भूमिका : गीता का जन्म और इसकी आध्यात्मिक महिमा
मंगसिर (मार्गशीर्ष) शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिन सनातन परंपरा में बेहद पावन माना जाता है। माना जाता है कि इसी दिन महाभारत के युद्ध क्षेत्र कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को वह दिव्य उपदेश दिया था, जो आगे चलकर श्रीमद्भगवद् गीता के रूप में संकलित हुआ।
यही वजह है कि यह एकादशी गीता जयंती के नाम से प्रसिद्ध है और हर वर्ष इसे बड़े श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है।
गीता जयंती क्यों मनाई जाती है?
गीता सिर्फ एक धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाती है।
कठिनाई के समय मन को कैसे स्थिर रखें, कर्म कैसे करें, और भगवान से अपना संबंध कैसे जोड़ें—इन सबका उत्तर गीता में मिलता है।
इसीलिए इसके जन्मदिन को मनाना, हमारे जीवन में ज्ञान के प्रकाश को फिर से आमंत्रित करना होता है।
गीता जयंती पर क्या करें?
1. गीता जी की पूजा करें
इस दिन घर में गीता जी को स्वच्छ स्थान पर स्थापित कर हल्दी, चावल, फूल और दीपक के साथ पूजा की जाती है।
गृहस्थ परिवारों में अक्सर गीता जी की पूजा को माता-पिता की तरह पूरे आदर से किया जाता है।
2. गीता का पाठ
इस दिन गीता जी के कम से कम एक अध्याय या सम्पूर्ण गीता का पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है।
कई लोग अपनी मनोकामनाओं के अनुसार विशेष श्लोक भी पढ़ते हैं।
3. आरती और प्रसाद
पूजा के बाद दीपक जलाकर गीता जी की आरती उतारी जाती है।
गुड़, फल, मिश्री या घर का बना हल्का प्रसाद अर्पित किया जाता है।
प्रसाद में भक्ति का भाव ही सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।
4. सत्संग और भगवद् चर्चा
कुछ घरों में परिवार मिलकर गीता पर चर्चा करते हैं,
क्योंकि ज्ञान बाँटने से ही बढ़ता है—यह बात गीता स्वयं सिखाती है।
गीता जयंती का वास्तविक संदेश
गीता जयंती हमें याद दिलाती है कि—
जीवन में चाहे कैसी भी स्थिति आए, धर्म, सत्य और कर्म को कभी न छोड़ें।
कर्म करते रहना ही सफलता और शांति का मूलमंत्र है।
श्रीकृष्ण का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था।
समापन
गीता जयंती केवल एक पूजा-व्रत नहीं,
बल्कि अपने भीतर छिपे अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का दीप जलाने का अवसर है।
अगर आप इस दिन गीता का एक भी श्लोक समझ लेते हैं,
तो मानिए कि आपका दिन सार्थक हो गया।

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