Monday, February 02, 2026

महाशिवरात्रि 2026: क्यों सबसे पावन है फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की यह रात्रि?

  यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मा को भीतर से झकझोर देने वाली साधना की रात्रि है।

ऐसी रात्रि जब शिव केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि साधक के मन में प्रकट होते हैं।



महाशिवरात्रि कब और क्यों मनाई जाती है?

महाशिवरात्रि का व्रत फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि यह व्रत अर्धरात्रि में आने वाली चतुर्दशी में ही करना चाहिए।

इस वर्ष 15 फरवरी को यह पावन तिथि पड़ रही है, और यही कारण है कि यह दिन साधकों के लिए अत्यंत विशेष माना जा रहा है।

चाहे चतुर्दशी पूर्वा हो या परा, जिस तिथि में आधी रात आती है — वही शिवरात्रि होती है।
यही शास्त्रसम्मत नियम है, और यही परंपरा।

चतुर्दशी तिथि का शिव से क्या संबंध है?

ज्योतिष के अनुसार हर तिथि का एक देवता होता है।
चतुर्दशी तिथि के स्वामी स्वयं भगवान शिव हैं।

इसी कारण यह रात्रि शिव को अत्यंत प्रिय है।
रात्रि + चतुर्दशी = शिवरात्रि

हर महीने की कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि आती है, लेकिन फाल्गुन मास की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है।
क्योंकि मान्यता है कि इसी रात्रि को शिवलिंग स्वरूप में ज्योति का प्राकट्य हुआ था।

क्या महाशिवरात्रि सभी कर सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल।
यह व्रत किसी एक वर्ग, जाति या उम्र के लिए सीमित नहीं है।

  • स्त्री या पुरुष

  • बालक या वृद्ध

  • गृहस्थ या सन्यासी

सबके लिए यह व्रत समान रूप से फलदायी है।
शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा गया है कि इस व्रत को न करने से जीवन में सूक्ष्म दोष भी लग सकता है।

महाशिवरात्रि व्रत का असली महत्व

शिवपुराण में स्पष्ट लिखा है कि शिवरात्रि व्रत से
भोग भी मिलता है और मोक्ष भी।

यानी संसार भी और उससे मुक्ति भी।
ऐसा संतुलन बहुत कम व्रतों में देखने को मिलता है।

कहा गया है कि मोक्ष की चाह रखने वाले साधक को चार बातों का पालन करना चाहिए:

  1. शिव की उपासना

  2. शिव मंत्रों का जप

  3. उपवास

  4. वैराग्य भाव

इन सबमें महाशिवरात्रि व्रत का स्थान सबसे ऊँचा है।

शिव की पूजा रात्रि में ही क्यों होती है?

यह प्रश्न अक्सर मन में आता है।
जब बाकी देवताओं की पूजा दिन में होती है, तो शिव की रात्रि में क्यों?

उत्तर बहुत गहरा है।

भगवान शिव तमोगुण के अधिष्ठाता हैं।
रात्रि स्वयं तमोगुण का प्रतीक है।

रात्रि आते ही:

  • प्रकाश समाप्त होता है

  • कर्म रुकते हैं

  • मन शांत होता है

पूरा संसार जैसे थोड़ी देर के लिए “ठहर” जाता है।
और यही शिव का समय है।

कृष्ण पक्ष और शिवरात्रि का रहस्य

कृष्ण पक्ष में चंद्रमा क्षीण होता जाता है।
चंद्रमा मन का स्वामी माना गया है।

जैसे-जैसे चंद्र क्षीण होता है,
वैसे-वैसे मन में भ्रम, डर और नकारात्मकता बढ़ती है।

इसी समय शिव की पूजा इसलिए की जाती है ताकि
मन की इन तामसिक वृत्तियों पर नियंत्रण पाया जा सके।

यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि गहरी मनोवैज्ञानिक समझ है।

उपवास और रात्रि जागरण क्यों जरूरी है?

उपवास केवल भूखा रहना नहीं है।
यह इंद्रियों को साधने का तरीका है।

गीता कहती है —
जो रात्रि सबके लिए सोने का समय है,
वही संयमी के लिए जागने का समय है।

शिव से मिलने के लिए
नींद नहीं, जागरण चाहिए।

महाशिवरात्रि की सरल पूजन विधि

हर व्यक्ति बड़े अनुष्ठान नहीं कर सकता, और यह ठीक भी है।
शिव भाव देखते हैं, दिखावा नहीं।

  • सुबह स्नान कर शिव का स्मरण करें

  • दिन भर मन में “नमः शिवाय” जपते रहें

  • रात्रि में दीप जलाकर शिवलिंग या चित्र के सामने बैठें

  • संभव हो तो उपवास रखें, नहीं तो फलाहार

बस इतना ही काफ़ी है।

एक छोटी-सी कथा, जो सब कुछ कह देती है

कहा जाता है कि एक चोर शिवरात्रि की रात मंदिर में छिपा रहा।
डर के कारण वह पूरी रात जागता रहा, भूखा रहा।

उसे पता भी नहीं था कि उससे अनजाने में व्रत हो गया।
और उसी कारण शिव ने उसे सद्गति दे दी।

शिव भाव देखते हैं, योग्यता नहीं।

महाशिवरात्रि का संदेश

शिव विरोधों का संतुलन हैं।

  • गृहस्थ होकर भी विरक्त

  • विष पीकर भी विष से मुक्त

  • उग्र होकर भी करुणामय

उनका शिवलिंग निराकार ब्रह्म का प्रतीक है।
जैसे गणित में शून्य — खुद कुछ नहीं, फिर भी सब कुछ।

शिव सिखाते हैं —
सह-अस्तित्व, संतुलन और करुणा।

अंत में…

15 फरवरी की यह महाशिवरात्रि
सिर्फ एक तिथि नहीं है।
यह अपने भीतर झाँकने का अवसर है।

अगर इस रात
आपने थोड़ी-सी भी शांति पा ली,
तो समझिए शिव ने आपको स्वीकार कर लिया।

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