भारत की परम्पराओं में मकर-संक्रान्ति का अपना अलग ही स्थान है। यह सिर्फ एक तिथि नहीं, बल्कि मौसम, मन और जीवन के बदलाव का संकेत है। सर्दी के बीच आती यह संक्रान्ति मन को भी भीतर से गरम कर देती है—दान, स्नान और भक्ति के भाव से।
मकर-संक्रान्ति का अर्थ क्या है?
जब सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, उसी समय मकर संक्रान्ति मानी जाती है। इसी दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं। शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है। इसलिए यह पर्व एक तरह से देवताओं के जागने का समय भी माना जाता है।
क्यों खास है यह दिन?
मकर संक्रान्ति के दिन किए गए कर्मों का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। स्नान, दान, जप, तप, श्राद्ध और व्रत—सब कुछ इस दिन विशेष फलदायी माना गया है। लोक मान्यता है कि आज किया गया दान सौ गुना होकर लौटता है।
इसी वजह से लोग सुबह-सुबह उठकर स्नान करते हैं और अपने सामर्थ्य अनुसार दान-पुण्य करते हैं।
घी और कम्बल दान का महत्व
इस दिन घी और कम्बल का दान बहुत पुण्यदायक माना गया है। खासकर माघ मास में इनका दान करने से जीवन के भोग भी मिलते हैं और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है—ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।
आज भी गाँवों में ठंड से कांपते जरूरतमंदों को कम्बल देना सबसे बड़ा धर्म समझा जाता है।
गंगा स्नान और तीर्थों की महिमा
मकर संक्रान्ति पर गंगा स्नान की परंपरा बहुत पुरानी है। प्रयागराज और गंगासागर में इस दिन होने वाला स्नान तो दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। मान्यता है कि इस दिन गंगा में डुबकी लगाने से पुराने पाप धुल जाते हैं और मन हल्का हो जाता है।
कई लोग आज के दिन गंगा तट पर बैठकर दान भी करते हैं।
अलग-अलग राज्यों में अलग नाम, वही भावना
भारत की खूबसूरती यही है कि हर प्रदेश में मकर संक्रान्ति अलग नाम से मनाई जाती है—
उत्तर प्रदेश में इसे खिचड़ी कहते हैं। खिचड़ी खाना और तिल-खिचड़ी का दान शुभ माना जाता है।
महाराष्ट्र में विवाहित महिलाएँ पहली संक्रान्ति पर तेल, नमक, कपास जैसी चीज़ें सौभाग्यवती स्त्रियों को देती हैं।
बंगाल में स्नान के बाद तिल दान की परंपरा है।
दक्षिण भारत में यही पर्व पोंगल के रूप में मनाया जाता है।
असम में इस दिन बिहू त्योहार की रौनक रहती है।
राजस्थान की खास परंपरा
राजस्थान में सौभाग्यवती महिलाएँ तिल के लड्डू, घेवर या मोतीचूर के लड्डुओं पर रुपया रखकर वायन बनाती हैं और सास को प्रणाम करके देती हैं। साथ ही चौदह की संख्या में किसी वस्तु का संकल्प लेकर चौदह ब्राह्मणों को दान किया जाता है। यह परंपरा आज भी कई घरों में निभाई जाती है।
अंत में एक बात
मकर संक्रान्ति केवल तिल, लड्डू या पतंगों का त्योहार नहीं है। यह हमें सिखाती है कि जैसे सूर्य दिशा बदलता है, वैसे ही हमें भी अपने जीवन की दिशा को बेहतर बनाना चाहिए। थोड़ा दान, थोड़ा त्याग और थोड़ा सा अपनापन—यही इस पर्व की असली आत्मा है।

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