भारत की सनातन परंपरा में कार्तिक महीना सबसे पवित्र माना गया है। इसी पावन मास में आती है वैकुण्ठ चतुर्दशी, जिसे वैकुण्ठ चौदस भी कहा जाता है। यह तिथि केवल पूजा-अर्चना का दिन नहीं बल्कि मोक्ष का द्वार मानी गई है।
कहते हैं कि इस दिन भगवान विष्णु स्वयं अपने भक्तों के लिए स्वर्ग द्वार खोलते हैं और सच्ची श्रद्धा से किया गया छोटा सा नाम-जप भी बैकुण्ठ प्राप्ति का कारण बन जाता है।
वैकुण्ठ चतुर्दशी क्यों है खास?
धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को पूजा करने से मनुष्य अनेक जन्मों के पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक जाता है।
निर्णयसिन्धु और स्मृतिकौस्तुभ जैसे प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि इस दिन भगवान विश्वेश्वर (भगवान शिव) ने काशी के मणिकर्णिका घाट पर स्नान किया, पाशुपत व्रत धारण किया और देवी उमा के साथ भगवान विष्णु की आराधना की। यही वह काल था जब काशी में विश्वेश्वर स्वरूप की दिव्य स्थापना हुई।
शिव और विष्णु का यह प्रेम और एक-दूसरे के प्रति आदर भक्तों के लिए बड़ा संदेश देता है—
"सच्चा धर्म आपस में सम्मान और समर्पण का होता है, विवादों का नहीं।"
वैकुण्ठ चतुर्दशी व्रत और पूजा-विधि
तिथि: कार्तिक शुक्ल पक्ष चतुर्दशी
समय: ब्राह्म मुहूर्त से दिनभर, और विशेषकर रात्रि में विष्णु-पूजन शुभ माना जाता है
सादगी और भक्ति से पूजा करें
स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें
भगवान विष्णु को जल-अभिषेक करें
तुलसीदल, पुष्प, चन्दन और दीप अर्पित करें
सरल-सा भोग (बाल-भोग) लगाएँ
धूप-दीप से आरती करें
हरि-नाम जपें — "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"
ध्यान रखें, भक्ति में भाव सबसे महत्वपूर्ण है। दिखावा या कठोर नियमों से ज्यादा असर मन की सच्चाई का होता है।
वैकुण्ठ चतुर्दशी की पवित्र कथा
एक बार नारद जी पृथ्वी-लोक का भ्रमण कर वैकुण्ठ पहुँचे। भगवान विष्णु ने आदरपूर्वक उनका स्वागत किया और आने का कारण पूछा।
नारद जी ने विनम्रता से कहा —
"प्रभो, आपकी कृपा अमृत के समान है, पर लगता है कि अधिकतर बड़े भक्त ही इसका लाभ ले पाते हैं। आम मनुष्य, जिनसे कभी-कभार भूल हो जाती है, उनके लिए मुक्ति का मार्ग कठीन हो जाता है। कृपा कर ऐसा उपाय बताइये जिससे सामान्य जन भी आपकी शरण पा सकें।"
भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और बोले —
“हे नारद! जो मनुष्य कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को श्रद्धा से मेरा पूजन करेगा, चाहे वह कितना ही साधारण क्यों न हो, उसे बैकुण्ठ धाम मिलेगा।”
फिर भगवान ने अपने द्वारपाल जय-विजय को आदेश दिया —
आज स्वर्ग का द्वार सब भक्तों के लिए खुला रहेगा।
इस दिन थोड़ी सी भी भक्ति, थोड़ा-सा भी नाम-स्मरण अमूल्य फल देता है।
वैकुण्ठ चतुर्दशी का संदेश
यह तिथि हमें सिखाती है—
ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग सरल है
भक्ति में अहंकार नहीं, केवल प्रेम होना चाहिए
साधारण भक्त भी ईश्वर को प्रिय हैं
और हाँ…
कभी-कभी छोटी-सी पूजा, एक दीपक, या एक तिलक भी आपको ईश्वर तक पहुँचा सकता है।
अंत में
वैकुण्ठ चतुर्दशी पर बस इतना याद रखें —
दिल से हरि नाम लीजिए,
एक दीपक श्रद्धा से जलाइए,
और अपने जीवन में प्रेम और करुणा जगाइये।
हो सकता है इसी भाव में आपका बैकुण्ठ का द्वार खुल जाए।

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