Monday, November 10, 2025

भैरव जयंती: काल के स्वामी का प्राकट्य दिवस

 मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष अष्टमी को भैरव जयंती मनाई जाती है। इसे कालाष्टमी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान भैरव का दिव्य अवतरण हुआ था। भैरव जी भगवान शिव के प्रचंड और रक्षक रूप माने जाते हैं, जो धर्म की रक्षा और अधर्म का दण्ड करने के लिए प्रकट हुए। उनके हाथ में दण्ड होने से उन्हें दण्डपति भी कहा जाता है।


व्रत और पूजा-विधि

इस पवित्र दिन भक्त उपवास रखते हैं और भैरव बाबा का जल अर्घ्य देकर पूजन करते हैं।
कहा जाता है कि दिन के चारों प्रहरों में भक्ति से पूजा करने से मन की अशुद्धियाँ मिटती हैं और जीवन में साहस एवं सुरक्षा की भावना बढ़ती है।

भैरव जयंती की रात जागरण किया जाता है और शिव-पार्वती की कथा श्रवण का विशेष महत्व है। ऐसा करने से साधक को शिव-अनुग्रह की प्राप्ति होती है और पिछले पाप भी नष्ट होते हैं।

विशेष मंत्र और अर्घ्य

प्रार्थना के समय भैरव जी को फूल और जल अर्पित करते हुए निम्न पवित्र मंत्रों का जप किया जाता है—

“भैरवार्यं गृहाणेश भीमरूपाव्ययानघ ।
अनेनार्घ्यप्रदानेन तुष्टो भव शिवप्रिय ।।”

“सहस्राक्षि शिरोबाहो सहस्त्रचरणाजर ।
गृहाणार्घ्य भैरवेदं सपुष्पं परमेश्वर ॥”

“पुष्पाञ्जलिं गृहाणेश वरदो भव भैरव ।
पुनरर्घ्य गृहाणेदं सपुष्यं यातनापह ।।”

इन मंत्रों से भैरव उपासना करते हुए, तीन बार अर्घ्य अर्पण करने की परंपरा है।

भैरव और कुत्ता: एक पवित्र प्रतीक

भैरव जी की सवारी कुत्ता माना गया है। इसलिए इस दिन कुत्तों को भोजन खिलाना और उनकी सेवा करना बेहद शुभ माना जाता है। यह एक तरह से करुणा और सेवा के भाव को भी जगाता है।

साप्ताहिक आराधना

रविवार और मंगलवार भैरव जी को समर्पित माने जाते हैं। इन दिनों उनकी भक्तिभाव से पूजा करने से —

  • भय व बाधाएँ दूर होती हैं

  • नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव खत्म होता है

  • आत्मबल और उत्साह बढ़ता है

कहते हैं "जहाँ भैरव का वास होता है, वहाँ भय और बाधाओं का प्रवेश नहीं होता।"

एक पुरानी कथा की झलक

पुराणों में उल्लेख मिलता है कि माता गौरी के आदेश पर भगवान भैरव ने दैत्य-संहार किया और देवताओं की रक्षा की। तभी से उन्हें संकट-मोचक और दण्डदाता कहा गया। जो भी साधक संकट में भैरव का स्मरण करता है, उसकी रक्षा अवश्य होती है।

निष्कर्ष

भैरव जयंती सिर्फ एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि चेतना जागरण का दिवस है।
यह हमें याद दिलाती है कि जीवन में अनुशासन, हिम्मत और सत्य के मार्ग पर चलना ही सच्ची भक्ति है।

इस पावन अवसर पर भैरव जी के चरणों में श्रद्धा अर्पित करते हैं—
“जय कालभैरव! रक्षा करो, मार्ग दिखाओ।”

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