Wednesday, December 31, 2025

गौरी–तृतीया व्रत: आस्था और परंपरा का सादा सा पर्व

 हमारे सनातन पर्वों में कई ऐसे व्रत हैं, जो बहुत ज़्यादा प्रसिद्ध नहीं हैं, लेकिन जिनका भाव बहुत गहरा होता है। गौरी–तृतीया व्रत भी उन्हीं में से एक है। यह व्रत दिखावे से दूर, मन की शुद्धता और श्रद्धा पर टिका हुआ है। खास बात यह है कि यह परंपरा मुख्य रूप से दक्षिण भारत में देखने को मिलती है।

गौरी–तृतीया व्रत कब किया जाता है

यह व्रत माघ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। इस दिन महिलाएँ और श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान करके घर में या मंदिर में पूजा की तैयारी करते हैं। वातावरण अपने आप थोड़ा शांत और पवित्र सा लगने लगता है।

व्रत का उद्देश्य और भावना

इस दिन देवी गौरी और भगवान शिव की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस व्रत से दांपत्य जीवन में मधुरता आती है और गृहस्थ जीवन सुखमय रहता है। कई लोग इसे मन की इच्छाओं और पारिवारिक शांति से भी जोड़ते हैं।

देवी गौरी के आठ नाम

शास्त्रों और परंपराओं में देवी गौरी के आठ नामों का विशेष उल्लेख मिलता है। पूजा के समय इन नामों का स्मरण किया जाता है:

  • पार्वती

  • ललिता

  • गौरी

  • गायत्री

  • शंकरी

  • शिवा

  • उमा

  • सती

कहा जाता है कि इन नामों का जप मन को स्थिर करता है और पूजा को पूर्णता देता है।

शास्त्रीय उल्लेख

इस व्रत का उल्लेख समयमयूख तथा पुरुषार्थ-चिन्तामणि जैसे ग्रंथों में मिलता है। हालांकि यह व्रत उत्तर भारत में कम जाना जाता है, लेकिन दक्षिण भारत में इसे आज भी परंपरा के साथ निभाया जाता है।

दक्षिण भारत में प्रचलन

गौरी–तृतीया व्रत को लेकर यह बात अक्सर सुनने में आती है कि यह व्रत केवल दक्षिण भारत में ही किया जाता है। वहाँ आज भी कई घरों में यह व्रत पीढ़ियों से चलता आ रहा है। कहीं-कहीं इसे परिवार की स्त्रियाँ मिलकर करती हैं, तो कहीं अकेले ही सादगी से पूजा हो जाती है।

आज के समय में इसका महत्व

आज के भागदौड़ भरे जीवन में ऐसे व्रत हमें थोड़ी देर रुकने का अवसर देते हैं। बिना ज़्यादा नियम-कायदे, बस श्रद्धा के साथ की गई यह पूजा मन को हल्का कर देती है। शायद इसी वजह से यह व्रत अब भी जीवित है, भले ही बहुत ज़्यादा चर्चित न हो।

अंतिम विचार

गौरी–तृतीया व्रत हमें यह सिखाता है कि पूजा का असली अर्थ शोर-शराबा नहीं, बल्कि भाव है। अगर मन सच्चा हो, तो छोटी सी पूजा भी बड़ा असर छोड़ जाती है।
कभी मौका मिले, तो इस व्रत के बारे में जानकर इसे अपनाना बुरा नहीं… आखिर परंपराएँ तभी जीवित रहती हैं, जब हम उन्हें समझकर निभाते हैं।

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कुन्दचतुर्थी व्रत: सौभाग्य और श्रद्धा का सरल पर्व

 माघ महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को कुन्दचतुर्थी मनाई जाती है। यह व्रत बहुत ज़्यादा दिखावे वाला नहीं है, बल्कि सादगी, नियम और भाव से जुड़ा हुआ पर्व माना जाता है। गाँव-कस्बों में इसे आज भी परंपरागत ढंग से मनाया जाता है, जहाँ बातें कम और भाव ज़्यादा होते हैं।


कुन्दचतुर्थी को गौरीचतुर्थी क्यों कहते हैं

कई स्थानों पर कुन्दचतुर्थी को गौरीचतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन देवी गौरी की पूजा की जाती है। मान्यता है कि यह तिथि स्त्रियों के सौभाग्य, गृहशांति और पारिवारिक सुख से जुड़ी हुई है। शायद इसी कारण इसे महिलाओं का विशेष व्रत भी कहा जाता है।

व्रत की मुख्य विधि: उपवास का महत्व

इस व्रत की सबसे अहम बात है — चतुर्थी के दिन उपवास
कई लोग फलाहार करते हैं, तो कुछ केवल एक समय भोजन करते हैं। यहाँ ज़्यादा नियमों की जटिलता नहीं है, बस मन और तन से संयम ज़रूरी माना गया है। बुज़ुर्ग अक्सर कहते हैं कि “जितना सादा व्रत, उतना गहरा फल।”

कुन्द के फूल और दान की परंपरा

कुन्दचतुर्थी में कुन्द के फूलों का विशेष महत्व बताया गया है। इसके साथ-साथ साग, नमक, शक्कर, जीरा जैसी साधारण चीज़ों का दान किया जाता है।
यह दान विशेष रूप से कुमारियों को देने की परंपरा है। माना जाता है कि इन दानों से जीवन में सुख-समृद्धि और सौभाग्य बढ़ता है।

कई घरों में आज भी ये चीज़ें सुबह-सुबह अलग रख ली जाती हैं, और पूजा के बाद किसी ज़रूरतमंद या कन्या को दे दी जाती हैं।

धार्मिक मान्यताएँ और लोकविश्वास

शास्त्रों में इस व्रत का उल्लेख मिलता है, लेकिन लोकजीवन में इसकी पहचान अनुभवों से बनी है। लोगों का विश्वास है कि कुन्दचतुर्थी का व्रत करने से

  • दांपत्य जीवन में मधुरता आती है

  • घर का वातावरण शांत रहता है

  • स्त्रियों को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है

हालाँकि हर घर की परंपरा थोड़ी अलग हो सकती है, पर भाव सबका एक-सा ही होता है।

आज के समय में कुन्दचतुर्थी

आज की तेज़ ज़िंदगी में ऐसे छोटे व्रत हमें ठहरना सिखाते हैं। कुन्दचतुर्थी कोई भारी-भरकम पर्व नहीं है, फिर भी इसकी सादगी में एक अलग शांति छुपी है।
थोड़ा सा उपवास, थोड़ा सा दान और मन में श्रद्धा — बस यही इसका सार है।

शायद इसी कारण यह व्रत पीढ़ियों से चलता आ रहा है, बिना शोर-शराबे के, बिल्कुल अपने तरीके से। #कुन्दचतुर्थी #गौरीचतुर्थी #माघमास #हिंदूव्रत #देवीपूजन #भारतीयपरंपरा #व्रतकथा #सनातनधर्म #धार्मिकमान्यताएं #सौभाग्यव्रत #हिंदूसंस्कृति #भारतीयरीतिरिवाज #व्रतऔरउपवास #SanatanDharma #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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रथसप्तमी व्रत: सूर्य उपासना का पावन पर्व

 माघ मास की शुक्ल सप्तमी को मनाया जाने वाला रथसप्तमी व्रत भारतीय सनातन परम्परा में एक विशेष स्थान रखता है। यह दिन सूर्यदेव को समर्पित होता है और माना जाता है कि इसी तिथि से सूर्य का रथ उत्तरायण की गति में पूर्ण तेज के साथ अग्रसर होता है। गाँव-कस्बों से लेकर नगरों तक, इस दिन की एक अलग ही आभा देखने को मिलती है।


रथसप्तमी का धार्मिक महत्व

रथसप्तमी को कई स्थानों पर महासप्तमी भी कहा जाता है। मान्यता है कि सृष्टि के प्रारम्भिक काल में इसी दिन सूर्यदेव को उनका दिव्य रथ प्राप्त हुआ था। इसलिए यह तिथि केवल एक व्रत नहीं, बल्कि सूर्य के तेज, स्वास्थ्य और जीवनशक्ति से जुड़ा पर्व है।
कहते हैं, जो व्यक्ति श्रद्धा से इस व्रत का पालन करता है, उसके जीवन से रोग, आलस्य और दुर्भाग्य धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं।

व्रत का संकल्प और प्रारम्भ

इस व्रत का संकल्प षष्ठी तिथि की रात्रि में लिया जाता है। उसी समय से व्रती संयम, शुद्ध आहार और मन की पवित्रता का ध्यान रखता है।
सप्तमी के दिन उपवास रखने की परम्परा है। कुछ लोग फलाहार करते हैं, तो कुछ केवल जल ग्रहण करते हैं। यहाँ नियमों से अधिक भावना को महत्व दिया जाता है, यही इस व्रत की खास बात है।

रथ और सूर्य पूजन की विधि

रथसप्तमी में रथ का विशेष महत्व है। शास्त्रों में सोने या चाँदी से बने अश्व, सारथी और रथ का वर्णन मिलता है। आज के समय में लोग अपनी सामर्थ्य अनुसार प्रतीकात्मक रथ भी बनाते हैं।

मध्याह्न काल में रथ को वस्त्र से ढके मण्डप में रखा जाता है। कुंकुम, पुष्प, अक्षत आदि से रथ की पूजा होती है। रथ के भीतर सूर्यदेव की स्वर्ण प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है।
इसके बाद मंत्रोच्चारण के साथ सूर्य की स्तुति की जाती है और मन ही मन अपनी कामना कही जाती है। यह क्षण बड़ा भावुक होता है, कई बार आँखें अपने-आप नम हो जाती हैं।

रात्रि जागरण की परम्परा

रथसप्तमी की रात्रि को जागरण का विधान है। नृत्य, संगीत, भजन-कीर्तन के माध्यम से सूर्यदेव का स्मरण किया जाता है।
मान्यता है कि इस रात व्रती को सोना नहीं चाहिए, यानी पलकें बंद नहीं करनी चाहिए। यह नियम कठिन लगता है, पर इसी में साधना छुपी है। पूरी रात जागते हुए इंसान अपने भीतर भी एक नई रोशनी महसूस करता है।

अगले दिन का विधान

अगले दिन प्रातःकाल स्नान के बाद दान-पुण्य किया जाता है। अन्न, वस्त्र या यथाशक्ति दान देना शुभ माना गया है।
अंत में गुरु या योग्य ब्राह्मण को रथ का दान किया जाता है। यह दान केवल वस्तु का नहीं, बल्कि अहंकार छोड़ने का प्रतीक भी है।

पुराणों में रथसप्तमी की कथा

धर्मग्रंथों में एक प्रसिद्ध कथा आती है जिसमें बताया गया है कि इस व्रत के प्रभाव से एक वृद्ध राजा को संतान प्राप्त हुई। वह संतान जन्म से रोगग्रस्त थी, पर रथसप्तमी व्रत के पुण्य से न केवल स्वस्थ हुई, बल्कि आगे चलकर महान चक्रवर्ती राजा बनी।
इस कथा को सुनते समय मन में अपने-आप विश्वास जाग उठता है कि श्रद्धा में सच में बहुत शक्ति होती है।

आज के समय में रथसप्तमी

आज की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में शायद हम पूरा विधान न कर पाएं, पर मन से सूर्यदेव को स्मरण करना, प्रातःकाल सूर्य को जल अर्पित करना और उस दिन संयम रखना भी अपने-आप में बड़ा पुण्य है।
रथसप्तमी हमें यह याद दिलाती है कि सूर्य केवल आकाश का पिंड नहीं, बल्कि हमारे जीवन की धड़कन हैं।

अंत में

रथसप्तमी कोई बोझिल नियमों वाला व्रत नहीं, बल्कि भीतर की रोशनी को जगाने का पर्व है। अगर इस दिन थोड़ी-सी भी श्रद्धा और सच्चा भाव जुड़ जाए, तो व्रत अपने-आप सफल हो जाता है।
कभी-कभी लगता है, असली रथ तो हमारे भीतर चलता है… बस उसे सही दिशा देनी होती है।

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संकष्टहर गणपति व्रत: कष्टों से मुक्ति का सरल मार्ग

 भारतीय सनातन परंपरा में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा गया है। जब जीवन में बार-बार रुकावटें आने लगती हैं, काम बनते-बनते बिगड़ जाते हैं, तब श्रद्धालु संकष्टहर गणपति व्रत का सहारा लेते हैं। यह व्रत न केवल धार्मिक है, बल्कि मन को धैर्य और विश्वास भी देता है।


संकष्टहर गणपति व्रत कब किया जाता है

यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है। इसे तिथिव्रत माना गया है।
इस दिन भगवान गणेश की पूजा चन्द्रोदय के बाद की जाती है। मान्यता है कि चंद्रमा के दर्शन के बाद ही पूजा का फल पूर्ण रूप से प्राप्त होता है।

व्रत का शास्त्रीय आधार

धार्मिक ग्रंथ व्रतरत्नाकर में इस व्रत का बहुत विस्तार से उल्लेख मिलता है। इसमें ऋग्वेद के मंत्र, पुरुषसूक्त के श्लोक, नारदपुराण तथा अन्य पौराणिक मंत्रों का संदर्भ दिया गया है।
कहा जाता है कि इस व्रत की विधि स्वयं व्यास जी ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताई थी।

संकष्टहर गणपति व्रत की पूजा विधि

इस व्रत में भगवान गणेश की पूजा षोडशोपचार विधि से की जाती है।
पूजा के समय विशेष रूप से इन बातों का ध्यान रखा जाता है:

  • गणपति के 21 नामों के साथ पूजा

  • उतनी ही संख्या में दूर्वा की गांठें

  • भृंगराज, बिल्व, बदरी, धतूरा और शमी के पत्ते

  • लाल फूल, जो गणेश जी को अत्यंत प्रिय माने जाते हैं

इसके अतिरिक्त भगवान गणेश के 108 नामों से भी पूजन किया जाता है, जिससे व्रत का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है।

मोदक और दक्षिणा का महत्व

पूजा के अंत में व्रत करने वाले व्यक्ति को पाँच मोदक और दक्षिणा अर्पित करने का विधान बताया गया है।
मोदक गणेश जी का प्रिय भोग है, इसलिए इसे अर्पित करना शुभ माना जाता है। कई लोग मानते हैं कि मोदक चढ़ाने से मनोकामना जल्दी पूर्ण होती है।

‘संकष्ट’ शब्द का अर्थ क्या है

यहाँ संकष्ट शब्द बहुत गहरा अर्थ रखता है।
कष्ट का मतलब है क्लेश या पीड़ा और सम् उपसर्ग उस पीड़ा की अधिकता को दर्शाता है।
अर्थात जब कष्ट सामान्य न होकर बहुत अधिक हो जाए, तब संकष्टहर गणपति व्रत किया जाता है।

क्यों किया जाता है यह व्रत

मान्यता है कि यह व्रत करने से

  • जीवन की बाधाएँ कम होती हैं

  • मानसिक तनाव में शांति मिलती है

  • कार्यों में आ रही रुकावटें धीरे-धीरे दूर होती हैं

बहुत से श्रद्धालुओं का अनुभव है कि इस व्रत को सच्चे मन से करने पर रास्ते अपने-आप खुलने लगते हैं… हालाँकि हर किसी का अनुभव थोड़ा अलग भी हो सकता है।

अंत में एक बात

संकष्टहर गणपति व्रत केवल विधि या नियमों तक सीमित नहीं है। इसमें सबसे ज़रूरी है श्रद्धा
अगर मन सच्चा हो और भाव शुद्ध हों, तो भगवान गणेश किसी न किसी रूप में सहारा ज़रूर देते हैं।
कभी-कभी समाधान तुरंत नहीं मिलता, लेकिन धैर्य अपने-आप आ जाता है… और शायद वही सबसे बड़ा चमत्कार है।

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माघस्नान: आस्था, परंपरा और पुण्य का महीना

 भारत की सनातन परंपराओं में कुछ ऐसे व्रत और नियम हैं, जो केवल कर्मकांड नहीं बल्कि जीवन को भीतर से छू लेने वाले अनुभव बन जाते हैं। माघस्नान भी उन्हीं में से एक है। यह कोई नई परंपरा नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही श्रद्धा की धारा है, जिसमें ठंडे जल, सन्नाटे भरी सुबह और मन की गहराइयों से निकली प्रार्थना शामिल होती है।


माघस्नान क्या है?

माघ मास में प्रातःकाल किसी पवित्र, बहते जल में स्नान करना माघस्नान कहलाता है। पुराने समय से यह माना जाता रहा है कि इस मास में किया गया स्नान केवल शरीर को नहीं, बल्कि मन और कर्मों को भी शुद्ध करता है। विशेष रूप से गंगा जैसी पवित्र नदी में स्नान को अत्यन्त फलदायी कहा गया है।

स्नान का सही समय कब माना गया है?

माघस्नान का समय भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना स्वयं स्नान। शास्त्रों और परंपरा के अनुसार सबसे उत्तम समय वह होता है जब आकाश में तारे और नक्षत्र अभी दिखाई दे रहे हों। इसके बाद वह घड़ी भी ठीक मानी जाती है जब तारे तो दिखें, लेकिन सूर्य पूरी तरह निकला न हो।
एक बात बुज़ुर्ग अक्सर कहते थे—“सूरज निकल आया, तो स्नान का रस कम हो गया।” शायद इसी कारण सूर्योदय के बाद का समय उतना श्रेष्ठ नहीं माना गया।

माघस्नान कब से कब तक?

माघस्नान का आरम्भ पौष शुक्ल एकादशी या कुछ परंपराओं में पौष पूर्णिमा से माना जाता है। यह स्नान पूरे एक मास तक चलता है और माघ शुक्ल द्वादशी या पूर्णिमा को समाप्त होता है।
कुछ लोग इसे सौर गणना से भी जोड़ते हैं और मानते हैं कि जब सूर्य मकर राशि में हो और उस समय माघ मास में प्रातः स्नान किया जाए, तो वह असाधारण पुण्य प्रदान करता है। गाँवों में आज भी लोग इसे “सूर्य के मकर में आने का स्नान” कहकर याद करते हैं।

सभी के लिए है माघस्नान

माघस्नान किसी एक वर्ग या अवस्था तक सीमित नहीं है। यह स्त्री-पुरुष, युवा-वृद्ध सभी के लिए समान रूप से बताया गया है। शायद यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है—यह किसी से भेद नहीं करता।
कई लोग रोज़ स्नान के साथ दीपदान, जप या साधारण सा मौन भी रखते हैं। कोई नियम बहुत भारी नहीं, बस मन में श्रद्धा होनी चाहिए।

सबसे पुण्यकारी स्थान: संगम

यदि स्थान की बात करें, तो माघस्नान के लिए सबसे श्रेष्ठ स्थान गंगा-यमुना संगम माना गया है, जहाँ यमुना और गंगा का मिलन होता है। आज भी माघ मास में यहाँ लाखों लोग ठंडी सुबह में डुबकी लगाते हैं।
कई बुज़ुर्ग बताते हैं कि संगम पर किया गया एक स्नान, कई तीर्थों के बराबर फल देता है। सच है या नहीं, यह तो श्रद्धा जाने, पर वहाँ की सुबह कुछ अलग ही होती है।

ग्रंथों में माघस्नान का उल्लेख

पुराणों और धर्मग्रंथों में माघस्नान का विस्तृत वर्णन मिलता है। दान, नियम, संयम और स्नान—इन सबका महत्व अलग-अलग बताया गया है। माघ और फाल्गुन मास में प्रातः स्नान की विशेष प्रशंसा भी ग्रंथों में आती है।
इतना ही नहीं, माघ मेले और इस परंपरा का उल्लेख पुराने शोध और ऐतिहासिक लेखों में भी मिलता है, जिससे पता चलता है कि यह परंपरा कितनी गहरी जड़ें रखती है।

आज के समय में माघस्नान का अर्थ

आज जब जीवन बहुत तेज़ हो गया है, तब माघस्नान शायद हमें थोड़ी देर ठहरना सिखाता है। ठंडी हवा, शांत जल और उगता हुआ सूरज—इनके बीच खड़े होकर इंसान अपने आप से भी मिल लेता है।
शायद माघस्नान का असली फल यही है… बाहर नहीं, भीतर की सफ़ाई।

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मकर-संक्रान्ति गीत

   मकर-संक्रान्ति आई रे, ले आई उजियारा, सूरज बदले अपनी चाल, जग बोले जय-जयकारा। तिल-गुड़ की ये मिठास में, घुल जाए हर एक दूरी, दान, स्ना...