भारतीय सनातन परंपरा में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है। माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षट्तिला एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी साधारण नहीं मानी जाती, बल्कि पापों के क्षय और पुण्य की वृद्धि करने वाली कही गई है। हमारे बुज़ुर्ग कहा करते थे कि अगर इस एक दिन को सही विधि से जी लिया जाए, तो जीवन की बहुत-सी उलझनें अपने आप सुलझ जाती हैं।
षट्तिला एकादशी नाम क्यों पड़ा?
इस एकादशी का नाम “षट्तिला” इसलिए पड़ा क्योंकि इस दिन तिल का प्रयोग छह अलग-अलग रूपों में किया जाता है। तिल को भारतीय संस्कृति में शुद्धता, दान और तपस्या का प्रतीक माना गया है। सर्दी के मौसम में तिल का महत्व और भी बढ़ जाता है, और माघ मास में तो इसका पुण्य कई गुना माना गया है।
षट्तिला एकादशी पर तिल के छह प्रयोग
इस दिन किए जाने वाले छह तिल कर्म इस प्रकार हैं—
तिल मिले जल से स्नान करना
शरीर पर तिल का उबटन लगाना
तिल से हवन करना
तिल युक्त जल का पान करना
तिल से बना भोजन या फलाहार करना
तिल का दान करना
धारणा है कि इन छह कर्मों से व्यक्ति के जाने-अनजाने पाप नष्ट हो जाते हैं। खासतौर पर काले तिल और काली गाय का दान इस दिन अत्यंत शुभ माना गया है। गांवों में आज भी लोग यह परंपरा निभाते हैं, भले ही साधनों की कमी क्यों न हो।
षट्तिला एकादशी व्रत विधि
व्रत की शुरुआत प्रातः स्नान से होती है। स्नान के बाद मन को शांत कर “श्रीकृष्ण” नाम का जप करना चाहिए। पूरे दिन उपवास रखा जाता है और रात्रि में जागरण का महत्व बताया गया है।
इस दिन भगवान का पूजन कर तिल से हवन किया जाता है और निम्न मंत्र से अर्घ्य अर्पित किया जाता है—
सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु महापुरुषपूर्वज ।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं लक्ष्म्या सह जगत्पते ॥
नैवेद्य में तिल मिले फल या फलाहार रखा जाता है। ब्राह्मणों को भी तिल युक्त भोजन कराने की परंपरा है। माना जाता है कि यह व्रत सच्चे मन से किया जाए तो अधूरी इच्छाएं भी पूरी हो जाती हैं।
षट्तिला एकादशी से जुड़ी भावपूर्ण कथा
इस व्रत से जुड़ी एक पुरानी कथा आज भी मन को छू जाती है। कहा जाता है कि एक ब्राह्मणी ने जीवनभर व्रत, उपवास और पति की सेवा निष्ठा से की। इन पुण्यों के कारण उसे वैकुण्ठ की प्राप्ति हुई।
लेकिन एक कमी रह गई थी। उसने कभी अन्न का दान नहीं किया था। एक बार उसने भगवान को कपाली रूप में केवल मिट्टी का एक ढेला दान दिया था। उसी के फलस्वरूप वैकुण्ठ में उसे सुंदर मिट्टी का घर तो मिला, लेकिन अन्न का अभाव बना रहा।
जब उसने यह बात भगवान से कही, तो भगवान की आज्ञा से उसने षट्तिला एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से न केवल उसका अभाव दूर हुआ, बल्कि उसे वैकुण्ठ में सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त हो गईं।
कहते हैं, दान छोटा हो या बड़ा, भावना शुद्ध होनी चाहिए—यही इस कथा का असली संदेश है।
निष्कर्ष
षट्तिला एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि जीवन को सरल और शुद्ध बनाने की सीख है। तिल जैसे छोटे से दाने में छुपा यह संदेश हमें सिखाता है कि दान, संयम और भक्ति से ही जीवन में संतुलन आता है। आज के समय में भी अगर हम इस व्रत की भावना को अपनाएं, तो मन का बोझ कुछ हल्का ज़रूर हो जाता है… शायद यही इसका असली फल है।
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