श्रीनाथ जी का नाम आते ही मन अपने-आप शांत हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे कोई अपना बहुत पास आकर बैठ गया हो। श्रीनाथ उत्सव भी कुछ ऐसा ही है — कोई बड़ा औपचारिक पर्व नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच का सीधा, सरल और बहुत ही आत्मीय मिलन।
इस वर्ष श्रीनाथ उत्सव 8 फरवरी 2026 को मनाया जाएगा, और सच कहूँ तो यह तारीख कैलेंडर से ज़्यादा दिल में याद रहती है।
श्रीनाथ उत्सव क्या है?
श्रीनाथ उत्सव केवल एक दिन का आयोजन नहीं होता। यह उस भाव का नाम है जहाँ भक्त अपने मन, समय और भावनाओं को श्रीनाथ जी के चरणों में अर्पित कर देता है। इसमें शोर कम होता है और भावना ज़्यादा।
कई लोग पूछते हैं कि “उत्सव में ऐसा क्या खास होता है?”
तो उत्तर बड़ा सीधा है — भाव।
अगर भाव है तो छोटी सी सेवा भी उत्सव बन जाती है, और भाव न हो तो बड़े आयोजन भी खाली लगते हैं।
श्रीनाथ जी का बाल स्वरूप और अपनापन
गोवर्धनधारी का सरल भाव
श्रीनाथ जी बालकृष्ण के उस रूप में हैं जहाँ भगवान राजा नहीं, बल्कि घर के बच्चे जैसे लगते हैं।
कभी माखन माँगते, कभी रूठते, कभी मुस्कुरा देते। शायद इसी वजह से उनसे जुड़ना आसान लगता है।
उनकी मूर्ति को देखकर ऐसा नहीं लगता कि हम किसी दूर बैठे ईश्वर को देख रहे हैं, बल्कि ऐसा लगता है कि
“हाँ, ये तो हमारे ही हैं।”
श्रीनाथ उत्सव का आध्यात्मिक अर्थ
उत्सव मतलब आनंद की साधना
उत्सव शब्द में ही “उत्साह” छिपा है।
श्रीनाथ उत्सव हमें यह याद दिलाता है कि भक्ति बोझ नहीं, आनंद है।
इस दिन पूजा-पाठ से ज़्यादा ज़रूरी होता है मन की स्थिति।
अगर मन हल्का है, प्रेम से भरा है, तो वही सबसे बड़ी पूजा है।
उत्सव की तैयारियाँ – बाहर से ज़्यादा अंदर की
केवल सजावट नहीं, मन की सफ़ाई भी
घरों और मंदिरों में सजावट होती है — फूल, वस्त्र, दीपक।
लेकिन असली तैयारी भीतर की होती है।
मन से थोड़ी शिकायतें हटाना
अहंकार को थोड़ा किनारे रखना
और यह स्वीकार करना कि “मैं सब नहीं जानता”
यही छोटी-छोटी बातें उत्सव को सच्चा बनाती हैं।
सेवा, भोग और दर्शन का भाव
देखने से ज़्यादा महसूस करना
श्रीनाथ उत्सव में सेवा का बहुत महत्व है।
भोग लगाया जाता है, आरती होती है, झाँकी सजती है।
लेकिन अनुभवी भक्त कहते हैं —
“दर्शन आँखों से नहीं, भाव से होते हैं।”
कभी-कभी झाँकी के सामने खड़े होकर कुछ समझ नहीं आता, बस मन भर आता है। शायद वही दर्शन है।
भजन, कीर्तन और माहौल
जब शब्द नहीं, रस बहता है
उत्सव के दिन गाए जाने वाले भजन कुछ अलग ही होते हैं।
सुर सही हों या न हों, ताल मिले या न मिले — फर्क नहीं पड़ता।
क्योंकि वहाँ प्रदर्शन नहीं, समर्पण होता है।
और सच कहूँ तो कई बार वही बेसुरा भजन दिल को ज़्यादा छू जाता है।
श्रीनाथ उत्सव और हमारा रोज़मर्रा का जीवन
एक दिन का नहीं, रोज़ का उत्सव
श्रीनाथ उत्सव हमें यह सिखाता है कि भक्ति को जीवन से अलग मत रखो।
काम करते हुए, परिवार में रहते हुए, जिम्मेदारियाँ निभाते हुए भी उत्सव का भाव रखा जा सकता है।
अगर दिन की शुरुआत धन्यवाद से हो जाए,
और रात भरोसे के साथ खत्म हो —
तो वही जीवन का श्रीनाथ उत्सव है।
इस वर्ष की विशेष तिथि
8 फरवरी 2026 – याद रखने की नहीं, जीने की तारीख
8 फरवरी 2026 को आने वाला श्रीनाथ उत्सव एक अवसर है रुकने का, थोड़ा धीमे चलने का।
मोबाइल कम देखने का, और भीतर ज़्यादा झाँकने का।
हो सकता है सब कुछ परफेक्ट न हो —
भोग समय पर न बने, भजन ठीक से न आए —
लेकिन अगर भाव सच्चा है, तो श्रीनाथ जी वहीं मुस्कुरा देते हैं।
अंत में…
श्रीनाथ उत्सव हमें यह नहीं सिखाता कि भगवान को कैसे प्रसन्न करें,
बल्कि यह सिखाता है कि हम खुद कैसे सरल बनें।
जब मन हल्का हो जाए, अपेक्षाएँ कम हो जाएँ,
और प्रेम बिना कारण बहने लगे —
तो समझ लेना चाहिए कि उत्सव सफल हो गया।
बाकी, श्रीनाथ जी तो भाव के भूखे हैं…
और शायद इसी लिए वे इतने अपने लगते हैं। 🌸🙏
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