मकर-संक्रान्ति आई रे,
ले आई उजियारा,
सूरज बदले अपनी चाल,
जग बोले जय-जयकारा।
तिल-गुड़ की ये मिठास में,
घुल जाए हर एक दूरी,
दान, स्नान, भक्ति के रंग,
जागे भारत की मंज़ूरी।
ठंडी हवाओं के आँचल में,
जलती आस्था की लौ,
गंगा तट पर भोर हुई,
मन ने ओढ़ी पुण्य की चादर ओ।
घी का दीप, कम्बल का दान,
करुणा का सच्चा सार,
जो झुका आज ज़रूरतमंद पर,
वही है सबसे महान इंसान।
मकर-संक्रान्ति आई रे,
ले आई उजियारा,
सूरज बदले अपनी चाल,
जग बोले जय-जयकारा।
संगम में गूंजे मंत्र ध्वनि,
देव भी उतरे स्नान को,
माघ मेले की रेत पे,
श्रद्धा लिखे इतिहास को।
गंगासागर की लहर कहे,
सगर-सुतों की गाथा,
आस्था जब दृढ़ हो जाए,
कट जाए हर एक बाधा।
कहीं खिचड़ी, कहीं लोहड़ी,
कहीं पतंगों का शोर,
तिळगुळ घ्या गोड बोला,
मिठास भरे हर एक डोर।
पोंगल की हांडी उफन पड़ी,
धरती मुस्काए आज,
किसान के पसीने से,
सजे प्रकृति के ताज।
अंधकार से प्रकाश की ओर,
चलने का यह पैग़ाम,
जैसे सूर्य बढ़े उत्तर को,
वैसे बदले जीवन की शाम।
त्याग, तपस्या, प्रेम भाव,
यही तो है त्योहार,
दिल से दिल को जोड़ सके,
वही है सच्चा उपहार।
तिल के लड्डू, वायन सजे,
सास के चरणों में शीश,
चौदह दान, चौदह व्रत,
परंपरा में विश्वास विशिष्ट।
रिश्तों में जो मान रहे,
वही कुल का मान,
संस्कारों से सींचा घर,
बने स्वर्ग समान।
मकर-संक्रान्ति आई रे,
नए सवेरे का गीत,
बदलाव को अपनाने का,
जीवन से कहे प्रीत।
थोड़ी धूप, थोड़ा त्याग,
थोड़ा सा विश्वास,
इन्हीं से बनता भारत है,
इन्हीं में है उल्लास।
सूरज सा उजला मन रखो,
दान सा निर्मल हाथ,
मकर-संक्रान्ति सिखा गई,
जीवन का सच्चा साथ। #मकरसंक्रान्ति #MakarSankrant i#उत्तरायण #SuryaDev #सनातनधर्म #HinduFestival #BhaktiGeet #SpiritualIndia
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