सनातन धर्म में माघ मास का विशेष महत्व माना गया है। इसी मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भीम द्वादशी व्रत किया जाता है। यह व्रत कम प्रसिद्ध होने के बावजूद अपने भीतर गहरी धार्मिक भावना और सरल विधि समेटे हुए है।
कई लोग इसे केवल एक तिथि समझकर छोड़ देते हैं, लेकिन वास्तव में यह व्रत संयम, सेवा और समर्पण की सीख देता है।
भीम द्वादशी व्रत कब किया जाता है
भीम द्वादशी का व्रत माघ शुक्ल पक्ष की द्वादशी को रखा जाता है। यह वही तिथि है, जो धार्मिक ग्रंथ हेमाद्रि में भी वर्णित मिलती है। इस दिन व्रत का उद्देश्य केवल उपवास नहीं, बल्कि व्रत को ब्रह्म को समर्पित भाव से करना होता है।
व्रत का मुख्य भाव
इस व्रत में सबसे अहम बात है —
“ब्रह्मार्पण भाव”।
अर्थात् जो भी व्रत किया जाए, उसे अपने अहंकार से नहीं, बल्कि ईश्वर को समर्पित मानकर किया जाए। यही कारण है कि इस दिन दान और ब्राह्मण भोजन को विशेष महत्व दिया गया है।
भीम द्वादशी व्रत की विधि
1. व्रत का संकल्प
प्रातः स्नान के बाद मन को शांत करके व्रत का संकल्प लिया जाता है। संकल्प में यह भावना रखी जाती है कि यह व्रत ब्रह्म को अर्पित है।
2. उपवास और नियम
इस दिन उपवास रखा जाता है। कुछ लोग फलाहार करते हैं, तो कुछ केवल जल पर रहते हैं। नियम वही होते हैं जो सामान्यतः एकादशी व्रत में माने जाते हैं।
3. ब्राह्मण भोजन
दोपहर या पारण से पहले योग्य ब्राह्मणों को श्रद्धा के साथ भोजन कराया जाता है। भोजन साधारण, सात्त्विक और मन से परोसा हुआ होना चाहिए। दिखावे से ज़्यादा भावना ज़रूरी मानी गई है।
4. पारण
ब्राह्मण भोजन के बाद स्वयं व्रत का पारण किया जाता है। पारण करते समय मन में कृतज्ञता और शांति का भाव होना चाहिए।
एकादशी से समानता
भीम द्वादशी व्रत की शेष सभी विधियाँ लगभग एकादशी व्रत के समान मानी जाती हैं।
जैसे—
इंद्रिय संयम
सात्त्विक आहार
क्रोध और नकारात्मक विचारों से दूरी
यही कारण है कि यह व्रत सरल होते हुए भी प्रभावशाली माना जाता है।
क्यों करें भीम द्वादशी व्रत
ऐसा माना जाता है कि यह व्रत—
मन की शुद्धि करता है
दान और सेवा की प्रवृत्ति बढ़ाता है
जीवन में संतुलन और धैर्य लाता है
कुछ लोग कहते हैं कि इस व्रत को करने से मन हल्का हो जाता है, जैसे भीतर का बोझ थोड़ा कम हो गया हो… शायद यही इसकी असली शक्ति है।
अंतिम बात
भीम द्वादशी व्रत कोई कठिन साधना नहीं है। यह व्रत हमें यह याद दिलाता है कि धर्म केवल नियमों में नहीं, बल्कि भावना और नीयत में बसता है।
अगर मन सच्चा हो, तो छोटी-सी विधि भी बड़ा फल दे जाती है।
कभी मौका मिले, तो इस व्रत को श्रद्धा से करके देखिए… अनुभव अपने आप बोलने लगेगा।

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