Saturday, November 29, 2025

अखण्ड द्वादशी व्रत: जीवन की अपूर्णताओं को पूर्ण करने वाली पवित्र तिथि

 भूमिका : अखण्ड द्वादशी क्यों मानी जाती है विशेष?



हमारे शास्त्रों में कई ऐसे व्रत बताए गए हैं जिन्हें करने से जीवन में रुकी हुई शुभ कार्यों की ऊर्जा फिर से जाग उठती है। उन्हीं में से एक है अखण्ड द्वादशी, जिसे विशेष तौर पर उन कार्यों के लिए फलदायी माना गया है जो किसी कारण अधूरे रह जाते हैं। कई बार मनुष्य पूरे मन से पूजा या संस्कार करता है, पर छोटी-सी भूल से उसका प्रभाव कम हो जाता है। माना जाता है कि यह पावन व्रत उन सभी कमियों को दूर कर देता है।

अखण्ड द्वादशी का पहला रूप

आषाढ़ शुक्ल एकादशी से आरम्भ होने वाला व्रत

अखण्ड द्वादशी का पहला स्वरूप आषाढ़ शुक्ल एकादशी से शुरू होता है।

उपवास और पूजा-विधान

  • व्रती इस दिन उपवास रखते हैं।

  • अगले दिन द्वादशी तिथि को भगवान विष्णु की पूरी श्रद्धा से पूजा की जाती है।

व्रत की अवधि

यह व्रत एक दिन का नहीं, बल्कि पूरे एक वर्ष तक चलने वाला नियमित संकल्प है।
थोड़ा कठिन अवश्य है, पर भक्त इसे पूरे मन से निभाते हैं।

अधूरे कार्यों को पूर्ण करने वाला व्रत

कहा गया है कि—

“जो भी कर्म, संस्कार या शुभ कार्य किसी वजह से अधूरा रह गया हो, अखण्ड द्वादशी उसका दोष हरकर उसे सिद्ध कर देती है।”

कृत्यकल्पतरु और हेमाद्रि जैसे पुराने ग्रंथों में इसकी विस्तार से महिमा लिखी हुई है, जिसे पढ़कर भी मन श्रद्धा से भर जाता है।

अखण्ड द्वादशी का दूसरा स्वरूप

मार्गशीर्ष शुक्ल द्वादशी की पवित्रता

अखण्ड द्वादशी की दूसरी मान्यता मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष द्वादशी से जुड़ी है।

यज्ञ और व्रतों की त्रुटि दूर करने वाला दिन

इस दिन का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि—

  • यज्ञ,

  • उपवास,

  • दान,

  • और धार्मिक व्रतों में यदि कोई कमी रह जाए,

तो इस द्वादशी का व्रत उन सारी त्रुटियों को दूर करने वाला माना गया है।

पुराणों में वर्णन

इस व्रत का उल्लेख कई प्रमुख पुराणों में मिलता है—

  • वामन पुराण

  • अग्नि पुराण

  • गरुड़ पुराण

इन सभी ग्रंथों में इसका ऐसा वर्णन है कि पढ़ते समय लगता है मानो देवताओं ने स्वयं इस व्रत को श्रेष्ठ बताया हो।

 अखण्ड द्वादशी का आध्यात्मिक संदेश

अखण्ड द्वादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि एक सुधार और उत्थान का संदेश भी देती है।
कभी-कभी मनुष्य अपनी कोशिशों के बावजूद भी पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाता।
यह व्रत हमें याद दिलाता है कि—

“नियम, श्रद्धा और सतत् प्रयास से हर अपूर्णता भी पूर्णता में बदल सकती है।”

समापन : श्रद्धा से किया गया संकल्प ही फल देता है

अखण्ड द्वादशी का पालन करने के लिए बहुत दृढ़ता और सच्ची निष्ठा चाहिए।
कहते हैं कि व्रत चाहे छोटा हो या बड़ा, उसका परिणाम वही पाता है जो उसे पूरे दिल से निभाता है।
यदि आप भी अपने जीवन के किसी अधूरे शुभ कार्य या मनोकामना के लिए यह व्रत करना चाहें, तो इसे पूरी श्रद्धा, संयम और शांति के साथ करें।

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गीता जयंती: दिव्य ज्ञान के उदय का पावन दिन

 भूमिका : गीता का जन्म और इसकी आध्यात्मिक महिमा

मंगसिर (मार्गशीर्ष) शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिन सनातन परंपरा में बेहद पावन माना जाता है। माना जाता है कि इसी दिन महाभारत के युद्ध क्षेत्र कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को वह दिव्य उपदेश दिया था, जो आगे चलकर श्रीमद्भगवद् गीता के रूप में संकलित हुआ।
यही वजह है कि यह एकादशी गीता जयंती के नाम से प्रसिद्ध है और हर वर्ष इसे बड़े श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाया जाता है।

गीता जयंती क्यों मनाई जाती है?

गीता सिर्फ एक धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाती है।
कठिनाई के समय मन को कैसे स्थिर रखें, कर्म कैसे करें, और भगवान से अपना संबंध कैसे जोड़ें—इन सबका उत्तर गीता में मिलता है।
इसीलिए इसके जन्मदिन को मनाना, हमारे जीवन में ज्ञान के प्रकाश को फिर से आमंत्रित करना होता है।

गीता जयंती पर क्या करें?

1. गीता जी की पूजा करें

इस दिन घर में गीता जी को स्वच्छ स्थान पर स्थापित कर हल्दी, चावल, फूल और दीपक के साथ पूजा की जाती है।
गृहस्थ परिवारों में अक्सर गीता जी की पूजा को माता-पिता की तरह पूरे आदर से किया जाता है।

2. गीता का पाठ

इस दिन गीता जी के कम से कम एक अध्याय या सम्पूर्ण गीता का पाठ करना बेहद शुभ माना जाता है।
कई लोग अपनी मनोकामनाओं के अनुसार विशेष श्लोक भी पढ़ते हैं।

3. आरती और प्रसाद

पूजा के बाद दीपक जलाकर गीता जी की आरती उतारी जाती है।
गुड़, फल, मिश्री या घर का बना हल्का प्रसाद अर्पित किया जाता है।
प्रसाद में भक्ति का भाव ही सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।

4. सत्संग और भगवद् चर्चा

कुछ घरों में परिवार मिलकर गीता पर चर्चा करते हैं,
क्योंकि ज्ञान बाँटने से ही बढ़ता है—यह बात गीता स्वयं सिखाती है।

गीता जयंती का वास्तविक संदेश

गीता जयंती हमें याद दिलाती है कि—
जीवन में चाहे कैसी भी स्थिति आए, धर्म, सत्य और कर्म को कभी न छोड़ें।
कर्म करते रहना ही सफलता और शांति का मूलमंत्र है।
श्रीकृष्ण का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था।

समापन

गीता जयंती केवल एक पूजा-व्रत नहीं,
बल्कि अपने भीतर छिपे अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का दीप जलाने का अवसर है।
अगर आप इस दिन गीता का एक भी श्लोक समझ लेते हैं,
तो मानिए कि आपका दिन सार्थक हो गया।

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मोक्षदा एकादशी व्रत — श्रीकृष्ण की कृपा और पितरों की मुक्ति का पावन अवसर

 सनातन धर्म में एकादशी व्रतों का अपना एक अलग ही स्थान है। यह केवल उपवास भर नहीं, बल्कि मन को शुद्ध करने और ईश्वर से गहरा जुड़ाव बनाने का माध्यम माना जाता है।

इन्हीं एकादशी में से एक है — मोक्षदा एकादशी, जो इस बार 1 December 2025 को पड़ रही है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी श्रद्धालु इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की उपासना करके मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करेंगे।



मोक्षदा एकादशी का परिचय

मोक्षदा एकादशी शुक्ल पक्ष की एकादशी है और इसे दत्त जयंती भी कहा जाता है।
इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के प्रारंभ से पहले अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया था।
इसी कारण यह एकादशी ज्ञान, मुक्ति और जीवन के वास्तविक अर्थ की याद दिलाती है।

क्यों माना जाता है यह दिन सबसे पावन?

गीता का संदेश — जीवन का सार

इस एकादशी पर गीता का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है क्योंकि गीता में बताया गया है—

  • आत्मा न जन्म लेती है, न कभी मरती है

  • शरीर केवल एक वस्त्र की तरह है

  • पुराने शरीर का त्याग और नए शरीर की प्राप्ति एक प्राकृतिक प्रक्रिया है

आज की भागदौड़ में भी ये बातें मन को स्थिर करने में बहुत मदद करती हैं।

मोक्षदा एकादशी व्रत: पालन विधि

मोक्षदा एकादशी का व्रत रखने की विधि बहुत सहज है, बस कुछ नियमों का ध्यान रखने की ज़रूरत होती है।

क्या न करें

  • झूठ बोलने से बचें

  • चुगली और निरर्थक विवादों से दूर रहें

  • किसी का मन दुखाना भी इस दिन वर्जित माना गया है

पूजा कैसे करें

  • सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें

  • भगवान दामोदर (श्रीकृष्ण) की पूजा करें

  • दीप, धूप, नैवेद्य अर्पित करें

  • गीता पाठ अवश्य करें

  • ब्राह्मण भोजन और दान का विशेष महत्व है

ऐसा माना जाता है कि इस दिन किया गया दान सामान्य दिनों की तुलना में कहीं अधिक फलदायी होता है।

मोक्षदा एकादशी की कथा — राजा वैखानस की कहानी

अब बात आती है इस एकादशी से जुड़ी पौराणिक कथा की, जो इस व्रत के महत्व को और भी अधिक बढ़ा देती है।

स्वप्न में दिखाई दिया पिता का कष्ट

बहुत समय पहले गोकुल नामक नगर में वैखानस नाम का राजा राज करता था।
वह दयालु और धर्मप्रिय था।

एक रात उसने स्वप्न में अपने पिता को यमदूतों से दंड पाते हुए देखा।
वह दृश्य इतना पीड़ादायक था कि राजा डरकर उठ बैठा।

सुबह होते ही उसने ज्ञानी ब्राह्मणों से पूछा—
“मेरे पिता की मुक्ति किस प्रकार संभव है?”

पर्वत ऋषि का निर्देश

ब्राह्मणों ने उसे पास स्थित पर्वत ऋषि के आश्रम जाने की सलाह दी।
राजा तुरंत वहाँ पहुँचा और ऋषि को सारा प्रसंग बताया।

ऋषि ने ध्यान करके उत्तर दिया—
“सामान्य धर्मकर्म अपना फल समय से देते हैं।
जल्दी फल देने वाला उपाय है — मोक्षदा एकादशी का व्रत
तुम यह व्रत पूरे नियम से करो और इसका पुण्य अपने पिता को समर्पित कर दो।”

व्रत का चमत्कारिक प्रभाव

राजा ने परिवार सहित व्रत किया और संकल्पपूर्वक उसका फल अपने पिता को अर्पित किया।
कुछ समय बाद उसके पिता स्वर्ग की ओर प्रस्थान करते दिखे।
जाते समय उन्होंने कहा—

“पुत्र! तुम्हारे व्रत और श्रद्धा से ही मुझे मोक्ष प्राप्त हुआ है।”

इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि यह व्रत केवल स्वयं के लिए ही नहीं, बल्कि पूर्वजों और पितरों के उद्धार के लिए भी अत्यंत प्रभावी माना गया है।

मोक्षदा एकादशी आपके लिए क्यों महत्वपूर्ण?

  • यह दिन मन से नकारात्मकता हटाकर शांति देता है

  • पितरों की मुक्ति के लिए सर्वोत्तम तिथि

  • श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है

  • गीता पाठ से जीवन में दृढ़ता और स्पष्टता आती है

  • आध्यात्मिक शक्ति और मानसिक संतुलन मिलता है

समापन — श्रद्धा, भक्ति और सद्कर्म ही मोक्ष का मार्ग

मोक्षदा एकादशी हमें याद दिलाती है कि मुक्ति बाहरी चीज़ों में नहीं, बल्कि हमारे कर्मों, विचारों और श्रद्धा में छुपी है।यह एकादशी आपके जीवन में सुख, शांति और आध्यात्मिक उन्नति लाए—यही शुभकामना।

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Wednesday, November 19, 2025

मित्र सप्तमी व्रत: सूर्य देव की कृपा पाने का पावन अवसर

 हमारे सनातन धर्म में प्रत्येक तिथि का अपना एक विशेष महत्त्व होता है। इन्हीं में से एक है मित्र सप्तमी, जिसे विशेष रूप से सूर्य नारायण की आराधना के लिए मनाया जाता है। कई लोग इसके बारे में कम जानते हैं, इसलिए आज इस ब्लॉग में हम सरल भाषा में समझेंगे कि इस पवित्र व्रत की विधि क्या है और इसका आध्यात्मिक महत्त्व क्यों बताया गया है।



मित्र सप्तमी क्या है?

मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को ‘मित्र सप्तमी’ कहा जाता है। इस दिन सूर्य भगवान के ‘मित्र’ स्वरूप की पूजा की जाती है। हमारे शास्त्रों में सूर्य को केवल प्रकाश और ऊर्जा का स्रोत ही नहीं माना गया, बल्कि सृष्टि के पालनहारों में से एक माना गया है।

व्रत से पहले की तैयारी

इस व्रत की शुरुआत एक दिन पहले की जाती है।

  • सप्तमी के एक दिन पूर्व वपन (मुण्डन) कराया जाता है।

  • उसके बाद स्नान कर मन में व्रत का संकल्प लिया जाता है।

  • व्रती को इस पूरे समय सरल और सात्त्विक आहार का ही पालन करना चाहिए।

(नोट: कुछ क्षेत्रों में लोग प्रतीकात्मक रूप से बाल कटवाना या केवल कंघी-सेवन का नियम निभाते हैं, यह परम्परा परिवार की रीति अनुसार बदल जाती है)

मित्र सप्तमी की पूजा-विधि

सप्तमी के दिन स्नान कर सूर्य भगवान की पूजा की जाती है—

  • सूर्य देव का षोडशोपचार पूजन

  • आसन, जल, पुष्प, चंदन, नैवेद्य आदि का अर्पण

  • सूर्य स्तुति एवं आरती

  • ब्राह्मणों को भोजन कराना

पूजन के बाद व्रती शहद मिश्रित मीठे भोजन का सेवन करता है। इसे मधुप्लावित अन्न भी कहते हैं।

अष्टमी का विशेष नियम

कुछ ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि सप्तमी के दिन फलाहार किया जाए और अष्टमी को—

  • ब्राह्मणों, कलाकारों, नर्तकों आदि को भोजन करवाया जाए

  • व्रती स्वयं भी शहद मिले अन्न का भोजन करे

यह कृतज्ञता और दान की भावना को दर्शाता है।

शास्त्रीय मान्यता: सूर्य का दिव्य स्वरूप

ब्रह्मपुराण के मुताबिक—

  • सूर्य देव किसी द्वारा निर्मित नहीं हैं

  • वे भगवान विष्णु की दाहिनी आँख से प्रकट हुए

  • माता अदिति और महर्षि कश्यप के पुत्र कहलाते हैं

  • उनके ‘मित्र’ रूप की आराधना से जीवन में प्रकाश, मित्रता और ऊष्मा आती है

सूर्य केवल भौतिक प्रकाश ही नहीं देते, वे आत्मिक ऊर्जा के स्रोत भी हैं।

इस व्रत का आध्यात्मिक लाभ

  • मन और शरीर में ऊर्जा का संचार

  • स्वास्थ्य में सुधार

  • जीवन में सफलता की अनुभूति

  • संबंधों में मधुरता

  • आत्मविश्वास और तेज़ (ओज) की प्राप्ति

सच कहूँ तो, सूर्य देव का ध्यान करने से एक अलग ही तरह का उत्साह मन में आता है। सुबह सूर्योदय के समय प्रातः जल अर्पित करते हुए “ॐ सूर्याय नमः” जप करने का अनुभव वाकई अलौकिक होता है।

अंतिम विचार

मित्र सप्तमी केवल एक धार्मिक परम्परा नहीं, बल्कि जीवन में प्रकाश, सत्य और ऊर्जा स्थापित करने का सुंदर अवसर है। आज की व्यस्त जीवनशैली में भी यदि हम कुछ पल सूर्य भगवान की आराधना में लगा दें, तो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन स्वतः आने लगते हैं।

कभी समय मिले, तो इस व्रत को नियम से करें—देखना मन में अद्भुत शांति और तेज़ उत्पन्न होता है। #MitraSaptami #SuryaDevPuja #HinduRituals #SanatanDharma #IndianFestivals #SuryaAradhana #SaptamiVrat #VedicTradition #SpiritualBlogs #HinduCulture #IndianSpirituality #SuryaNamaskar #DevotionalLifestyle #FestivalsOfIndia #BhaktiPath #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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मकर-संक्रान्ति गीत

   मकर-संक्रान्ति आई रे, ले आई उजियारा, सूरज बदले अपनी चाल, जग बोले जय-जयकारा। तिल-गुड़ की ये मिठास में, घुल जाए हर एक दूरी, दान, स्ना...