हमारे सनातन पर्वों में कई ऐसे व्रत हैं, जो बहुत ज़्यादा प्रसिद्ध नहीं हैं, लेकिन जिनका भाव बहुत गहरा होता है। गौरी–तृतीया व्रत भी उन्हीं में से एक है। यह व्रत दिखावे से दूर, मन की शुद्धता और श्रद्धा पर टिका हुआ है। खास बात यह है कि यह परंपरा मुख्य रूप से दक्षिण भारत में देखने को मिलती है।
गौरी–तृतीया व्रत कब किया जाता है
यह व्रत माघ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। इस दिन महिलाएँ और श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान करके घर में या मंदिर में पूजा की तैयारी करते हैं। वातावरण अपने आप थोड़ा शांत और पवित्र सा लगने लगता है।
व्रत का उद्देश्य और भावना
इस दिन देवी गौरी और भगवान शिव की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस व्रत से दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और गृहस्थ जीवन सुखमय रहता है। कई लोग इसे मन की इच्छाओं और पारिवारिक शांति से भी जोड़ते हैं।
देवी गौरी के आठ नाम
शास्त्रों और परंपराओं में देवी गौरी के आठ नामों का विशेष उल्लेख मिलता है। पूजा के समय इन नामों का स्मरण किया जाता है:
पार्वती
ललिता
गौरी
गायत्री
शंकरी
शिवा
उमा
सती
कहा जाता है कि इन नामों का जप मन को स्थिर करता है और पूजा को पूर्णता देता है।
शास्त्रीय उल्लेख
इस व्रत का उल्लेख समयमयूख तथा पुरुषार्थ-चिन्तामणि जैसे ग्रंथों में मिलता है। हालांकि यह व्रत उत्तर भारत में कम जाना जाता है, लेकिन दक्षिण भारत में इसे आज भी परंपरा के साथ निभाया जाता है।
दक्षिण भारत में प्रचलन
गौरी–तृतीया व्रत को लेकर यह बात अक्सर सुनने में आती है कि यह व्रत केवल दक्षिण भारत में ही किया जाता है। वहाँ आज भी कई घरों में यह व्रत पीढ़ियों से चलता आ रहा है। कहीं-कहीं इसे परिवार की स्त्रियाँ मिलकर करती हैं, तो कहीं अकेले ही सादगी से पूजा हो जाती है।
आज के समय में इसका महत्व
आज के भागदौड़ भरे जीवन में ऐसे व्रत हमें थोड़ी देर रुकने का अवसर देते हैं। बिना ज़्यादा नियम-कायदे, बस श्रद्धा के साथ की गई यह पूजा मन को हल्का कर देती है। शायद इसी वजह से यह व्रत अब भी जीवित है, भले ही बहुत ज़्यादा चर्चित न हो।
अंतिम विचार
गौरी–तृतीया व्रत हमें यह सिखाता है कि पूजा का असली अर्थ शोर-शराबा नहीं, बल्कि भाव है। अगर मन सच्चा हो, तो छोटी सी पूजा भी बड़ा असर छोड़ जाती है।
कभी मौका मिले, तो इस व्रत के बारे में जानकर इसे अपनाना बुरा नहीं… आखिर परंपराएँ तभी जीवित रहती हैं, जब हम उन्हें समझकर निभाते हैं।
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