सनातन धर्म में व्रत और पर्व केवल परम्परा नहीं, बल्कि आस्था और आत्मिक शुद्धि का माध्यम माने जाते हैं। ऐसे ही एक विशेष व्रत का नाम है जानकी व्रत, जो माता सीता यानी जनकनन्दिनी श्री जानकी जी को समर्पित है। यह व्रत मुख्य रूप से अष्टमी तिथि को किया जाता है और इसका उल्लेख निर्णयसिन्धु जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।
जानकी व्रत क्या है?
जानकी व्रत वह व्रत है जिसमें माता सीता की पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार यह व्रत स्वयं भगवान श्रीराम ने भी किया था। कहा जाता है कि गुरु वशिष्ठ जी की आज्ञा से श्रीराम समुद्र तट की तपोभूमि पर बैठकर इस व्रत का पालन कर रहे थे। यही कारण है कि इस व्रत को बहुत ही पवित्र और फलदायी माना गया है।
मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से यह व्रत करता है, उसकी मनोकामनाएं धीरे-धीरे पूरी होने लगती हैं। खासकर गृहस्थ जीवन में सुख, शांति और दाम्पत्य जीवन की समस्याओं के लिए यह व्रत बहुत उपयोगी माना जाता है।
जानकी व्रत कब किया जाता है?
निर्णयसिन्धु के अनुसार यह व्रत अष्टमी तिथि को किया जाता है। इसमें पूर्वविद्धा अष्टमी को ग्रहण करने का विधान है। शास्त्र में कहा गया है:
"व्रतमात्रेऽष्टमी कृष्णा पूर्वा शुक्लेऽष्टमी परा"
सरल शब्दों में कहें तो, जिस दिन अष्टमी पहले से लगी हो, उसी दिन व्रत करना श्रेष्ठ माना जाता है।
वर्ष 2026 में जानकी व्रत की तिथि है –
👉 9 फरवरी 2026
जानकी व्रत की पूजा विधि
जानकी व्रत की पूजा बहुत कठिन नहीं होती, लेकिन इसमें भाव और श्रद्धा सबसे ज़रूरी मानी जाती है।
1. स्नान और संकल्प
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करके माता जानकी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
2. पूजन विधि
माता सीता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। उन्हें फूल, अक्षत, चंदन और धूप-दीप अर्पित करें। राम जी का स्मरण करना भी इस व्रत में बहुत शुभ माना जाता है।
3. हवन और नैवेद्य
इस व्रत में विशेष रूप से जौ और चावल से बनी खीर का हवन किया जाता है।
साथ ही अपूप (पूए) का भोग माता जानकी को अर्पित किया जाता है।
घर में अगर हवन संभव न हो, तो केवल भोग और सरल पूजा से भी व्रत पूर्ण माना जाता है।
जानकी नवमी का अलग मतकुछ वैष्णव ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि माता सीता का जन्म वैशाख शुक्ल नवमी को हुआ था, जिसे जानकी नवमी कहा जाता है। कई स्थानों पर लोग जानकी नवमी को ही विशेष रूप से माता सीता का जन्मोत्सव मानकर मनाते हैं।
यानी कुछ परम्पराओं में जानकी व्रत अष्टमी को होता है, तो कुछ जगह नवमी को भी इसे जोड़ा जाता है। दोनों ही मान्यताएं अपने-अपने स्थान पर प्रचलित हैं।
जानकी व्रत का आध्यात्मिक महत्व
जानकी व्रत केवल एक धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं है, बल्कि यह स्त्री शक्ति, त्याग और मर्यादा का प्रतीक भी है। माता सीता का जीवन हमें सिखाता है कि कैसे कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और विश्वास बनाए रखा जाए।
आज के समय में जब रिश्तों में अस्थिरता बढ़ रही है, तब जानकी व्रत हमें प्रेम, संयम और समर्पण की याद दिलाता है। शायद इसी कारण यह व्रत आज भी लोगों के जीवन में खास जगह रखता है।
निष्कर्ष
जानकी व्रत एक सरल लेकिन अत्यंत भावपूर्ण व्रत है। यह न केवल मनोकामना पूर्ति का माध्यम है, बल्कि आत्मिक शांति और पारिवारिक सुख का भी प्रतीक माना जाता है।
9 फरवरी 2026 को आने वाला जानकी व्रत उन सभी भक्तों के लिए एक अच्छा अवसर है, जो माता सीता की कृपा पाना चाहते हैं और अपने जीवन में स्थिरता व संतुलन चाहते हैं।
थोड़ी श्रद्धा, थोड़ा विश्वास और सच्चे मन से किया गया यह व्रत, जीवन में बहुत कुछ बदल सकता है — बस यही इसकी सबसे बड़ी खास बात है। #जानकीव्रत #MataSita #सीतामाता #सनातनधर्म #धार्मिकब्लॉग #HinduCulture #SpiritualIndia #VratKatha #DevotionalContent #IndianTradition #BhaktiBlog #RamBhakti #हिंदूधर्म #SpiritualBlog #SanatanDharma #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami
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