुकारकर उनकी पूजा की जाती है।
व्रत का महत्व
सूर्यदेव के प्रति समर्पण, शारीरिक–मानसिक शुद्धि और जीवन में प्रकाश लाने का संकेत यह व्रत देता है। भविष्य पुराण, हेमाद्रि और कृत्यकल्पतरु जैसे ग्रंथों में इसकी बड़ी प्रशंसा की गई है।
व्रत की विधि
1. पौष शुक्ल सप्तमी से व्रत आरम्भ
इस दिन व्रती उपवास रखता है और सुबह-सुबह स्नान के बाद सूर्य को जल अर्पण करता है।
थोड़ी-बहुत गलती हो जाए तो मन में संकल्प पक्का होना चाहिए—यही असली पूजा है।
2. ‘मार्तण्ड’ नाम से सूर्य-पूजन
इस दिन सूर्य को “मार्तण्ड” नाम से पुकारकर अर्घ्य दिया जाता है।
दीप जलाकर, थोड़ी सी लाल चंदन, हल्दी, गुड़ या लाल फूल चढ़ाना शुभ माना गया है।
शरीर की शुद्धि का विशेष नियम
ग्रंथों में कहा गया है कि व्रतकर्ता को शुद्धि के लिए इनमें से किसी एक चीज़ का सेवन करना चाहिए—
गोमूत्र
गोबर का हल्का लेप
दही
या दूध
आजकल लोग आमतौर पर दही और दूध से ही यह विधि करते हैं।
दूसरे दिन की पूजा – ‘रवि’ नाम से आराधना
अगले दिन फिर उपासना की जाती है, पर इस बार सूर्य को “रवि” नाम से संबोधित करके पूजा की जाती है।
मान्यता है कि इस दो-दिवसीय क्रम से सूर्यदेव जल्दी प्रसन्न होते हैं।
यह व्रत पूरे साल कैसे चलता है?
इस विधि को वर्ष भर, हर माह दो दिनों तक किया जाता है।
यानी, हर महीने सप्तमी तिथि पर उपवास और सूर्य पूजा—पहले दिन ‘मार्तण्ड’, दूसरे दिन ‘रवि’।
गौ-सेवा का विशेष नियम
व्रतकर्ता को साल में एक दिन किसी गाय को घास, चारा या कुछ हरा–ताजा खिलाना चाहिए।
यह सेवा सूर्य-पूजन को पूर्ण करती है।
और सच कहूँ तो, गाय के सिर पर हाथ फेरना ही मन को शांत कर देता है।
व्रत का फल—सूर्यलोक की प्राप्ति
शास्त्र बताते हैं कि इस व्रत को करने वाला व्यक्ति सूर्यलोक को प्राप्त होता है।
यह फल भविष्य पुराण (१।१०९।१–१३), हेमाद्रि और कृत्यकल्पतरु में साफ लिखा हुआ है।
अंत में – व्रत का सार
मार्तण्ड सप्तमी सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि सूर्यदेव से अपना संबंध मजबूत करने का तरीका है।
उपवास, शुद्धि, सेवा और भक्ति—इन चारों का सुंदर संगम इस व्रत में दिखाई देता है।

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