भारत में पर्व केवल तारीख़ नहीं होते, वे जीवन की धड़कन होते हैं। हर त्योहार के साथ कोई न कोई भाव जुड़ा रहता है – कहीं आस्था, कहीं परंपरा तो कहीं लोकविश्वास। मकर-संक्रान्ति भी ऐसा ही एक पर्व है, जिसे देश के हर कोने में अलग-अलग नाम, रंग और रीति से मनाया जाता है।
मकर-संक्रान्ति का सांस्कृतिक महत्व
मकर-संक्रान्ति का नाम सुनते ही मन में सूर्य, स्नान, दान और तिल-गुड़ की मिठास घूमने लगती है। यह पर्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का प्रतीक माना जाता है। इसी के साथ सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर बढ़ते हैं, जिसे हमारे शास्त्रों में शुभ परिवर्तन कहा गया है।
संत तुलसीदास ने भी इस समय की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि माघ मास में सूर्य के मकर में आने पर तीर्थों की महत्ता और बढ़ जाती है। शायद इसी कारण इस दिन तीर्थों में स्नान का विशेष महत्व माना गया।
संगम स्नान और पुण्य की धारणा
मान्यता है कि मकर-संक्रान्ति के दिन प्रयागराज के संगम पर देवता भी स्नान के लिए आते हैं। गंगा, यमुना और सरस्वती के इस पावन संगम में डुबकी लगाना अनगिनत पुण्यों के समान माना गया है।
इसी दिन से प्रयागराज में माघ मेला आरंभ होता है, जो लगभग एक महीने तक चलता है। कुछ लोग कल्पवास भी करते हैं, जो अपने आप में बड़ा कठिन लेकिन आस्था से भरा व्रत होता है।
गंगासागर मेला : आस्था और कथा का संगम
पश्चिम बंगाल में मकर-संक्रान्ति पर गंगासागर का मेला लगता है। इसके पीछे पौराणिक कथा जुड़ी है कि इसी दिन गंगा माता सागर में आकर मिली थीं और राजा सगर के पुत्रों का उद्धार हुआ था।
आज भी लाखों श्रद्धालु यहाँ स्नान के लिए पहुँचते हैं। ठंड, हवा और लंबी यात्रा के बावजूद लोगों की आस्था ज़रा भी कम नहीं होती।
उत्तर भारत से दक्षिण भारत तक, अलग-अलग रंग
महाराष्ट्र और गुजरात में यह पर्व तिल से जुड़ा है। तिल-गुड़ के लड्डू बाँटकर लोग एक-दूसरे से कहते हैं – “तिळगुळ घ्या, गोड गोड बोला।”
गुजरात में पतंगों से भरा आसमान इस पर्व को और खास बना देता है।
पंजाब और जम्मू-कश्मीर में यही पर्व ‘लोहड़ी’ के रूप में मनाया जाता है। अलाव के चारों ओर गीत, नृत्य और मूंगफली-रेवड़ी… माहौल अपने आप में अलग ही होता है। सिन्धी समाज इसे एक दिन पहले ‘लाल लोही’ कहकर मनाता है।
दक्षिण भारत में पोंगल का उत्साह
तमिलनाडु में मकर-संक्रान्ति को ‘पोंगल’ कहा जाता है। नई फसल से बने चावल, दाल और तिल से पोंगल पकाया जाता है और सूर्य देव को अर्पित किया जाता है। यह पर्व किसान और प्रकृति के रिश्ते को सम्मान देने का दिन है।
यहीं से तमिल पंचांग के अनुसार नया वर्ष भी शुरू माना जाता है।
अंधकार से प्रकाश की ओर यात्रा
ज्योतिष के अनुसार मकर-संक्रान्ति केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि प्रतीक है – अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का। इस दिन के बाद दिन बड़े होने लगते हैं, रातें छोटी होती जाती हैं।
सूर्य ऊर्जा का स्रोत है, और उसकी बढ़ती रोशनी जीवन में नई चेतना भरती है। शायद इसी वजह से यह पर्व हमें आशा, मेहनत और सकारात्मक सोच की सीख देता है।
अंत में…
मकर-संक्रान्ति कोई एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि भारत की विविधता और एकता का जीवंत उदाहरण है। कहीं स्नान, कहीं दान, कहीं तिल की मिठास तो कहीं फसल की खुशी।
हर रूप में यह पर्व यही कहता है – बदलाव को अपनाओ, प्रकृति के साथ चलो और जीवन में उजाला बनाए रखो।
थोड़ा ठंडा मौसम, थोड़ा धूप और ढेर सारी आस्था… बस यही तो मकर-संक्रान्ति है।

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