Thursday, January 08, 2026

लोहड़ी : पंजाब की मिट्टी से जुड़ा एक जीवंत पर्व

पंजाब की संस्कृति, वहां के लोकगीत, नाच-गाना और त्योहार—सब कुछ अपने आप में अलग ही रंग लिए होता है। इन्हीं रंगों में रचा-बसा एक खास त्योहार है लोहड़ी। सच कहें तो, पंजाब के पर्व-त्योहारों पर बात हो और लोहड़ी का ज़िक्र न आए, तो बात अधूरी ही रह जाती है।


लोहड़ी कब और क्यों मनाई जाती है

लोहड़ी हर साल माघ संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाई जाती है। यह त्योहार सर्दियों के विदा होने और नई फसल के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। गांवों में तो इसका उत्साह कुछ अलग ही देखने को मिलता है।

शाम होते-होते लोग लकड़ियाँ इकट्ठी करते हैं और खुले स्थान पर अग्नि जलाई जाती है। इस अग्नि में तिल, मूंगफली, रेवड़ी आदि डालकर लोग पूजा करते हैं और परिक्रमा लगाते हैं। यह दृश्य बहुत ही सादा लेकिन मन को छू लेने वाला होता है।

बच्चों की लोहड़ी और घर-घर की रौनक

लोहड़ी का सबसे रोचक पहलू बच्चों से जुड़ा है। छोटे-छोटे बच्चे टोली बनाकर गलियों और मोहल्लों में घूमते हैं। वे घर-घर जाकर लोहड़ी के गीत गाते हैं और लकड़ियाँ या कुछ खाने की चीज़ें मांगते हैं।

इन बच्चों के चेहरों की खुशी, उनकी आवाज़ में मासूमियत—सब कुछ लोहड़ी को खास बना देता है। कई बार सुर ठीक नहीं होते, शब्द इधर-उधर हो जाते हैं, लेकिन वही तो इसकी खूबसूरती है।

लोहड़ी का प्रसिद्ध लोकगीत

लोहड़ी के समय गाया जाने वाला एक लोकगीत बहुत मशहूर है, जो लगभग हर बच्चे की ज़ुबान पर होता है—

सुंदर मुंदरिये! हो
तेरा कौन बेचारा, हो
दुल्ला भट्टी वाला, हो
दुल्ले धी ब्याही, हो
सेर शक्कर आई, हो
कुड़ी दे बोझे पाई, हो
कुड़ी दा लाल पटारा, हो…

यह गीत सिर्फ शब्द नहीं है, बल्कि एक कहानी है, एक याद है।

कौन थे दुल्ला भट्टी

अब सवाल उठता है कि आखिर यह दुल्ला भट्टी कौन थे, जिनकी याद आज भी लोहड़ी के गीतों में ज़िंदा है। लोककथाओं के अनुसार, दुल्ला भट्टी एक मुसलमान थे, लेकिन इंसानियत उनके दिल में बसती थी।

कहते हैं कि एक ब्राह्मण की बहुत छोटी और सुंदर कुँआरी बेटी को कुछ गुंडों ने उठा लिया था। दुल्ला भट्टी ने न सिर्फ उस बच्ची को छुड़ाया, बल्कि उसकी शादी की पूरी जिम्मेदारी भी उठाई। उन्होंने एक ब्राह्मण युवक से उसका विवाह करवाया और दहेज में एक सेर शक्कर दी।

क्यों आज भी याद किया जाता है दुल्ला भट्टी को

दुल्ला भट्टी का यह काम किसी धर्म या जाति से ऊपर था। शायद इसी वजह से आज भी लोग उसे भूल नहीं पाए हैं। लोहड़ी के दिन बच्चों द्वारा गाए जाने वाले गीतों में उनका नाम लिया जाता है, उनकी कहानी दोहराई जाती है।

यह त्योहार हमें यही सिखाता है कि सच्ची बहादुरी और इंसानियत समय के साथ कभी पुरानी नहीं होती।

आज की लोहड़ी और बदलता रूप

आज शहरों में लोहड़ी थोड़ी आधुनिक हो गई है। डीजे, बड़ी पार्टियां और सेल्फी का दौर आ गया है। लेकिन गांवों में अब भी वही पुरानी खुशबू, वही आग के चारों ओर बैठना और वही बच्चों की आवाज़ सुनाई देती है।

और शायद, यही असली लोहड़ी है—सादगी से भरी, दिल से जुड़ी हुई। #LohriFestival #PunjabiCulture #IndianFestivals #LohriCelebration #PunjabDiShaan #DesiTraditions #FolkFestivals #IndianCulture #LohriSpecia l#DullaBhatti #RuralIndia #FestivalVibes #CulturalHeritage #DesiRoots #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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Thursday, January 01, 2026

77वाँ गणतन्त्र दिवस: एक जिम्मेदार लोकतंत्र की धड़कन

हर साल 26 जनवरी का दिन आते ही मन में एक अलग-सी हलचल शुरू हो जाती है। सुबह-सुबह तिरंगे को देखते ही दिल अपने-आप भर आता है। 77वाँ गणतन्त्र दिवस भी कुछ ऐसा ही एहसास लेकर आया है—गर्व, आत्मचिंतन और आगे बढ़ने का संकल्प। यह दिन सिर्फ छुट्टी या परेड देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें याद दिलाता है कि हम एक गणराज्य हैं, जहाँ असली ताकत जनता में निहित है।


गणतन्त्र दिवस का अर्थ क्या है?

अक्सर हम गणतन्त्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस को एक ही तराजू में रख देते हैं, लेकिन दोनों का भाव अलग है। स्वतंत्रता हमें आज़ादी देती है, जबकि गणतन्त्र हमें अधिकारों के साथ जिम्मेदारी भी सौंपता है।
26 जनवरी 1950 को देश ने अपना संविधान अपनाया और तभी से भारत ने खुद को कानून से चलने वाला राष्ट्र घोषित किया। यह सोच अपने-आप में बहुत बड़ी थी, खासकर उस समय के लिए।

26 जनवरी ही क्यों?

इस सवाल का जवाब इतिहास में छिपा है।
1930 में इसी तारीख को पूर्ण स्वराज की घोषणा की गई थी। इसलिए जब संविधान लागू करने का समय आया, तो 26 जनवरी को चुना गया। यह तारीख हमें याद दिलाती है कि आज़ादी सिर्फ मिलने से नहीं, बल्कि उसे सही दिशा में चलाने से सार्थक होती है।

77वाँ साल: अनुभव और उम्मीद के बीच

77 साल कोई छोटी अवधि नहीं होती। इतने समय में देश ने बहुत कुछ देखा है—उपलब्धियाँ भी, चुनौतियाँ भी।
आज का भारत तकनीक में आगे है, युवाओं से भरा है और दुनिया में अपनी पहचान मजबूती से रख रहा है। लेकिन साथ-साथ यह भी सच है कि हमें अब भी कई मोर्चों पर खुद को बेहतर बनाना है।
77वाँ गणतन्त्र दिवस इसी संतुलन की याद दिलाता है—गर्व भी और जिम्मेदारी भी।

परेड: सिर्फ शक्ति प्रदर्शन नहीं

नई दिल्ली की परेड अक्सर चर्चा में रहती है। सेना की टुकड़ियाँ, झाँकियाँ, झंडे—सब कुछ देखने में भव्य होता है।
लेकिन अगर गहराई से देखें तो यह परेड सिर्फ हथियारों या अनुशासन का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह बताती है कि भारत अपनी विविधता के साथ एकजुट है।
हर राज्य की झाँकी एक कहानी कहती है—कभी संस्कृति की, कभी विकास की, तो कभी लोकजीवन की।

संविधान: किताब नहीं, जीवन दर्शन

हम में से बहुत-से लोगों ने संविधान को सिर्फ परीक्षा की किताब की तरह पढ़ा है। लेकिन असल में यह एक जीवन दर्शन है।
यह हमें बराबरी सिखाता है, बोलने की आज़ादी देता है और साथ ही यह भी कहता है कि दूसरों की आज़ादी का सम्मान करना उतना ही ज़रूरी है।
77वें गणतन्त्र दिवस पर यह सोचना जरूरी है कि क्या हम अपने अधिकारों जितना ही अपने कर्तव्यों को भी गंभीरता से लेते हैं?

युवा भारत और आने वाला कल

भारत युवा देश है, इसमें कोई शक नहीं।
गणतन्त्र दिवस युवाओं को यह याद दिलाता है कि देश का भविष्य सिर्फ सरकार या सिस्टम नहीं, बल्कि उनके रोज़मर्रा के फैसलों से बनता है।
ईमानदारी से काम करना, सही को सही और गलत को गलत कहना—ये छोटी बातें ही बड़े बदलाव की नींव बनती हैं।

एकता: हमारी असली पहचान

भाषा, धर्म, पहनावा, खान-पान—हम सब अलग-अलग हैं, और शायद यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।
गणतन्त्र दिवस हमें हर साल यह याद दिलाता है कि मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं होने चाहिए।
देश तब मजबूत होता है, जब हम “मैं” से पहले “हम” सोचना सीखते हैं।

अंत में एक बात…

77वाँ गणतन्त्र दिवस कोई औपचारिक तारीख नहीं है। यह एक मौका है—
रुककर सोचने का, खुद से सवाल पूछने का और थोड़ा बेहतर नागरिक बनने का।
अगर हम अपने छोटे-छोटे कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाएँ, तो शायद अगली पीढ़ी को एक और मजबूत, और ज्यादा न्यायपूर्ण भारत मिल सके। #गणतन्त्रदिवस #77वांगणतन्त्रदिवस #26जनवरी #भारतीयसंविधान #लोकतंत्रभारत #मेरा_भारत #देशभक्ति #तिरंगा #भारतीयनागरिक #भारतकीपहचान #राष्ट्रीयगौरव #संविधानकीशक्ति #एकतामेंभारत #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #PanditVenimadhavGoswami For more information: www.benimadhavgoswami.com Website: www.himachalpublications.com WhatsApp 9540166678 Phone no. 9312832612 Facebook: Ribhukant Goswami Instagram: Ribhukant Goswami Twitter: Ribhukant Goswami Linkedin: Ribhukant Goswami Youtube: AstroGurukulam Youtube: Ribhukant Goswami

मकर-संक्रान्ति पर्व : भारत की आत्मा से जुड़ा उत्सव

 भारत में पर्व केवल तारीख़ नहीं होते, वे जीवन की धड़कन होते हैं। हर त्योहार के साथ कोई न कोई भाव जुड़ा रहता है – कहीं आस्था, कहीं परंपरा तो कहीं लोकविश्वास। मकर-संक्रान्ति भी ऐसा ही एक पर्व है, जिसे देश के हर कोने में अलग-अलग नाम, रंग और रीति से मनाया जाता है।




मकर-संक्रान्ति का सांस्कृतिक महत्व

मकर-संक्रान्ति का नाम सुनते ही मन में सूर्य, स्नान, दान और तिल-गुड़ की मिठास घूमने लगती है। यह पर्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का प्रतीक माना जाता है। इसी के साथ सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर बढ़ते हैं, जिसे हमारे शास्त्रों में शुभ परिवर्तन कहा गया है।

संत तुलसीदास ने भी इस समय की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि माघ मास में सूर्य के मकर में आने पर तीर्थों की महत्ता और बढ़ जाती है। शायद इसी कारण इस दिन तीर्थों में स्नान का विशेष महत्व माना गया।

संगम स्नान और पुण्य की धारणा

मान्यता है कि मकर-संक्रान्ति के दिन प्रयागराज के संगम पर देवता भी स्नान के लिए आते हैं। गंगा, यमुना और सरस्वती के इस पावन संगम में डुबकी लगाना अनगिनत पुण्यों के समान माना गया है।

इसी दिन से प्रयागराज में माघ मेला आरंभ होता है, जो लगभग एक महीने तक चलता है। कुछ लोग कल्पवास भी करते हैं, जो अपने आप में बड़ा कठिन लेकिन आस्था से भरा व्रत होता है।

गंगासागर मेला : आस्था और कथा का संगम

पश्चिम बंगाल में मकर-संक्रान्ति पर गंगासागर का मेला लगता है। इसके पीछे पौराणिक कथा जुड़ी है कि इसी दिन गंगा माता सागर में आकर मिली थीं और राजा सगर के पुत्रों का उद्धार हुआ था।

आज भी लाखों श्रद्धालु यहाँ स्नान के लिए पहुँचते हैं। ठंड, हवा और लंबी यात्रा के बावजूद लोगों की आस्था ज़रा भी कम नहीं होती।

उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक, अलग-अलग रंग

महाराष्ट्र और गुजरात में यह पर्व तिल से जुड़ा है। तिल-गुड़ के लड्डू बाँटकर लोग एक-दूसरे से कहते हैं – “तिळगुळ घ्या, गोड गोड बोला।”
गुजरात में पतंगों से भरा आसमान इस पर्व को और खास बना देता है।

पंजाब और जम्मू-कश्मीर में यही पर्व ‘लोहड़ी’ के रूप में मनाया जाता है। अलाव के चारों ओर गीत, नृत्य और मूंगफली-रेवड़ी… माहौल अपने आप में अलग ही होता है। सिन्धी समाज इसे एक दिन पहले ‘लाल लोही’ कहकर मनाता है।

दक्षिण भारत में पोंगल का उत्साह

तमिलनाडु में मकर-संक्रान्ति को ‘पोंगल’ कहा जाता है। नई फसल से बने चावल, दाल और तिल से पोंगल पकाया जाता है और सूर्य देव को अर्पित किया जाता है। यह पर्व किसान और प्रकृति के रिश्ते को सम्मान देने का दिन है।
यहीं से तमिल पंचांग के अनुसार नया वर्ष भी शुरू माना जाता है।

अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा

ज्योतिष के अनुसार मकर-संक्रान्ति केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि प्रतीक है – अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का। इस दिन के बाद दिन बड़े होने लगते हैं, रातें छोटी होती जाती हैं।
सूर्य ऊर्जा का स्रोत है, और उसकी बढ़ती रोशनी जीवन में नई चेतना भरती है। शायद इसी वजह से यह पर्व हमें आशा, मेहनत और सकारात्मक सोच की सीख देता है।

अंत में…

मकर-संक्रान्ति कोई एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि भारत की विविधता और एकता का जीवंत उदाहरण है। कहीं स्नान, कहीं दान, कहीं तिल की मिठास तो कहीं फसल की खुशी।
हर रूप में यह पर्व यही कहता है – बदलाव को अपनाओ, प्रकृति के साथ चलो और जीवन में उजाला बनाए रखो।
थोड़ा ठंडा मौसम, थोड़ा धूप और ढेर सारी आस्था… बस यही तो मकर-संक्रान्ति है।

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मकर-संक्रान्ति महापर्व: आस्था, दान और नए आरम्भ का दिन

 भारत की परम्पराओं में मकर-संक्रान्ति का अपना अलग ही स्थान है। यह सिर्फ एक तिथि नहीं, बल्कि मौसम, मन और जीवन के बदलाव का संकेत है। सर्दी के बीच आती यह संक्रान्ति मन को भी भीतर से गरम कर देती है—दान, स्नान और भक्ति के भाव से।


मकर-संक्रान्ति का अर्थ क्या है?

जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, उसी समय मकर संक्रान्ति मानी जाती है। इसी दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है। इसलिए यह पर्व एक तरह से देवताओं के जागने का समय भी माना जाता है।

क्यों खास है यह दिन?

मकर संक्रान्ति के दिन किए गए कर्मों का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। स्नान, दान, जप, तप, श्राद्ध और व्रत—सब कुछ इस दिन विशेष फलदायी माना गया है। लोक मान्यता है कि आज किया गया दान सौ गुना होकर लौटता है।
इसी वजह से लोग सुबह-सुबह उठकर स्नान करते हैं और अपने सामर्थ्य अनुसार दान-पुण्य करते हैं।

घी और कम्बल दान का महत्व

इस दिन घी और कम्बल का दान बहुत पुण्यदायक माना गया है। खासकर माघ मास में इनका दान करने से जीवन के भोग भी मिलते हैं और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है—ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।
आज भी गाँवों में ठंड से कांपते जरूरतमंदों को कम्बल देना सबसे बड़ा धर्म समझा जाता है।

गंगा स्नान और तीर्थों की महिमा

मकर संक्रान्ति पर गंगा स्नान की परंपरा बहुत पुरानी है। प्रयागराज और गंगासागर में इस दिन होने वाला स्नान तो दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। मान्यता है कि इस दिन गंगा में डुबकी लगाने से पुराने पाप धुल जाते हैं और मन हल्का हो जाता है।
कई लोग आज के दिन गंगा तट पर बैठकर दान भी करते हैं।

अलग-अलग राज्यों में अलग नाम, वही भावना

भारत की खूबसूरती यही है कि हर प्रदेश में मकर संक्रान्ति अलग नाम से मनाई जाती है—

  • उत्तर प्रदेश में इसे खिचड़ी कहते हैं। खिचड़ी खाना और तिल-खिचड़ी का दान शुभ माना जाता है।

  • महाराष्ट्र में विवाहित महिलाएँ पहली संक्रान्ति पर तेल, नमक, कपास जैसी चीज़ें सौभाग्यवती स्त्रियों को देती हैं।

  • बंगाल में स्नान के बाद तिल दान की परंपरा है।

  • दक्षिण भारत में यही पर्व पोंगल के रूप में मनाया जाता है।

  • असम में इस दिन बिहू त्योहार की रौनक रहती है।

राजस्थान की खास परंपरा

राजस्थान में सौभाग्यवती महिलाएँ तिल के लड्डू, घेवर या मोतीचूर के लड्डुओं पर रुपया रखकर वायन बनाती हैं और सास को प्रणाम करके देती हैं। साथ ही चौदह की संख्या में किसी वस्तु का संकल्प लेकर चौदह ब्राह्मणों को दान किया जाता है। यह परंपरा आज भी कई घरों में निभाई जाती है।

 अंत में एक बात

मकर संक्रान्ति केवल तिल, लड्डू या पतंगों का त्योहार नहीं है। यह हमें सिखाती है कि जैसे सूर्य दिशा बदलता है, वैसे ही हमें भी अपने जीवन की दिशा को बेहतर बनाना चाहिए। थोड़ा दान, थोड़ा त्याग और थोड़ा सा अपनापन—यही इस पर्व की असली आत्मा है।

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भीम द्वादशी व्रत: आस्था, नियम और भाव की साधना

 सनातन धर्म में माघ मास का विशेष महत्व माना गया है। इसी मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीम द्वादशी व्रत किया जाता है। यह व्रत कम प्रसिद्ध होने के बावजूद अपने भीतर गहरी धार्मिक भावना और सरल विधि समेटे हुए है।

कई लोग इसे केवल एक तिथि समझकर छोड़ देते हैं, लेकिन वास्तव में यह व्रत संयम, सेवा और समर्पण की सीख देता है।



भीम द्वादशी व्रत कब किया जाता है

भीम द्वादशी का व्रत माघ शुक्ल पक्ष की द्वादशी को रखा जाता है। यह वही तिथि है, जो धार्मिक ग्रंथ हेमाद्रि में भी वर्णित मिलती है। इस दिन व्रत का उद्देश्य केवल उपवास नहीं, बल्कि व्रत को ब्रह्म को समर्पित भाव से करना होता है।

व्रत का मुख्य भाव

इस व्रत में सबसे अहम बात है —
“ब्रह्मार्पण भाव”।

अर्थात् जो भी व्रत किया जाए, उसे अपने अहंकार से नहीं, बल्कि ईश्वर को समर्पित मानकर किया जाए। यही कारण है कि इस दिन दान और ब्राह्मण भोजन को विशेष महत्व दिया गया है।

भीम द्वादशी व्रत की विधि

1. व्रत का संकल्प

प्रातः स्नान के बाद मन को शांत करके व्रत का संकल्प लिया जाता है। संकल्प में यह भावना रखी जाती है कि यह व्रत ब्रह्म को अर्पित है।

2. उपवास और नियम

इस दिन उपवास रखा जाता है। कुछ लोग फलाहार करते हैं, तो कुछ केवल जल पर रहते हैं। नियम वही होते हैं जो सामान्यतः एकादशी व्रत में माने जाते हैं।

3. ब्राह्मण भोजन

दोपहर या पारण से पहले योग्य ब्राह्मणों को श्रद्धा के साथ भोजन कराया जाता है। भोजन साधारण, सात्त्विक और मन से परोसा हुआ होना चाहिए। दिखावे से ज़्यादा भावना ज़रूरी मानी गई है।

4. पारण

ब्राह्मण भोजन के बाद स्वयं व्रत का पारण किया जाता है। पारण करते समय मन में कृतज्ञता और शांति का भाव होना चाहिए।

एकादशी से समानता

भीम द्वादशी व्रत की शेष सभी विधियाँ लगभग एकादशी व्रत के समान मानी जाती हैं।
जैसे—

  • इंद्रिय संयम

  • सात्त्विक आहार

  • क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूरी

यही कारण है कि यह व्रत सरल होते हुए भी प्रभावशाली माना जाता है।

क्यों करें भीम द्वादशी व्रत

ऐसा माना जाता है कि यह व्रत—

  • मन की शुद्धि करता है

  • दान और सेवा की प्रवृत्ति बढ़ाता है

  • जीवन में संतुलन और धैर्य लाता है

कुछ लोग कहते हैं कि इस व्रत को करने से मन हल्का हो जाता है, जैसे भीतर का बोझ थोड़ा कम हो गया हो… शायद यही इसकी असली शक्ति है।

अंतिम बात

भीम द्वादशी व्रत कोई कठिन साधना नहीं है। यह व्रत हमें यह याद दिलाता है कि धर्म केवल नियमों में नहीं, बल्कि भावना और नीयत में बसता है।
अगर मन सच्चा हो, तो छोटी-सी विधि भी बड़ा फल दे जाती है।

कभी मौका मिले, तो इस व्रत को श्रद्धा से करके देखिए… अनुभव अपने आप बोलने लगेगा।

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नौतपा 2026: आखिर क्यों माने जाते हैं साल के सबसे गर्म 9 दिन?

  गर्मी का मौसम आते ही लोग एक शब्द बार-बार सुनने लगते हैं — नौतपा । गांव हो या शहर, बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं, “अभी तो नौतपा बाकी है, असली...