भारतीय परंपराओं में कुछ व्रत ऐसे होते हैं जो पीढ़ियों से शुरू होकर आज तक श्रद्धा के साथ निभाए जाते हैं। रुक्मिण्यष्टमी व्रत भी ऐसा ही एक महत्वपूर्ण और शुभ व्रत है, जिसे मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को किया जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से वैवाहिक सुख, परिवार की समृद्धि, और स्त्रियों के लिए संतान-सुख की कामना से किया जाता है।
इस लेख में आप इस व्रत की संपूर्ण विधि को सरल भाषा में पढ़ पाएँगे।
रुक्मिण्यष्टमी व्रत का महत्व
कहते हैं कि इस व्रत को करने से
स्त्री को संतान-संबंधी दुख नहीं रहता,
और पुरुष कर्ता चिंताओं से मुक्त हो जाता है।
स्कन्द पुराण के अनुसार यह व्रत सात वर्षों तक विशेष क्रम में पूरा किया जाता है।
व्रत की संपूर्ण विधि — वर्ष दर वर्ष
पहला वर्ष: मिट्टी का एक-द्वार वाला घर
सबसे पहले वर्ष में कर्त्री (व्रत करने वाली स्त्री) को
मिट्टी से छोटा-सा एक ही द्वार वाला घर बनाना होता है।
इस घर के भीतर रखे जाते हैं—
घर के प्रतीकात्मक उपकरण,
थोड़ा धान,
थोड़ा घी,
और पूजा की सामाग्री।
देव-प्रतिमाओं की स्थापना
इस घर के पास भगवान कृष्ण, रुक्मिणी, बलराम–रेवती, प्रद्युम्न–उनकी पत्नी, अनिरुद्ध–उषा, तथा देवकी–वसुदेव की छोटी-सी प्रतिमाएँ रखकर पूजन किया जाता है।
चन्द्र अर्घ्य
सुबह के समय चन्द्र देव को अर्घ्य दिया जाता है।
दान
अगली सुबह यह पूरा मिट्टी का घर किसी कुमारी कन्या को भेंट कर दिया जाता है।
दूसरा, तीसरा और चौथा वर्ष: घर में अंश जोड़ना
इन तीन वर्षों में कर्त्री फिर से घर बनाती है,
बस फर्क इतना कि हर साल पहले वाले घर में एक नया हिस्सा जोड़ना होता है।
इसके बाद यह घर भी किसी कुमारी को दान कर दिया जाता है।
ये तीन वर्ष परिवार में बढ़ते सुख–संपन्नता और विस्तार का प्रतीक माने जाते हैं।
पाँचवाँ वर्ष: पाँच-द्वार वाला घर
पाँचवे साल कर्त्री को पाँच द्वारों वाला घर बनाना होता है।
इस प्रतीकात्मक निर्माण को फिर कुमारी कन्या को दान किया जाता है।
छठा वर्ष: छः-द्वार का गृह निर्माण
छठे वर्ष में यह घर छः द्वारों के साथ बनाकर दान कर दिया जाता है।
यह बढ़ती सम्पन्नता और जीवन में छह दिशाओं से आने वाली शुभता का संकेत माना गया है।
सातवाँ वर्ष — सबसे विशेष
सातवाँ वर्ष रुक्मिण्यष्टमी व्रत का सबसे महत्वपूर्ण और फलदायी माना जाता है।
सात-द्वार वाला घर और श्वेत रंग
इस वर्ष कर्त्री
मिट्टी का सात द्वारों वाला घर बनाती है,
उसे सफेद रंग से रंगा जाता है,
और घर के भीतर रखा जाता है:
छोटा पलंग
खड़ाऊँ (पादत्राण)
दर्पण
ओखली–मूसल
और कुछ आवश्यक पात्र
स्वर्ण प्रतिमाओं की पूजा
इस दिन भगवान कृष्ण, रुक्मिणी और प्रद्युम्न की स्वर्ण-प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है।
पूरी रात उपवास व जागरण किया जाता है।
गृह और गाय का दान
अगली सुबह यह सात-द्वार वाला घर तथा एक गाय किसी ब्राह्मण को दान कर दिया जाता है।
ब्राह्मण-पत्नी को भी आवश्यक वस्तुएँ भेंट की जाती हैं।
व्रत का पुण्यफल
हेमाद्रि और स्कन्द पुराण के अनुसार—
स्त्री को इस व्रत से पुत्र-सुख सुनिश्चित होता है,
और पुरुष कर्ता जीवन की चिंताओं से मुक्त हो जाता है।
इस व्रत को सात वर्षों तक विधि-विधान से निभाना विशेष शुभ माना गया है। #रुक्मिण्यष्टमी #रुक्मिण्यष्टमीव्रत #स्कंदपुराण #पौराणिककथा #व्रतविधान #धार्मिकव्रत #हिंदूसंस्कृति #आध्यात्मिकज्ञान #शुभअष्टमी #देवपूजन #भारतीयसंस्कृति #व्रतउपवास #मातृशक्ति #सनातनधर्म #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami
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