Wednesday, January 14, 2026

मकर-संक्रान्ति गीत

  मकर-संक्रान्ति आई रे,

ले आई उजियारा,
सूरज बदले अपनी चाल,
जग बोले जय-जयकारा।
तिल-गुड़ की ये मिठास में,
घुल जाए हर एक दूरी,
दान, स्नान, भक्ति के रंग,
जागे भारत की मंज़ूरी।


ठंडी हवाओं के आँचल में,
जलती आस्था की लौ,
गंगा तट पर भोर हुई,
मन ने ओढ़ी पुण्य की चादर ओ।
घी का दीप, कम्बल का दान,
करुणा का सच्चा सार,
जो झुका आज ज़रूरतमंद पर,
वही है सबसे महान इंसान।


मकर-संक्रान्ति आई रे,
ले आई उजियारा,
सूरज बदले अपनी चाल,
जग बोले जय-जयकारा।


संगम में गूंजे मंत्र ध्वनि,
देव भी उतरे स्नान को,
माघ मेले की रेत पे,
श्रद्धा लिखे इतिहास को।
गंगासागर की लहर कहे,
सगर-सुतों की गाथा,
आस्था जब दृढ़ हो जाए,
कट जाए हर एक बाधा।


कहीं खिचड़ी, कहीं लोहड़ी,
कहीं पतंगों का शोर,
तिळगुळ घ्या गोड बोला,
मिठास भरे हर एक डोर।
पोंगल की हांडी उफन पड़ी,
धरती मुस्काए आज,
किसान के पसीने से,
सजे प्रकृति के ताज।


अंधकार से प्रकाश की ओर,
चलने का यह पैग़ाम,
जैसे सूर्य बढ़े उत्तर को,
वैसे बदले जीवन की शाम।
त्याग, तपस्या, प्रेम भाव,
यही तो है त्योहार,
दिल से दिल को जोड़ सके,
वही है सच्चा उपहार।


तिल के लड्डू, वायन सजे,
सास के चरणों में शीश,
चौदह दान, चौदह व्रत,
परंपरा में विश्वास विशिष्ट।
रिश्तों में जो मान रहे,
वही कुल का मान,
संस्कारों से सींचा घर,
बने स्वर्ग समान।


मकर-संक्रान्ति आई रे,
नए सवेरे का गीत,
बदलाव को अपनाने का,
जीवन से कहे प्रीत।
थोड़ी धूप, थोड़ा त्याग,
थोड़ा सा विश्वास,
इन्हीं से बनता भारत है,
इन्हीं में है उल्लास।


सूरज सा उजला मन रखो,
दान सा निर्मल हाथ,
मकर-संक्रान्ति सिखा गई,
जीवन का सच्चा साथ। #मकरसंक्रान्ति #MakarSankrant i#उत्तरायण #SuryaDev #सनातनधर्म #HinduFestival #BhaktiGeet #SpiritualIndia

Thursday, January 08, 2026

मौनी अमावस्या: मौन, स्नान और दान की पावन तिथि

 भारत की सनातन परंपरा में कुछ तिथियाँ ऐसी हैं, जिनका नाम सुनते ही मन में श्रद्धा और शांति का भाव आ जाता है। माघ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या, जिसे हम मौनी अमावस्या कहते हैं, उन्हीं विशेष तिथियों में से एक है। यह दिन आत्मसंयम, मौन और सेवा का संदेश देता है।


मौनी अमावस्या का अर्थ और महत्व

मौनी अमावस्या का सीधा सा अर्थ है – मौन का पालन करने वाली अमावस्या। मान्यता है कि इस दिन मौन रहकर, या कम से कम वाणी पर संयम रखते हुए, स्नान और दान किया जाए तो उसका पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।
कहा जाता है कि इस दिन मुनियों जैसा आचरण करने से मन की चंचलता कम होती है और भीतर एक अलग ही शांति महसूस होती है।

सोमवार का संयोग: पुण्य में वृद्धि

यदि मौनी अमावस्या के दिन सोमवार का योग बन जाए, तो इस तिथि का महत्व और भी बढ़ जाता है। सोमवार भगवान शिव का प्रिय दिन माना जाता है, इसलिए इस संयोग में किया गया स्नान-दान विशेष फल देने वाला माना गया है।
ऐसे दिन गंगा तट या त्रिवेणी संगम पर स्नान करने की परंपरा है, हालाँकि हर किसी के लिए वहाँ पहुँचना संभव नहीं होता। फिर भी श्रद्धा के साथ किया गया कोई भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता।

स्नान के बाद क्या करें?

सुबह नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्नान करने के बाद दान का विशेष विधान बताया गया है। इस दिन—

  • तिल और तिल से बने लड्डू

  • तिल का तेल

  • आँवला

  • वस्त्र

इनका दान करना शुभ माना जाता है।
कई लोग यह भी मानते हैं कि इस दिन जरूरतमंदों को ऊनी कपड़े या कंबल देना बहुत बड़ा पुण्य है, खासकर सर्दी के मौसम में।

साधु-संतों और ब्राह्मणों की सेवा

मौनी अमावस्या पर साधु, महात्मा और ब्राह्मणों की सेवा को बहुत महत्व दिया गया है। उनके लिए भोजन की व्यवस्था करना, अग्नि प्रज्वलित करना और उन्हें कंबल, चादर या गर्म वस्त्र देना एक पवित्र कर्म माना जाता है।
कभी-कभी हम सोचते हैं कि छोटा सा दान क्या असर डालेगा, लेकिन शास्त्रों में कहा गया है कि भावना बड़ी हो तो छोटा कर्म भी बहुत फल देता है।

गुड़ और काले तिल का दान

इस दिन गुड़ में काले तिल मिलाकर लड्डू बनाए जाते हैं। इन लड्डुओं को लाल वस्त्र में बाँधकर ब्राह्मणों को दान करने की परंपरा है।
साथ ही, ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथाशक्ति दक्षिणा देना भी शुभ माना जाता है। यहाँ “यथाशक्ति” शब्द बहुत मायने रखता है, क्योंकि दान दिखावे के लिए नहीं, मन से होना चाहिए।

पितृ कार्य और श्राद्ध का विधान

मौनी अमावस्या केवल स्नान और दान तक सीमित नहीं है। इस दिन पितरों की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म करने का भी विधान है।
कई परिवारों में आज भी यह परंपरा निभाई जाती है, भले ही समय के साथ कुछ चीजें बदल गई हों।


अंत में एक बात…

मौनी अमावस्या हमें यह सिखाती है कि धर्म केवल कर्मकांड नहीं है, बल्कि संयम, करुणा और सेवा का नाम है।
अगर इस दिन हम थोड़ी देर मौन रह लें, किसी जरूरतमंद की मदद कर दें, या बस मन से किसी के लिए अच्छा सोच लें, तो शायद वही इस तिथि का असली अर्थ है। #MauniAmavasya #मौनीअमावस्या #MaghAmavasya #सनातनधर्म #पवित्रतिथि #स्नानदान #धार्मिकमान्यताएं #भारतीयसंस्कृति #आध्यात्मिकजीवन #पुण्यकर्म #SanatanCulture #SpiritualIndia #SanatanDharma #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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षट्तिला एकादशी: माघ मास की पावन एकादशी का गूढ़ महत्व

 भारतीय सनातन परंपरा में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है। माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षट्तिला एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी साधारण नहीं मानी जाती, बल्कि पापों के क्षय और पुण्य की वृद्धि करने वाली कही गई है। हमारे बुज़ुर्ग कहा करते थे कि अगर इस एक दिन को सही विधि से जी लिया जाए, तो जीवन की बहुत-सी उलझनें अपने आप सुलझ जाती हैं।


षट्तिला एकादशी नाम क्यों पड़ा?

इस एकादशी का नाम “षट्तिला” इसलिए पड़ा क्योंकि इस दिन तिल का प्रयोग छह अलग-अलग रूपों में किया जाता है। तिल को भारतीय संस्कृति में शुद्धता, दान और तपस्या का प्रतीक माना गया है। सर्दी के मौसम में तिल का महत्व और भी बढ़ जाता है, और माघ मास में तो इसका पुण्य कई गुना माना गया है।

षट्तिला एकादशी पर तिल के छह प्रयोग

इस दिन किए जाने वाले छह तिल कर्म इस प्रकार हैं—

  1. तिल मिले जल से स्नान करना

  2. शरीर पर तिल का उबटन लगाना

  3. तिल से हवन करना

  4. तिल युक्त जल का पान करना

  5. तिल से बना भोजन या फलाहार करना

  6. तिल का दान करना

धारणा है कि इन छह कर्मों से व्यक्ति के जाने-अनजाने पाप नष्ट हो जाते हैं। खासतौर पर काले तिल और काली गाय का दान इस दिन अत्यंत शुभ माना गया है। गांवों में आज भी लोग यह परंपरा निभाते हैं, भले ही साधनों की कमी क्यों न हो।

षट्तिला एकादशी व्रत विधि

व्रत की शुरुआत प्रातः स्नान से होती है। स्नान के बाद मन को शांत कर “श्रीकृष्ण” नाम का जप करना चाहिए। पूरे दिन उपवास रखा जाता है और रात्रि में जागरण का महत्व बताया गया है।

इस दिन भगवान का पूजन कर तिल से हवन किया जाता है और निम्न मंत्र से अर्घ्य अर्पित किया जाता है—

सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु महापुरुषपूर्वज ।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं लक्ष्म्या सह जगत्पते ॥

नैवेद्य में तिल मिले फल या फलाहार रखा जाता है। ब्राह्मणों को भी तिल युक्त भोजन कराने की परंपरा है। माना जाता है कि यह व्रत सच्चे मन से किया जाए तो अधूरी इच्छाएं भी पूरी हो जाती हैं।

षट्तिला एकादशी से जुड़ी भावपूर्ण कथा

इस व्रत से जुड़ी एक पुरानी कथा आज भी मन को छू जाती है। कहा जाता है कि एक ब्राह्मणी ने जीवनभर व्रत, उपवास और पति की सेवा निष्ठा से की। इन पुण्यों के कारण उसे वैकुण्ठ की प्राप्ति हुई।

लेकिन एक कमी रह गई थी। उसने कभी अन्न का दान नहीं किया था। एक बार उसने भगवान को कपाली रूप में केवल मिट्टी का एक ढेला दान दिया था। उसी के फलस्वरूप वैकुण्ठ में उसे सुंदर मिट्टी का घर तो मिला, लेकिन अन्न का अभाव बना रहा।

जब उसने यह बात भगवान से कही, तो भगवान की आज्ञा से उसने षट्तिला एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से न केवल उसका अभाव दूर हुआ, बल्कि उसे वैकुण्ठ में सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त हो गईं।

कहते हैं, दान छोटा हो या बड़ा, भावना शुद्ध होनी चाहिए—यही इस कथा का असली संदेश है।

निष्कर्ष

षट्तिला एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि जीवन को सरल और शुद्ध बनाने की सीख है। तिल जैसे छोटे से दाने में छुपा यह संदेश हमें सिखाता है कि दान, संयम और भक्ति से ही जीवन में संतुलन आता है। आज के समय में भी अगर हम इस व्रत की भावना को अपनाएं, तो मन का बोझ कुछ हल्का ज़रूर हो जाता है… शायद यही इसका असली फल है।

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लोहड़ी : पंजाब की मिट्टी से जुड़ा एक जीवंत पर्व

पंजाब की संस्कृति, वहां के लोकगीत, नाच-गाना और त्योहार—सब कुछ अपने आप में अलग ही रंग लिए होता है। इन्हीं रंगों में रचा-बसा एक खास त्योहार है लोहड़ी। सच कहें तो, पंजाब के पर्व-त्योहारों पर बात हो और लोहड़ी का ज़िक्र न आए, तो बात अधूरी ही रह जाती है।


लोहड़ी कब और क्यों मनाई जाती है

लोहड़ी हर साल माघ संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाई जाती है। यह त्योहार सर्दियों के विदा होने और नई फसल के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। गांवों में तो इसका उत्साह कुछ अलग ही देखने को मिलता है।

शाम होते-होते लोग लकड़ियाँ इकट्ठी करते हैं और खुले स्थान पर अग्नि जलाई जाती है। इस अग्नि में तिल, मूंगफली, रेवड़ी आदि डालकर लोग पूजा करते हैं और परिक्रमा लगाते हैं। यह दृश्य बहुत ही सादा लेकिन मन को छू लेने वाला होता है।

बच्चों की लोहड़ी और घर-घर की रौनक

लोहड़ी का सबसे रोचक पहलू बच्चों से जुड़ा है। छोटे-छोटे बच्चे टोली बनाकर गलियों और मोहल्लों में घूमते हैं। वे घर-घर जाकर लोहड़ी के गीत गाते हैं और लकड़ियाँ या कुछ खाने की चीज़ें मांगते हैं।

इन बच्चों के चेहरों की खुशी, उनकी आवाज़ में मासूमियत—सब कुछ लोहड़ी को खास बना देता है। कई बार सुर ठीक नहीं होते, शब्द इधर-उधर हो जाते हैं, लेकिन वही तो इसकी खूबसूरती है।

लोहड़ी का प्रसिद्ध लोकगीत

लोहड़ी के समय गाया जाने वाला एक लोकगीत बहुत मशहूर है, जो लगभग हर बच्चे की ज़ुबान पर होता है—

सुंदर मुंदरिये! हो
तेरा कौन बेचारा, हो
दुल्ला भट्टी वाला, हो
दुल्ले धी ब्याही, हो
सेर शक्कर आई, हो
कुड़ी दे बोझे पाई, हो
कुड़ी दा लाल पटारा, हो…

यह गीत सिर्फ शब्द नहीं है, बल्कि एक कहानी है, एक याद है।

कौन थे दुल्ला भट्टी

अब सवाल उठता है कि आखिर यह दुल्ला भट्टी कौन थे, जिनकी याद आज भी लोहड़ी के गीतों में ज़िंदा है। लोककथाओं के अनुसार, दुल्ला भट्टी एक मुसलमान थे, लेकिन इंसानियत उनके दिल में बसती थी।

कहते हैं कि एक ब्राह्मण की बहुत छोटी और सुंदर कुँआरी बेटी को कुछ गुंडों ने उठा लिया था। दुल्ला भट्टी ने न सिर्फ उस बच्ची को छुड़ाया, बल्कि उसकी शादी की पूरी जिम्मेदारी भी उठाई। उन्होंने एक ब्राह्मण युवक से उसका विवाह करवाया और दहेज में एक सेर शक्कर दी।

क्यों आज भी याद किया जाता है दुल्ला भट्टी को

दुल्ला भट्टी का यह काम किसी धर्म या जाति से ऊपर था। शायद इसी वजह से आज भी लोग उसे भूल नहीं पाए हैं। लोहड़ी के दिन बच्चों द्वारा गाए जाने वाले गीतों में उनका नाम लिया जाता है, उनकी कहानी दोहराई जाती है।

यह त्योहार हमें यही सिखाता है कि सच्ची बहादुरी और इंसानियत समय के साथ कभी पुरानी नहीं होती।

आज की लोहड़ी और बदलता रूप

आज शहरों में लोहड़ी थोड़ी आधुनिक हो गई है। डीजे, बड़ी पार्टियां और सेल्फी का दौर आ गया है। लेकिन गांवों में अब भी वही पुरानी खुशबू, वही आग के चारों ओर बैठना और वही बच्चों की आवाज़ सुनाई देती है।

और शायद, यही असली लोहड़ी है—सादगी से भरी, दिल से जुड़ी हुई। #LohriFestival #PunjabiCulture #IndianFestivals #LohriCelebration #PunjabDiShaan #DesiTraditions #FolkFestivals #IndianCulture #LohriSpecia l#DullaBhatti #RuralIndia #FestivalVibes #CulturalHeritage #DesiRoots #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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Thursday, January 01, 2026

77वाँ गणतन्त्र दिवस: एक जिम्मेदार लोकतंत्र की धड़कन

हर साल 26 जनवरी का दिन आते ही मन में एक अलग-सी हलचल शुरू हो जाती है। सुबह-सुबह तिरंगे को देखते ही दिल अपने-आप भर आता है। 77वाँ गणतन्त्र दिवस भी कुछ ऐसा ही एहसास लेकर आया है—गर्व, आत्मचिंतन और आगे बढ़ने का संकल्प। यह दिन सिर्फ छुट्टी या परेड देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें याद दिलाता है कि हम एक गणराज्य हैं, जहाँ असली ताकत जनता में निहित है।


गणतन्त्र दिवस का अर्थ क्या है?

अक्सर हम गणतन्त्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस को एक ही तराजू में रख देते हैं, लेकिन दोनों का भाव अलग है। स्वतंत्रता हमें आज़ादी देती है, जबकि गणतन्त्र हमें अधिकारों के साथ जिम्मेदारी भी सौंपता है।
26 जनवरी 1950 को देश ने अपना संविधान अपनाया और तभी से भारत ने खुद को कानून से चलने वाला राष्ट्र घोषित किया। यह सोच अपने-आप में बहुत बड़ी थी, खासकर उस समय के लिए।

26 जनवरी ही क्यों?

इस सवाल का जवाब इतिहास में छिपा है।
1930 में इसी तारीख को पूर्ण स्वराज की घोषणा की गई थी। इसलिए जब संविधान लागू करने का समय आया, तो 26 जनवरी को चुना गया। यह तारीख हमें याद दिलाती है कि आज़ादी सिर्फ मिलने से नहीं, बल्कि उसे सही दिशा में चलाने से सार्थक होती है।

77वाँ साल: अनुभव और उम्मीद के बीच

77 साल कोई छोटी अवधि नहीं होती। इतने समय में देश ने बहुत कुछ देखा है—उपलब्धियाँ भी, चुनौतियाँ भी।
आज का भारत तकनीक में आगे है, युवाओं से भरा है और दुनिया में अपनी पहचान मजबूती से रख रहा है। लेकिन साथ-साथ यह भी सच है कि हमें अब भी कई मोर्चों पर खुद को बेहतर बनाना है।
77वाँ गणतन्त्र दिवस इसी संतुलन की याद दिलाता है—गर्व भी और जिम्मेदारी भी।

परेड: सिर्फ शक्ति प्रदर्शन नहीं

नई दिल्ली की परेड अक्सर चर्चा में रहती है। सेना की टुकड़ियाँ, झाँकियाँ, झंडे—सब कुछ देखने में भव्य होता है।
लेकिन अगर गहराई से देखें तो यह परेड सिर्फ हथियारों या अनुशासन का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह बताती है कि भारत अपनी विविधता के साथ एकजुट है
हर राज्य की झाँकी एक कहानी कहती है—कभी संस्कृति की, कभी विकास की, तो कभी लोकजीवन की।

संविधान: किताब नहीं, जीवन दर्शन

हम में से बहुत-से लोगों ने संविधान को सिर्फ परीक्षा की किताब की तरह पढ़ा है। लेकिन असल में यह एक जीवन दर्शन है।
यह हमें बराबरी सिखाता है, बोलने की आज़ादी देता है और साथ ही यह भी कहता है कि दूसरों की आज़ादी का सम्मान करना उतना ही ज़रूरी है।
77वें गणतन्त्र दिवस पर यह सोचना जरूरी है कि क्या हम अपने अधिकारों जितना ही अपने कर्तव्यों को भी गंभीरता से लेते हैं?

युवा भारत और आने वाला कल

भारत युवा देश है, इसमें कोई शक नहीं।
गणतन्त्र दिवस युवाओं को यह याद दिलाता है कि देश का भविष्य सिर्फ सरकार या सिस्टम नहीं, बल्कि उनके रोज़मर्रा के फैसलों से बनता है।
ईमानदारी से काम करना, सही को सही और गलत को गलत कहना—ये छोटी बातें ही बड़े बदलाव की नींव बनती हैं।

एकता: हमारी असली पहचान

भाषा, धर्म, पहनावा, खान-पान—हम सब अलग-अलग हैं, और शायद यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
गणतन्त्र दिवस हमें हर साल यह याद दिलाता है कि मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं होने चाहिए।
देश तब मजबूत होता है, जब हम “मैं” से पहले “हम” सोचना सीखते हैं।

अंत में एक बात…

77वाँ गणतन्त्र दिवस कोई औपचारिक तारीख नहीं है। यह एक मौका है—
रुककर सोचने का, खुद से सवाल पूछने का और थोड़ा बेहतर नागरिक बनने का।
अगर हम अपने छोटे-छोटे कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाएँ, तो शायद अगली पीढ़ी को एक और मजबूत, और ज्यादा न्यायपूर्ण भारत मिल सके। #गणतन्त्रदिवस #77वांगणतन्त्रदिवस #26जनवरी #भारतीयसंविधान #लोकतंत्रभारत #मेरा_भारत #देशभक्ति #तिरंगा #भारतीयनागरिक #भारतकीपहचान #राष्ट्रीयगौरव #संविधानकीशक्ति #एकतामेंभारत #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #PanditVenimadhavGoswami For more information: www.benimadhavgoswami.com Website: www.himachalpublications.com WhatsApp 9540166678 Phone no. 9312832612 Facebook: Ribhukant Goswami Instagram: Ribhukant Goswami Twitter: Ribhukant Goswami Linkedin: Ribhukant Goswami Youtube: AstroGurukulam Youtube: Ribhukant Goswami

मकर-संक्रान्ति गीत

   मकर-संक्रान्ति आई रे, ले आई उजियारा, सूरज बदले अपनी चाल, जग बोले जय-जयकारा। तिल-गुड़ की ये मिठास में, घुल जाए हर एक दूरी, दान, स्ना...