कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिन्हें याद करने के लिए कोई विशेष दिन नहीं चाहिए। वे हमारी सांसों, सोच और भीतर की चुप्पी में पहले से मौजूद रहते हैं। रामकृष्ण परमहंस ऐसे ही संत थे। फिर भी, उनकी जयंती आती है तो मन अपने आप थोड़ा रुक जाता है, भीतर झांकने लगता है।
19 फरवरी 2026, यह दिन केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन का निमंत्रण है। ऐसा लगता है जैसे गुरु पूछ रहे हों – “तू भीतर गया या अब भी बाहर ही भटक रहा है?”
श्री रामकृष्ण परमहंस का अवतरण : साधारण देह, असाधारण चेतना
रामकृष्ण परमहंस का जीवन बाहर से देखने पर बहुत साधारण लगता है। न कोई विद्वता का दिखावा, न तर्कों की लंबी कतारें। लेकिन भीतर… भीतर तो जैसे पूरा ब्रह्मांड जाग रहा था।
बचपन से ही उनके स्वभाव में एक अलग सी पवित्रता थी। खेत में काम करते हुए, मंदिर में सेवा करते हुए, कभी-कभी अचानक समाधि में चले जाना — यह सब उनके लिए असामान्य नहीं था, बल्कि सहज था।
ईश्वर उनके लिए कल्पना नहीं, अनुभव था
वे ईश्वर के बारे में बोलते नहीं थे, ईश्वर में रहते थे। यही कारण है कि उनकी बातें सीधे दिल को छूती हैं, दिमाग को नहीं।
भक्ति और साधना : रास्ता नहीं, डूब जाना
रामकृष्ण परमहंस की साधना किसी एक परंपरा में बंधी नहीं थी। उन्होंने मां काली की उपासना की, वैष्णव भक्ति को जिया, अद्वैत का अनुभव किया, इस्लाम और ईसाई मत के मार्ग पर भी चले।
और अंत में वही कहा जो आज भी उतना ही सटीक है —
“जितने मत, उतने पथ।”
हर रास्ता उसी एक की ओर
उनके लिए धर्म बहस का विषय नहीं था। धर्म तो अनुभव था।
वे कहते थे — जैसे तालाब तक पहुंचने के कई रास्ते होते हैं, लेकिन पानी एक ही होता है।
आज के समय में, जब धर्म अक्सर दूरी पैदा करता है, यह बात और भी जरूरी लगती है।
गुरु और शिष्य : एक दीप से दूसरा दीप
रामकृष्ण परमहंस केवल साधक नहीं थे, वे गुरु थे। और सच्चा गुरु वही होता है जो शिष्य को खुद से आगे भेज दे।
उनके जीवन में स्वामी विवेकानंद का आना कोई संयोग नहीं था। वह तो जैसे तय था।
गुरु ने शिष्य को संसार की ओर भेजा और कहा — “जाओ, पहले मनुष्य बनो।”
अध्यात्म का मतलब पलायन नहीं
रामकृष्ण की दृष्टि में अध्यात्म जीवन से भागना नहीं था।
घर में रहो, काम करो, लेकिन मन ईश्वर में रखो — बस यही साधना है।
आज के जीवन में रामकृष्ण परमहंस की बात
आज हम बहुत तेज दौड़ रहे हैं। मोबाइल, काम, चिंता, तुलना… सब कुछ है, बस शांति नहीं।
रामकृष्ण परमहंस कहते थे —
“शांति बाहर नहीं, भीतर मिलती है।”
छोटे-छोटे अभ्यास
हर दिन कुछ पल चुप बैठना
नाम-स्मरण, बिना दिखावे
अहंकार को थोड़ा ढीला करना
और सबसे जरूरी — अपने आप से ईमानदार रहना
यही उनकी साधना का सार था। कोई भारी नियम नहीं, कोई कठिन विधि नहीं।
श्री रामकृष्ण परमहंस जयंती : सिर्फ याद करने का दिन नहीं
19 फरवरी 2026 को जयंती मनाते समय अगर हम सिर्फ फूल चढ़ाकर लौट आए, तो शायद कुछ छूट जाएगा।
यह दिन पूछता है —
क्या हम भी थोड़ा सरल हो पाए?
क्या हम भी भीतर देखने का साहस कर पाए?
गुरु कभी जाता नहीं
देह चली जाती है, लेकिन चेतना नहीं।
रामकृष्ण परमहंस आज भी जीवित हैं —
किसी की भक्ति में,
किसी की आंखों के आंसू में,
और किसी की खामोशी में।
उपसंहार : एक व्यक्ति नहीं, एक अवस्था
रामकृष्ण परमहंस कोई इतिहास का नाम नहीं हैं। वे एक अवस्था हैं — जहां प्रेम है, सरलता है और ईश्वर सजीव है।
उनकी जयंती पर यही कामना है कि हम थोड़ा कम बोलें, थोड़ा ज्यादा महसूस करें।
शायद यही सच्ची श्रद्धांजलि है। 🌼

No comments:
Post a Comment