Wednesday, September 02, 2020

पितृ पक्ष |||| Pitru Paksha ||खोले अपने पूर्वजो के मोक्ष द्वार...

आधुनिक व्यक्ति चाहे न मानें, परन्तु यह एक सत्य है कि समाज में आज भी पितरों के दोष, भूत-प्रेतों के प्रकोप देखने को मिलते हैं। इनमें रोचक बात कभी-कभी देखने को मिलती है कि भूत-प्रेत स्वयं कहते हैं कि ‘‘हमारा उद्धार कराया जाए।’’
श्राद्धों का पितरों के साथ अटूट सम्बन्ध है। पितरों के बिना श्राद्धों की कल्पना तक नहीं की जा सकती। श्राद्ध पितरों को आहार पहुंचाने का केवल-मात्र माध्यम है।
अब हमें श्राद्ध और पितरों की अलग-अलग व्यत्पत्ति और परिभाषा करनी होगी। मृत व्यक्तियों के लिए जो श्रद्धायुक्त होकर, पिर्तण, पिंड, दानादि दिया जाता है, उसे श्राद्ध कहा जाता है। जिस मृत व्यक्ति के एक वर्ष तक के सभी औध्र्व दैहिक किरया कर्म सम्पन्न हो जाएं, उसी की पितर संज्ञा हो जाती है।
जिस प्रकार देवलोक, मृत्यु लोकादि है। उसी प्रकार पितृलोक भी है।
पितरों के सात वंश हैं। इनमें तीन अमूर्त पितृवंश है और चार मूर्तिमान है। अमूर्त पितर वैराज नामक प्रजापति की संतान है। ये सभी सन्तान लोकों को प्राप्त करने के पश्चात् योग मार्ग से भ्रष्ट हुए है। देवगण इनकी पूजा करते है। ब्रह्मा के दिन के अंत में ब्रह्मवादी रूप में प्रकट होते है। फिर सांख्ययोग का आश्रय लेकर सांख्यमत और ब्रह्म का प्रचार-प्रसार करते है। स्वयं योग-अभ्यास द्वारा आवागमन के चक्र से मुक्त होते है। इनकी एक मानसी कन्या है जिस का नाम मना है। यह हिमाचल की पत्नी और पार्वती की माता है।
सूर्य मंडल में मरीचि गर्मलोक है। वहां हविष्मान नामक पितर निवास करते है। ये क्षत्रियों के पितर है।
20 अंश रेतस् (सोम) को पितृऋण कहते हैं। 28 अंश रेतस् के रूप में श्रद्धा नामक मार्ग से भेजे जाने वाले पिण्ड तथा जल आदि के दान को श्राद्ध कहते हैं। इस श्रद्धा नाम मार्ग का संबंध मध्याह्न काल में श्राद्ध करने का विधान है।
प्रजापति कदर्भ के लोगों में आज्यप पितर निवास करते ह। ये वैश्यों के पितर है।
ब्रह्माण्ड के ऊपर मानस लोग में ‘‘सोमप’’ नामक पितर रहते है। ये ब्राह्मणों के पितर है।
इन पितरों का सृष्टि के निर्माण-संरक्षण में महत्वपूर्ण सहयोग है। ये सृष्टि की सुव्यवस्था के लिए नियम, सिद्धांत, अचार-व्यवहार के सम्यक् प्रकार से संचालन के लिए भी देवों से पीछे नहीं है। अपने भक्तों के लिए विविध फलों को प्रदान करने की इनमें पूर्ण सामथ्र्य है।
सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा जी ने इन सब प्रकार के पितरों की तुष्टि-पुष्टि के लिए श्राद्धों का निर्माण किया था। इसलिए पितर अपने विशेष दिनों में अपने वंशजों से कुछ कामनाएं रखते है। मत्स्य पुराण के दौ सौ चारवें अध्याय के श्राद्ध कल्प में भगवान मत्स्य जी राजेंद्र मनु से कहते है, ‘‘राजन्! पितर अपने लोक में स्थित हुए कथन करते है। क्या कोई हमारे वंश में ऐसा व्यक्ति उत्पन्न होगा जो शीतल जल वाली नदियों में जाकर जलान्जली देगा? दूध-मूल-फूल खाद्य सामग्रियों और तिल सहित श्राद्ध करेगा? कूप-बगीचा- सरोबर-बावड़ियों का निर्माण करोगय? सूर्य ग्रह में योगियों को हमारे निमित्त भोजन करायेगा? या कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो विद्या दान करेगा? यदि एक भी ऐसा कोई कर्म करेगा तो हमें अन्नत तृप्ति का अनुभव होगा।’’
श्राद्ध में मुख्य बात ‘‘श्राद्ध’’ की है। श्राद्ध से करने पर पितृगण तृप्त हो जाते हैं। वस्तु बहुमूल्य है या अल्पमूल्य की इसकी अपेक्षा पितृगण नहीं करते। भगवान् श्रीमदभगवद्गीता में कहते हैं-
पत्रं पुष्पं फलं तायें यो में भक्त्या प्रगच्छति।
तहदं  भक्त्युपहृतमश्नामि  प्रयतात्मनः।।
यदि कोई प्रेम तथा भक्ति के साथ मुझे पत्र पुष्प, फल या जल प्रदान करता है, तो मैं उसे स्वीकार करता हूं।
पितरों के इस प्रकार के कथनों से सुस्पष्ट हो जाता है कि मृत व्यक्तियों का शारीरिक सम्बन्ध हमारे से टूटने पर भी परोक्ष सम्बन्ध बना रहता है। इस सम्बन्ध के कारण पितर अपने वंशजों से कुछ इच्छा रखते है।
यदि पितरों की विशेष दिनों में श्राद्धों में कामना पूर्ति होती है तो वे भी अपने आशीर्वादों से उनको सुख-शांति प्रदान करते हैं। उन्हें प्रगतिशील बनाते हैं।
इसके विपरीत जब पितरों की कामना पूर्ति नहीं होती तो वे क्रोध में भरकर शाप देकर अपने वंशजों की सुख-शांति को नष्ट कर देते हैं। ऐसे व्यक्तियों के जीवन में अभाव ही अभाव रहता है। वे कभी सुख चैन का जीवन-यापन नहीं कर सकते।
इसीलिए अनादिकाल से लेकर बीसवीं शताब्दी तक श्राद्ध कर्म करने की परम्परा अक्षुण्ण चली रही। परन्तु अब इस कर्म को व्यर्थ और पाखण्ड समझा जाने लगा है। इसी कारण हमारे जीवनों में विविध समस्याएं, संकट, अभाव उत्पन्न हो गये। इनमें कुछ समस्याएं, संकट और अभव ऐसे होते हैं, जिनका कुछ भी कारण हमें समझ मंे नहीं आता।
इस बात को अब आधुनिक व्यक्ति चाहे न माने, परनतु यह एक सत्य है कि समाज में आज भी पितरों के दोष, भूत-प्रेतों के प्रकोप देखने को मिलते हैं। इनमें रोचक बात कभी-कभी देखने को मिलती है कि भूत-प्रेत स्वयं कहते हैं ‘‘कि हमारा उद्धार कराया जाए।’’
आयुः  पुत्रान्यशः  स्वर्ग  कीर्तिपुष्टि  बलंश्रियम्।
पशूनसौख्यम् धनं धान्यं प्राप्नुयात्पित् पूजनात्।।
पितरों की पूजा करने से आयु पुत्र, यश, स्वर्ग कीर्ति पुष्टिबल, लक्ष्मी पशु, धान्य प्राप्त होते हैं। मृत व्यकित्यों का श्राद्ध तर्पण नहीं कराने से उनसे पितृगण सदा असंतुष्ट रहते हैं और पुत्रादि को कोसते हैं।
गया आदि कितने तीर्थ स्थल इस भारत भूमि पर विद्यमान हैं। यहां भूत-प्रेत बने मृत जीवात्मओं का उद्धार कराया जाता है। इस संदर्भ में कितने समाचार समय-समय पर समाचारपत्रों मं पढ़ने को मिलते है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि जिन मृत व्यक्तियों कर्म श्राद्धादि कर्मसविधिसम्पन्न होते हैं, उन्हीं की पितर-संज्ञा होती है। जब भूत-प्रेतों का उद्धार हो जाता है, तब ये भी पितरों की परिधि में आ जाते हैं। भूत-प्रेतों का व्यक्तियों को पीड़ित करने का तात्पर्य भी अपना उद्धार करवाना ही होता है।
ज्योतिष शास्त्र में कुछ ग्रह-स्थितियों से पितृदोष के स्पष्ट उल्लेख हैं। आयुर्वेद शास्त्र भी पितृदोष को मान्यता देता है। गीता में मृत प्राणी के अपने गन्तव्य तक पहुंचने के लिए देवमार्ग और पितृमार्ग कहे गये हैं। शुक्ल-पक्ष को देवपक्ष और कृष्ण पक्ष को पितृपक्ष कहा गया है। चन्द्रमा को पितरों का प्रतीक माना है।
इन सब तथ्यों से सिद्ध हो जाता है कि परोक्ष रूप से पितरों का वर्तमान के मनुष्यों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है। वर्तमान मनुष्य श्राद्धों के द्वारा अपने पितरों को संतुष्ट और पुष्ट करते हैं। इसके बदले में पितर श्राद्धकर्ता को सुख-शांति, सौभाग्य, ऐश्वर्य, प्रगति, धन-धान्यादि अनेक सम्पत्तियां प्रदान करते हैं।|| 
आयुः  पुत्रान्यशः  स्वर्ग  कीर्तिपुष्टि  बलंश्रियम्।
पशूनसौख्यम् धनं धान्यं प्राप्नुयात्पित् पूजनात्।।
पितरों की पूजा करने से आयु पुत्र, यश, स्वर्ग कीर्ति पुष्टिबल, लक्ष्मी पशु, धान्य प्राप्त होते हैं। 
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Saturday, August 15, 2020

भाद्रपद संक्रान्ति

भाद्रपद संक्रान्ति
 तारीख 16 अगस्त रविवार की रात्रि 7:10 पर कुंभ लग्न में प्रवेश करेगी वारा अनुसार घोरा तथा नक्षत्र अनुसार महोदरी नामक यह संक्रांति कपटी एवं दुष्ट लोगों के लिए लाभप्रद रह सकती है। 45  मुहूर्ति इस संक्रांति का पुण्य काल दोपहर 12:46 बाद प्रारंभ होगा रविवारी संक्रांति होने से राजनीतिक क्षेत्रों में अस्थिरता एवं अशांति होने के संकेत हैं , कहीं अनाज की कमी के कारण दुर्भिक्ष एवं अराजकता व्याप्त हो सकती है। राजनेताओं में परस्पर विग्रह एवं टकराव पैदा हो सकते हैं। अनाज भी तेल आदि पदार्थों में अधिक तेजी के कारण प्रजा पीड़ित रह सकती है।
 संक्रांति फल-- मेष, वृष, सिंह, तुला, वृश्चिक, मकर,   कुंभ ,मीन राशि वालों के लिए लाभप्रद रहेगी ।
 शेष राशि वालों को कष्ट रह सकता है।
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Tuesday, August 11, 2020

श्री कृष्णजन्माष्टमी

श्री कृष्णजन्माष्टमी
भाद्रपद कृष्णाष्टमी को ‘जन्माष्टमी’ उत्सव मनाया जाता है। इसी तिथि को श्री कृष्ण का मथुरा नगरी में कंस के कारागार में जन्म हुआ था। इस दिन कृष्ण जन्मोत्सव के उपलक्ष में मन्दिरों में जगह-जगह कीर्तन तथा झांकियां सजाई जाती हैं। बारह बजे रात्रि तक व्रत रखकर भगवान का प्रसाद लिया जाता है। दूसरे दिन प्रातः ही इसी उपलक्ष में ‘नन्द महोत्सव’ भी मनाया जाता है। भगवान के ऊपर  हल्दी, दही, घी, तेल आदि छिड़क कर आनन्द से पालने में झुलाया जाता है। जन्माष्टमी के दिन उपवास करने से मनुष्य सात जन्मों के पापों से छूट जाता है। 
कथा - द्वापर युग में जब पृथ्वी पाप तथा अत्याचारों के भार से दबने लगी तो पृथ्वी गाय का रूप बनाकर सृष्टिकर्ता विधाता के पास गई। ब्रह्मा जी सब देवताओं के सम्मुख पृथ्वी की दुखान्त कथा सुना गये। तब सभी देवगण निर्णयार्थ विष्णु के पास चलने का आग्रह किये और सभी लोग पृथ्वी को साथ लेकर और क्षीर सागर पहुंचे जहां भगवान विष्णु अनन्त शय्या पर शयन कर रहे थे। स्तुति करने पर भगवान की निद्रा भंग हुई तथा सबसे आने का कारण पूछा। तब दीन वाणी में पृथ्वी बोली-महाराज! मेरे ऊपर बड़े-बड़े पापाचार हो रहे हैं, इसलिये इसका निवारण कीजिये। यह सुनकर भगवान बोले-मैं ब्रजमण्डल में वसुदेव गोप की भार्या, कंस की बहन देवकी के गर्भ से जन्म लूंगा। तुम लोग ब्रजभूमि में जाकर यादवकुल में अपना शरीर धारण करो। इतना कहकर भगवान अन्तध्र्यान हो गये। वही देवता तथा पृथ्वी ब्रज में बाकर यहुकुल में नन्द-यशोदा तथा गोपियों के रूप में पैदा हुये।
कुछ दिन व्यतीत हुये, वसुदेव नवविवाहित देवी तथा साले कंस के साथ गोकुल जा रहे थे- तभी अचानक आकाशवाणी हुई कि हे कंस! जिसको तू अपनी बहन समझकर साथ ले जा रहा है, उसी के गर्भ का आठवां पुत्र तेरा काल होगा? कंस यह सुनते ही तलवार निकालकर देवकी को मारने दौड़ा। तब सवुदेव ने हाथ जोड़कर कहा- कंसराज! यह औरत बेकसूर है इसे आपका मारना ठीक नहीं। पैदा होते ही मैं आपको अपनी सब संतानें दे दिया करुंगा तो कौन आपको मारेगा? कंस उनकी बात मान गया तथा उन्हें जेल में ले जाकर बन्द कर दिया। इसी रीति से वसुदेव अपने सभी पुत्रों को देते गये तथा पापिष्ट कंस मारता गया। देवकी के सात पुत्रा मारे जाने के पश्चात् आठवें गर्भ की बात जब कंस को मालूम हुई, तब विशेष कारागार में डालकर पहरा लगवा दिया। भादों की भयानवी रात के समय जब शंख, चक्र, गदा, पद्यमधारी भगवान कृष्ण का जन्म हुआ तो चारों ओर प्रकाश फैल गया।
लीलाधारी भगवान की यह लीला देख वसुदेव-देवकी उनके चरणों में गिर पड़े। भगवान कृष्ण ने बालक रूप में होकर अपने को गोकुल नन्द घर पहुंचाने तथा वहां से कन्या लाकर कंस को सौंपने का आदेश दिया। जब वसुदेव कृष्ण को गोकुल ले चलने को तैयार हुये तभी उनके हाथ की हथकड़ियां तड़तड़ा कर टूट गई। दरवाजे अपने-आप खुल गये। पहरेदार सोये हुये नजर आये। वसुदेव ने जब कृष्ण को लेकर यमुना में प्रवेश किया तो जमुना बढ़ने लगीं, यहां तक कि गले को छू लिया। चरण चरण-कमल छूने को लालायित जमुना कृष्ण द्वारा पैर लटका देने पर बिलकुल घट गई। वसुदेव यमुना पार कर गोकुल गये वहां खुले दरवाजे तथा सोई हुई यशोदा को देखकर बालक कृष्ण को वहीं सुला दिया और सोई हुई कन्या को लेकर चले आये। जब वसुदेव कन्या लेकर आ गये तो जेल के दरवाजे पूर्ववत बन्द हो गये। वसुदेव देवकी के हाथों में हथकड़ियां पड़ गई तथा कन्या रोने लगी। जगे हुए प्रहरी गणां ने कन्या रुदन सुनकर तुरन्त कंस के पास खबर कर दी। यह सुनते ही कंस ने कन्या को लेकर पत्थर पर पटकना चाहा। लेकिन वह हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई तथा वहां पहुंचते ही साक्षात् देवी के रूप में होकर बोली- हे कंस! तुम्हें मारने वाला तो गोकुल में बहुत पहले ही पैदा हो चुका है। यही भगवान कृष्ण बड़े होने पर, अकासुर, पूतना तथा क्रूर कंस जैसे राक्षसों का वध कर पृथ्वी तथा भक्तों की रक्षा की।
आरती श्रीकृष्ण जी की
आरती श्री कृष्ण की कीजै।। टेक......
शंकटासुर को जिसने मारा। तृणावर्त को आय पछारा।।
उनके गुण का वर्णन कीजै।। आरती...........
यमुनार्जुन वट जिसने तारे। बकासुरादि असुर जिन मारे।।
उनकी कीरति वर्णन कीजै।। आरती..........
जिसने घेनुक प्राण निकारे।कलियानाग नाथि के  डारे।।
उसी नाथ का कीर्तन कीजै।। आरती..............
व्योमासुर को स्वर्ग पठाया। कुब्जा को जिसने अपनाया।।
दयावान के सुपरथ हूजै।। आरती...............
वृषभासुर सेजिसने मारे। चारुणादिक सभी पछारे।।
आरती यदुनन्दन की कीजै।। ..............
जिसनेकेसी केश उखारे। कंसासुर के प्राण निकारे।।
आरती कंस हनन की कीजै।। आरती....
जिसने द्रोपदि लाज बचाई। नरसीजी का भात चढ़ाई।।
आरत भक्त वक्षल की कीजै।। आरती...............
भक्तन के जो है रखवारे। रनवीरा’ मन बसनेवो।।
उनहां पर बलिहारी हुजै।। आरती....
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Sunday, August 02, 2020

रक्षा-बन्धन (श्रावणी)

रक्षा-बन्धन (श्रावणी)
यह त्यौहार सावन की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह भाई बहन को स्नेह की डोर में बांधने वाला त्यौहार है। इस दिन बहन-भाई के हाथ में रक्षा बांधती है तथा मस्तक पर टीका लगाती है। रक्षा बंधन का अर्थ है (रक्षा$बंधन) अर्थात् किसी को अपनी रक्षा के लिये बांध लेना। राखी बांधते समय बहन कहती है- हे भैया! तुम्हारे शरण में हूं मेरी सब प्रकार से रक्षा करना। एक बार भगवान कृष्ण के हाथ में चोट लग गई तथा खून गिरने लगा। द्रौपदी ने जब देखा तो वह तुरन्त धोती का कोर फाड़कर भाई के हाथ में बांध दिया। इसी बन्धन के ऋणी श्रीकृष्ण ने दुःशासन द्वारा चीर खींचते समय द्रौपदी की लाज रखी थी।
मध्य कालीन इतिहास में एक ऐसी घटना मिलती है जिसमें चित्तौड़ की हिन्दूरानी कर्मवती ने दिल्ली के मुगल बादशाह हुमायूं को अपना भाई मानकर उसके पास राखी भेजी थी। हुमायूं ने कर्मवती की राखी स्वीकार कर ली और उसकी सम्मान रक्षा के लिये गुजरात के बादशाह से युद्ध किया।
कथा - एक बार युधिष्ठर ने कृष्ण भगवान से पूछा- अच्युत! मुझे रक्षा बन्धन की वह कथा सुनाइये जिससे मनुष्यों की प्रेत बाधा तथा दुःख दूर होता है। इस पर भगवान ने कहा- हे पाण्डव श्रेष्ठ! प्राचीन समय में एक बार देवों तथा असुरों में बारह वर्षों तक युद्ध हुआ इस संग्राम में देवराज इन्द्र की पराजय हुई। देवता कान्ति विहीन हो गये। इन्द्र रणस्थल छोड़कर विजय की आशा को तिलांजलि दे-देकर देवताओं सहित अमरावती में चला गया।
विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। उसने राजपद से घोषित कर दिया कि इन्द्र देव सभा में न आयें तथा देवता एवं मनुष्य यज्ञ-कर्म न करें। सब लोग मेरी पूजा करें। जिसको इसमें आपत्ति हो वह राज्य छोड़कर चला जाय। दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ, वेद पठन-पाठन तथा उत्सव समाप्त कर दिये गये। धर्म के नाश होने से देवों का बल घटने लगा। इधर इन्द्र दानवों से भयभीत हो, बृहस्पति को बुलाकर कहने लगा-हे गुरु! मैं शत्रुओं से घिरा हुआ प्राणान्त संग्राम करना चाहता हूं। होनहार बलवान होेती है, जो होना होगा होकर रहेगा। पहले तो बृहस्पति ने समझाया कि कोप करना व्यर्थ है परन्तु इन्द्र की हठवादिता तथा उत्साह देखकर रक्षा विधान करने को कहा।
श्रावण पूर्णिमा के प्रातःकाल की रक्षा का विधान सम्पन्न किया गया।
‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
उक्त मन्त्रोच्चारण से बृहस्पति (देवगुरु) ने श्रावणी-पूर्णिमा के ही दिन रक्षा विधान किया। सह धर्मिणी इन्द्राणी के साथ वृत्र संहारक इन्द्र ने बृहस्पति की उस वाणी का अक्षरण पालन किया। इन्द्राणी ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा स्वस्तिवाचन कराके इन्द्र के दांये हाथ में रक्षा की पोटली बांध दिया। इसी के बल पर इन्द्र ने दानवों पर विजय प्राप्त किया।

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Wednesday, July 29, 2020

पुत्रदा एकादशी

पुत्रदा एकादशी
यह एकादशी सावन शुक्ल पक्ष ‘पुत्रदा एकादशी’ के नाम से मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के नाम पर व्रत रखकर पूजन करना चाहिए। तत्पश्चात् वेदपाठी   ब्राह्मणों को भोजन कराके दान देकर आशीर्वाद लेना चाहिए। सारा दिन भवान के वंदन, कीर्तन में बिताना चाहिए तथा रात्रि में भगवान की मूर्ति के पास ही सोना चाहिए। इस व्रत को रखने वाले निःसन्तान व्यक्ति को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।
कथा - प्राचीन समय में महिष्मती नगरी में महीजित नामक राजा राज्य करते थे। अत्यन्त धर्मात्मा, शान्ति प्रिय तथा दानी होने पर भी उनके कोई सन्तान नहीं थी। इसी से राजा अत्यन्त दुःखी थे। एक बार राजा ने अपनी राज्य के समस्त ऋषियों को बुलाया तथा संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। इस पर परम ज्ञानी लोमश ऋषि ने बताया कि आपने पिछले सावन मास की एकादशी को आपने तालाब से प्यासी गाय को पानी पीने से हटा दिया था। उसी के शाप से आपके कोई सन्तान नहीं हो रही है। इसलिये आप सावन मास की पुत्रदा एकादशी का नियम पूर्वक व्रत रखिये तथा रात्रि जागण कीजिए, पुत्र अवश्य प्राप्त होगा। ऋषि के आज्ञानुसार राजा एकादशी व्रत रहा और पुत्ररत्न प्राप्त हुआ।

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Saturday, July 25, 2020

नाग पंचमी

नाग पंचमी
श्रावण शुक्ल पंचमी को नागपंचमी होती है। इस दिन नागों की पूजा करी जाती है। इस दिन घर के दोनों कोनों में नाग की मूर्ति खींचकर अनन्तर प्रमुख महानगरों का पूजन करना चाहिए। ज्योतिष के अनुसार पंचमी तीथि के स्वामी नाग माने जाते हैं। सुंगधित पुष्प तथा दूध सर्पों को बहुत प्रिय होते हैं।
कथा - प्राचीन दन्त कथाओं से ज्ञान होता है कि किसी ब्राह्मण के साथ पुत्र वधुएं थी , श्रावण मास लगते ही 6 बहुओं भाई के साथ माइके चली गयीं परन्तु अभागी सातवीं का कोई भाई नहीं था कौन बुलाने आता? बेचारी ने अति दुखित होकर पृथ्वी को धारण करने वाले शेष नाग को भाई के रूप याद किया। करुणायुक्त, दीनवाणी को सुनकर शेषजी बृद्ध ब्राह्मण के रूप में आये, और उसे लिवाकर चले गये। थोड़ी दूर रास्ता तय करने पर उन्होंने अपना असली रूप धारण कर लिया तब फन पर बैठाकर नाग लोक ले गये। वहां वह निश्चित होकर रहने लगी। पाताल लोक में वह जब निवास कर रही थी, उसी समय शेष जी कुल परम्परा में नागों के बहुत से बच्चों ने जन्म लिया। उस नाग बच्चों को सर्वत्र विचरण करते देख शेष नाग रानी ने उस वधू को पीतल का एक दीपक दिया तथा बताया कि इसके प्रकाश से तुम अन्धेरे में भी सब कुछ देख सकोगी। एक दिन अकस्मात् उसके हाथ से दीपक टहलते हुए नाग बच्चों पर गिर गया। परिणामस्वरूप उन सबकी थोड़ी पूंछ कट गई।
यह घटना घटित होते ही कुछ समय बाद वह ससुराल भेेज दी गई जब अगला सावन आया तो वह वधू दीवार पर नाग देवता को उरेह कर उनकी विधिवत् पूजा तथा मंगल कामना करने लगी। इधर क्रोधी नाग बालक माताओं से अपनी पूंछ काटने का आदिकारण इस वधू को मारकर बदला चुकाने आये थे, लेकिन अपनी ही पूजा में श्रद्धा वनत उसे देखकर वह सब प्रसन्न हुए और उनका क्रोध समाप्त हो गया। बहनस्वरूपा उस वधू के हाथ से प्रसाद रूप में उन लोगों ने दूध तथा चावल भी खाया। नागों ने उसे सर्प कुल से निर्भय होने का वरदान तथा उपहार में मणियों की माला दी। उन्होंने यह भी बताया कि श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को हमें भाई रूप में जो पूजेगा उसकी हम रक्षा करते रहेंगे।
नाग पंचमी की तिथि: और शुभ मुहूर्त
नाग पंचमी की तिथि: 24 जुलाई 2020
नाग पंचमी तिथि प्रारंभ: 24 जुलाई 2020 को दोपहर 02 बजकर 34 मिनट से.
नाग पंचमी तिथि समाप्‍त: 25 अगस्‍त 2020 को दोपहर 12 बजकर 02 मिनट तक.
नाग पंचमी की पूजा का मुहूर्त: 25 जुलाई 2020 को सुबह 05 बजकर 39 मिनट से सुबह 08 बजकर 22 मिनट तक.

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Tuesday, July 07, 2020

भद्रा में शुभ कर्म त्याज्य

भद्रा में शुभ कर्म त्याज्य

 प्राचीन काल में देव और दानवों के संग्राम के अवसर पर भगवान महादेव के शरीर से भद्रा की उत्पत्ति हुई। इसका मुहँ गर्दभ के समान हैं। लम्बी इसकी पूंछ है। इसके तीन पैर हैं। इसकी गर्दन सिंह की तरह हैं। मुर्दे पर यह आरूढ़ हैं। इसके सात हाथ हैं। पेट इसका शुष्क यह महा भंयकर, विकराल मुखी और बड़े - बड़े भयानक दांतो से युक्त है। इसके साथ - साथ अग्नि की ज्वाला भी चलती है।    उत्पन्न होते ही इसने राक्षसों का संहार शुरू कर दिया। देवताओं ने प्रसन्न होकर उसे विष्टि नाम दिया और इसे करणों में स्थान दिया।
जब मेष, वृष, मिथुन, और वृश्चिक का चन्द्रमा होता है तब स्वर्ग लोक में भद्रा का निवास  माना  जाता है। कन्या, तुला, धानु, और मकर राशि के चन्द्रमा में  पाताल में भद्रा रहती है। कुंभ, मीन, और कर्क, सिंह के चन्द्रमा में भद्रा पृथ्वी पर होती है। किसी भी माह के कृष्ण पक्ष में दशमी, तृतीय, सप्तमी , और चतुर्दशी को भद्रा रहती है। प्रारम्भ की 2 तिथियों में  भद्रा तिथि की अंतिम तीस घटियों में लगती है। जबकि अंतिम 2 तिथियों प्रारम्भ की तीस घड़ी भद्रा रहती हैं। शुक्ल पक्ष में एकादशी, चतुर्थी, अष्टमी और पूर्णिमा को भद्रा जाननी चाहिए। मोटे रूप में केवल पृथ्वी की भद्रा ही शुभ कार्य मेंछोड़ने योग्य है। चाहिए। लेकिन अघिकांश पण्डितों का विचार है कि यथासम्भव सभी लोकों की भद्रा में शुभ कार्य नही किये जाने चाहिए। भद्रा में शुभ कार्य करने पर तो वह कार्य सिद्ध होगा ही नही, स्वंम भी अशुभ फ़ल प्राप्त करेगा। होली और रक्षा-बन्धान पर प्रायः भद्रा रहती है। जानकारी के अभाव मेें प्रायः गांवो में भद्रा में ही सूम जिमा देते है। और रक्षा - बन्धान कर देते है, जो बहुत ही अशुभ है।
भद्रा में अपराधाी को फ़ांसी लगाना, गिरफ्तार करना, ऊँट, घोड़े और बैल को ‘ सीधा ‘ (दमन) करना और उच्चाटन आदि तांत्रिक कर्म करना अच्छा माना जाता है। 
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नौतपा 2026: आखिर क्यों माने जाते हैं साल के सबसे गर्म 9 दिन?

  गर्मी का मौसम आते ही लोग एक शब्द बार-बार सुनने लगते हैं — नौतपा । गांव हो या शहर, बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं, “अभी तो नौतपा बाकी है, असली...