पंजाब की संस्कृति, वहां के लोकगीत, नाच-गाना और त्योहार—सब कुछ अपने आप में अलग ही रंग लिए होता है। इन्हीं रंगों में रचा-बसा एक खास त्योहार है लोहड़ी। सच कहें तो, पंजाब के पर्व-त्योहारों पर बात हो और लोहड़ी का ज़िक्र न आए, तो बात अधूरी ही रह जाती है।
लोहड़ी कब और क्यों मनाई जाती है
लोहड़ी हर साल माघ संक्रांति से ठीक एक दिन पहले मनाई जाती है। यह त्योहार सर्दियों के विदा होने और नई फसल के स्वागत का प्रतीक माना जाता है। गांवों में तो इसका उत्साह कुछ अलग ही देखने को मिलता है।
शाम होते-होते लोग लकड़ियाँ इकट्ठी करते हैं और खुले स्थान पर अग्नि जलाई जाती है। इस अग्नि में तिल, मूंगफली, रेवड़ी आदि डालकर लोग पूजा करते हैं और परिक्रमा लगाते हैं। यह दृश्य बहुत ही सादा लेकिन मन को छू लेने वाला होता है।
बच्चों की लोहड़ी और घर-घर की रौनक
लोहड़ी का सबसे रोचक पहलू बच्चों से जुड़ा है। छोटे-छोटे बच्चे टोली बनाकर गलियों और मोहल्लों में घूमते हैं। वे घर-घर जाकर लोहड़ी के गीत गाते हैं और लकड़ियाँ या कुछ खाने की चीज़ें मांगते हैं।
इन बच्चों के चेहरों की खुशी, उनकी आवाज़ में मासूमियत—सब कुछ लोहड़ी को खास बना देता है। कई बार सुर ठीक नहीं होते, शब्द इधर-उधर हो जाते हैं, लेकिन वही तो इसकी खूबसूरती है।
लोहड़ी का प्रसिद्ध लोकगीत
लोहड़ी के समय गाया जाने वाला एक लोकगीत बहुत मशहूर है, जो लगभग हर बच्चे की ज़ुबान पर होता है—
सुंदर मुंदरिये! हो
तेरा कौन बेचारा, हो
दुल्ला भट्टी वाला, हो
दुल्ले धी ब्याही, हो
सेर शक्कर आई, हो
कुड़ी दे बोझे पाई, हो
कुड़ी दा लाल पटारा, हो…
यह गीत सिर्फ शब्द नहीं है, बल्कि एक कहानी है, एक याद है।
कौन थे दुल्ला भट्टी
अब सवाल उठता है कि आखिर यह दुल्ला भट्टी कौन थे, जिनकी याद आज भी लोहड़ी के गीतों में ज़िंदा है। लोककथाओं के अनुसार, दुल्ला भट्टी एक मुसलमान थे, लेकिन इंसानियत उनके दिल में बसती थी।
कहते हैं कि एक ब्राह्मण की बहुत छोटी और सुंदर कुँआरी बेटी को कुछ गुंडों ने उठा लिया था। दुल्ला भट्टी ने न सिर्फ उस बच्ची को छुड़ाया, बल्कि उसकी शादी की पूरी जिम्मेदारी भी उठाई। उन्होंने एक ब्राह्मण युवक से उसका विवाह करवाया और दहेज में एक सेर शक्कर दी।
क्यों आज भी याद किया जाता है दुल्ला भट्टी को
दुल्ला भट्टी का यह काम किसी धर्म या जाति से ऊपर था। शायद इसी वजह से आज भी लोग उसे भूल नहीं पाए हैं। लोहड़ी के दिन बच्चों द्वारा गाए जाने वाले गीतों में उनका नाम लिया जाता है, उनकी कहानी दोहराई जाती है।
यह त्योहार हमें यही सिखाता है कि सच्ची बहादुरी और इंसानियत समय के साथ कभी पुरानी नहीं होती।
आज की लोहड़ी और बदलता रूप
आज शहरों में लोहड़ी थोड़ी आधुनिक हो गई है। डीजे, बड़ी पार्टियां और सेल्फी का दौर आ गया है। लेकिन गांवों में अब भी वही पुरानी खुशबू, वही आग के चारों ओर बैठना और वही बच्चों की आवाज़ सुनाई देती है।
और शायद, यही असली लोहड़ी है—सादगी से भरी, दिल से जुड़ी हुई। #LohriFestival #PunjabiCulture #IndianFestivals #LohriCelebration #PunjabDiShaan #DesiTraditions #FolkFestivals #IndianCulture #LohriSpecia l#DullaBhatti #RuralIndia #FestivalVibes #CulturalHeritage #DesiRoots #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami
For more information: www.benimadhavgoswami.com Website: www.himachalpublications.com WhatsApp 9540166678 Phone no. 9312832612 Facebook: Ribhukant Goswami Instagram: Ribhukant Goswami Twitter: Ribhukant Goswami Linkedin: Ribhukant Goswami Youtube: AstroGurukulam Youtube: Ribhukant Goswami
No comments:
Post a Comment