Wednesday, August 13, 2025

वत्स द्वादशी व्रत 2025 – महत्व, पूजन विधि और कथा

 वत्स द्वादशी क्या है?

वत्स द्वादशी, जिसे बछ बारस, बछद्वा, ओक दुआस  या बलि द्वादशी भी कहा जाता है, संतान की प्राप्ति, उनकी रक्षा और सुखी जीवन की कामना के लिए किया जाने वाला एक पवित्र व्रत है। यह व्रत विशेष रूप से पुत्रवती स्त्रियों द्वारा रखा जाता है और बहुरा चौथ  तथा हरछठ की तरह पुत्र-सुख के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। महाराष्ट्र में इसे वासु बारस कहा जाता है और यह दिवाली उत्सव की शुरुआत का भी प्रतीक है।



व्रत का महत्व

  • संतान सुख की कामना – इस व्रत के माध्यम से संतान के दीर्घायु, स्वास्थ्य और खुशहाल जीवन की प्रार्थना की जाती है।

  • गाय और बछड़े की पूजा – इस दिन गाय और उसके बछड़े की पूजा होती है, क्योंकि गाय को ‘कामधेनु’ माना गया है, जो सभी इच्छाएं पूर्ण करने वाली है।

  • धार्मिक परंपरा – व्रत में गीली मिट्टी से गाय, बछड़ा, बाघ और बाघिन की मूर्तियां बनाकर पूजन किया जाता है।

  • दान का महत्व – इस दिन अंकुरित मोठ, मूंग और चने जैसे द्विदलीय अनाज का दान और सेवन शुभ माना जाता है।

  • वर्जित खाद्य – एक दलीय अनाज (जैसे गेहूं, जौ) और गो-दुग्ध का सेवन इस दिन वर्जित रहता है।

व्रत की तिथि 2025 में

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को यह व्रत मनाया जाता है। साल 2025 में वत्स द्वादशी का पर्व 20 अगस्त को मनाया जाएगा।

पूजन विधि

  1. प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

  2. पाट पर गीली मिट्टी से गाय, बछड़ा, बाघ और बाघिन की मूर्तियां बनाएं।

  3. नैवेद्य के रूप में अंकुरित मोठ, मूंग और चने चढ़ाएं।

  4. एक दलीय अनाज और दूध का उपयोग न करें।

  5. परिवार के बच्चों और गौवंश की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।

वत्स द्वादशी की कथा

कहा जाता है कि एक राजा और रानी के अनेक संतान थीं। एक दिन राजा ने संन्यास लेने का विचार किया। पंडितों ने उन्हें घर पर रहकर पुण्य कार्य करने की सलाह दी और तालाब बनवाने को श्रेष्ठ बताया।

राजा ने सुंदर तालाब बनवाया, परंतु पानी नहीं भरा। पंडितों ने कहा कि जल आने के लिए कुबरे कुत्ते, भूरी बिल्ली, ज्येष्ठ पुत्र के बेटे और अगले हल की गोंईं की बलि देनी होगी। राजा अपने बेटे के इकलौते पुत्र की बलि के लिए तैयार नहीं था।

बलि का दिन हरछठ तय हुआ। राजा ने बहू को मायके भेज दिया। वहां उसकी मां ने सच्चाई बताई और उसे ओक दुआस   का पूजन करने को कहा।

बहू ने ससुराल लौटकर तालाब के पास स्नान किया, मिट्टी के बाघ-बाघिन बनाए और भीगे चनों से अर्घ्य देते हुए मंत्र बोला –
"ओख मोख नदी नारु कच्छ मच्छ के बीच होइकै मोर अगले कै गोंईं उबर पार होय।"

पहले अर्घ्य से गोंईं, फिर भूरी बिल्ली और कुबरा कुत्ता और अंत में उसका पुत्र बाहर निकल आया। बहू ने पुत्र को पाकर सास-ससुर को खरी-खोटी सुनाई। राजा ने अपनी गलती मानते हुए कहा कि यह बहू का सौभाग्य है जो उसका पुत्र लौट आया। इसके बाद सब आनंदपूर्वक रहने लगे।

निष्कर्ष

वत्स द्वादशी केवल संतान-सुख के लिए ही नहीं, बल्कि पारिवारिक सौहार्द, धर्म और परंपरा के संरक्षण का प्रतीक भी है। मिट्टी की मूर्तियों, अनाज के दान और गौ-पूजन की यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।

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गुग्गा नवमी 2025: वीर गोगाजी की पूजा, परंपरा और महत्व

 गुग्गा नवमी राजस्थान और उत्तर भारत के कई हिस्सों में बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाने वाली एक महत्वपूर्ण धार्मिक और लोकपर्व है। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। गुग्गा नवमी व्रत 2025 में 17 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन वीर गोगाजी चौहान, जिन्हें ‘जाहर पीर’ और ‘गोगा पीर’ के नाम से भी जाना जाता है, की विशेष पूजा-अर्चना होती है।


गोगाजी कौन थे?

राजस्थान के महान वीरों की सूची में गोगाजी चौहान का नाम विशेष सम्मान से लिया जाता है। इन्हें पाँच पीरों में स्थान प्राप्त है और राजस्थानी समाज इन्हें देवता स्वरूप पूजता है। लोककथाओं के अनुसार, गोगाजी भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी करते हैं और विशेष रूप से सर्पदंश से रक्षा के लिए पूजित होते हैं। इनके साहस और करुणा से जुड़ी कई कहानियाँ, भजन और लोकगीत आज भी ग्रामीण संस्कृति में जीवंत हैं।

पूजा की परंपरा

गुग्गा नवमी से जुड़ी पूजा-विधि सावन पूर्णिमा से ही आरंभ हो जाती है और यह क्रम पूरे 9 दिनों तक चलता है। अंतिम दिन, यानी नवमी तिथि को, गोगाजी की विशेष पूजा की जाती है।

  • सुबह स्नान करके घर की सफाई की जाती है।

  • खीर, चूरमा, गुलगुला जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं।

  • कुम्हारिन द्वारा लाई गई गोगाजी की मूर्ति को रोली, चावल से तिलक किया जाता है और भोजन का भोग लगाया जाता है।

  • घोड़े के आगे दाल रखी जाती है और रक्षा-बंधन की राखियाँ उतारकर गोगाजी को अर्पित की जाती हैं।

कुछ स्थानों पर लकड़ी के घोड़े पर सवार गोगाजी की प्रतिमा होती है, तो कहीं मिट्टी से बनी मूर्ति की स्थापना की जाती है।

सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू

गोगाजी की पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकजीवन का अहम हिस्सा है। गाँवों में घर-घर पूजा कराने का कार्य कुम्हार समुदाय करता है, जबकि गाँव के मुख्य मंदिर का चढ़ावा प्रायः चमार जाति के लोग ग्रहण करते हैं। पूजा-पद्धति में क्षेत्र के अनुसार कुछ भिन्नताएँ अवश्य हैं, परंतु जहाँ भी राजस्थानी समाज बसा है, वहाँ यह परंपरा निभाई जाती है।

मेले और प्रमुख स्थल

राजस्थान के कई शहरों में गुग्गा नवमी के अवसर पर मेलों का आयोजन किया जाता है। इनमें सबसे प्रसिद्ध बीकानेर वाटी क्षेत्र का ‘मैडी’ स्थल है, जिसे गोगाजी का प्रमुख तीर्थ माना जाता है। यहाँ दूर-दूर से भक्त आकर दर्शन करते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

निष्कर्ष

गुग्गा नवमी केवल एक धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि राजस्थान की वीरता, लोकविश्वास और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यह दिन हमें गोगाजी की अदम्य वीरता, सर्पों से रक्षा करने की शक्ति और जनकल्याण के भाव की याद दिलाता है। 17 अगस्त 2025 को, जब यह पर्व मनाया जाएगा, तब एक बार फिर लोकगीतों, भजनों और श्रद्धा की गूंज हर ओर सुनाई देगी।

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चंदन षष्ठी व्रत 2025 – तिथि, महत्व, विधि और कथा

 चंदन षष्ठी व्रत 2025 की तिथि

चंदन षष्ठी व्रत 2025 में 14 अगस्त को मनाया जाएगा। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है।



चंदन षष्ठी / हल षष्ठी / ललही छठ – परिचय

चंदन षष्ठी, जिसे हल षष्ठी या ललही छठ भी कहते हैं, भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई श्री बलराम जी के जन्म दिवस के रूप में मनाई जाती है। बलराम जी का प्रमुख अस्त्र हल और मूसल था, इसी कारण उनका एक नाम हलधर भी पड़ा और इस व्रत का नाम भी हल षष्ठी हो गया।
कई स्थानों पर यह तिथि जनकनंदिनी माता सीता के जन्म दिवस के रूप में भी मानी जाती है।

व्रत का महत्व

यह व्रत मुख्य रूप से पुत्रवती स्त्रियां करती हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है। साथ ही स्त्री का सौभाग्य अटल रहता है और मृत्यु के बाद शिवधाम की प्राप्ति होती है।

व्रत के नियम और विशेषताएं

  • व्रत के दिन महुए की दातून करने का विधान है।

  • हल से जोती-बोई गई फसल का अन्न पारण में नहीं खाया जाता।

  • इस दिन नीवार (फसही) का चावल और भैंस का दूध भी वर्जित है।

  • सुबह स्नान के बाद महिलाएं आंगन को गोबर और मिट्टी से लीपकर एक जलकुंड बनाती हैं।

  • जलकुंड में बेर, पलाश, गूलर, कुश आदि की टहनियां गाड़कर ललही देवी की पूजा की जाती है।

  • सतनाजा (गेहूं, चना, धान, मक्का, अरहर, ज्वार, बाजरा) का भुना हुआ लावा, हल्दी से रंगा कपड़ा और सुहाग सामग्री अर्पित की जाती है।

पूजन मंत्र

पूजन के अंत में यह मंत्र बोला जाता है –

गंगाद्वारे पर कुशावर्ते विल्वके नील पर्वते।
स्नात्या कनखले देवि हर लब्धवती पतिम्॥
ललिते सुभगे देवि सुख सौभाग्य दायिनि।
अनन्त देहि सौभाग्य मह्यं तुभ्यं नमो नमः॥

अर्थ — हे देवी! आपने गंगाद्वार, कुशावर्त, विल्वक, नील पर्वत और कनखल तीर्थ में स्नान कर भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त किया। हे ललिता देवी! आप सुख और सौभाग्य देने वाली हैं, आपको बार-बार प्रणाम है, मुझे अचल सौभाग्य प्रदान करें।

 व्रत कथा

बहुत समय पहले एक ग्वालिन का प्रसव समय नजदीक था। प्रसव पीड़ा होने के बावजूद उसका ध्यान दूध-दही बेचने में लगा था। उसने सोचा कि अगर बच्चा पैदा हो गया तो गोरस खराब हो जाएगा। इसलिए उसने नवजात के जन्म से पहले ही दूध-दही की मटकियां सिर पर रखीं और बेचने निकल गई।

रास्ते में दर्द बढ़ने पर वह एक बनबेरी के पीछे बैठ गई और वहीं एक बालक को जन्म दिया। उसने बच्चे को वहीं छोड़ दिया और गांव में दूध-दही बेचने चली गई। संयोग से उस दिन हल षष्ठी भी थी।

उसके पास गाय और भैंस का मिश्रित दूध था, लेकिन उसने केवल भैंस का दूध बताकर गांव की महिलाओं को धोखा दिया। उसी समय पास के खेत में एक किसान हल चला रहा था। अचानक बैल उग्र हो गए और हल का फलक बच्चे के पेट में लग गया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।

किसान ने दुखी मन से कांटों से बच्चे का पेट सीकर वहीं छोड़ दिया। जब ग्वालिन लौटी और अपने मृत बच्चे को देखा, तो उसे अपने झूठ का पाप समझ आया। उसने उसी गांव जाकर सच बताया कि दूध गाय और भैंस का मिश्रण था। महिलाओं ने उसकी सच्चाई पर उसे आशीर्वाद दिया।

जब वह वापस लौटी, तो देखा कि उसका बच्चा जीवित हो चुका है। उस दिन से उसने स्वार्थ के लिए झूठ बोलना छोड़ दिया।

निष्कर्ष

चंदन षष्ठी व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह सत्य, नैतिकता और संतान के कल्याण का प्रतीक भी है। 14 अगस्त 2025 को जब यह व्रत आएगा, तो श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका पालन करने से जीवन में सुख, समृद्धि और सौभाग्य बना रहता है।

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Monday, August 04, 2025

रक्षाबंधन 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त और शास्त्रों में वर्णित महत्त्व

 रक्षाबंधन भाई-बहन के अटूट प्रेम और रक्षा-संवेदन को समर्पित एक अत्यंत पावन पर्व है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए रक्षा सूत्र बांधती हैं और भाई उनका जीवनभर साथ निभाने का वचन देते हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पर्व की जड़ें सिर्फ भावना में नहीं, बल्कि गहरे शास्त्रीय नियमों और पुराणों में भी छिपी हैं?

इस लेख में हम आपको रक्षाबंधन 2025 की तिथि, शुभ मुहूर्त, और इसके पीछे की धार्मिक परंपराएं और कथा के बारे में विस्तार से बताएंगे।

रक्षाबंधन 2025 की तारीख और शुभ मुहूर्त

🗓️ रक्षाबंधन कब है?

हिंदू पंचांग के अनुसार, श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि 8 अगस्त 2025 को दोपहर 2:12 बजे से शुरू हो रही है और 9 अगस्त को दोपहर 1:24 बजे समाप्त होगी।
उदया तिथि यानी सूर्योदय के समय जो तिथि होती है, वही पर्व मनाने के लिए मान्य होती है। इस आधार पर, रक्षाबंधन का पर्व 9 अगस्त 2025, शनिवार को मनाया जाएगा।

⏰ राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

इस वर्ष बहनों को राखी बांधने के लिए अच्छा खासा समय मिलेगा।
9 अगस्त को सुबह 5:35 बजे से लेकर दोपहर 1:24 बजे तक रक्षासूत्र बांधने का श्रेष्ठ मुहूर्त है। यानी पूरे 8 घंटे से अधिक समय तक बिना किसी बाधा के राखी बांधी जा सकती है।

 रक्षाबंधन का शास्त्रीय पक्ष और धार्मिक विधि

📖 शास्त्रों में रक्षाबंधन की तिथि कैसे तय होती है?

रक्षाबंधन श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इसमें पराह्नव्यापिनी तिथि ली जाती है — यानी वह पूर्णिमा तिथि जो दोपहर में रहती है।
अगर पूर्णिमा दो दिन आती है, या किसी दिन पराह्न में पूर्णिमा नहीं रहती, तो पहले दिन को प्राथमिकता दी जाती है।

भद्राकाल (भद्रा) में राखी बांधना वर्जित माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि भद्रा में श्रावणी और फाल्गुनी पर्वों का आयोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे राजा या प्रजा दोनों को हानि हो सकती है।

रक्षाबंधन की पूजन-विधि (व्रती क्या करें?)

इस दिन प्रातःकाल स्नान करके व्रती को वेदविहित विधि से:

  • रक्षाबंधन (रक्षासूत्र बांधना)

  • पितरों का तर्पण

  • ऋषियों का पूजन

करना चाहिए। 

🧵 रक्षासूत्र कैसे बनाएं?

रक्षा के लिए किसी सुंदर वस्त्र, रेशमी धागे या रंगीन सूत का उपयोग करें। इसमें ये चीजें डालनी चाहिए:

  • सरसों के दाने

  • केसर

  • चंदन

  • अक्षत (चावल)

  • दूर्वा घास

  • अगर संभव हो तो थोड़ा सुवर्ण (सोना) भी

इन सामग्रियों को मिलाकर रक्षा बनाई जाती है और फिर घर के पवित्र स्थान में कलश स्थापित कर उसका पूजन किया जाता है।

फिर रक्षा को किसी योग्य व्यक्ति — जैसे राजा, मंत्री, ब्राह्मण, वैश्य या शिष्य — के दाहिने हाथ पर नीचे दिए गए मंत्र से बांधा जाता है:

"येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥"

ऐसा करने से कहा गया है कि वह व्यक्ति वर्षभर तक अपने परिवार सहित सुरक्षित और सुखी रहता है।

पौराणिक कथा: इन्द्राणी ने इन्द्र की रक्षा की थी

एक समय की बात है — देवताओं और असुरों के बीच 12 वर्षों तक भीषण युद्ध चला। देवता लगातार हार रहे थे। तब देवगुरु बृहस्पति ने सलाह दी कि युद्ध को कुछ समय के लिए स्थगित कर देना चाहिए।

यह बात इन्द्राणी (देवराज इन्द्र की पत्नी) ने सुनी। उन्होंने संकल्प लिया कि श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन वे इन्द्र को रक्षा बांधेंगी, जिससे वे विजयी होंगे।

अगले दिन, इन्द्राणी ने वेदविधि से रक्षा तैयार कर इन्द्र के दाहिने हाथ पर बाँधी। रक्षासूत्र के प्रभाव से इन्द्र और अन्य देवता युद्ध में विजयी हुए।

रक्षाबंधन: केवल एक त्योहार नहीं, एक सांस्कृतिक परंपरा

रक्षाबंधन केवल भाई-बहन का त्योहार नहीं है, यह एक संस्कृति का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि रक्षा केवल राखी तक सीमित नहीं है — यह एक आध्यात्मिक सुरक्षा कवच है, जो शुभ संकल्प, आस्था और परंपरा के धागों से बुना गया है।

 निष्कर्ष

रक्षाबंधन 2025 में जहां आधुनिक कैलेंडर हमें शुभ मुहूर्त और तारीख की जानकारी देता है, वहीं शास्त्र हमें इसकी गहराई और विधि सिखाते हैं। इस बार जब आप राखी बांधें, तो केवल एक रिवाज़ न मानें — उसे श्रद्धा और वेदविहित भावना से निभाएं। तभी यह पर्व अपने वास्तविक रूप में फलीभूत होगा। #HappyRakshaBandhan #RakshaBandhan2025 #BrotherSisterLove #BondOfLove #SiblingGoals #MyBrotherMyProtector #MySisterMyStrength #FestivalOfLove #UnbreakableBond #RakshaBandhanVibes #IndianFestivals #TraditionalCelebration #ForeverSiblings #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami For more information: www.benimadhavgoswami.com Website: www.himachalpublications.com WhatsApp 9540166678 Phone no. 9312832612 Facebook: Ribhukant Goswami Instagram: Ribhukant Goswami Twitter: Ribhukant Goswami Linkedin: Ribhukant Goswami Youtube: AstroGurukulam

नौतपा 2026: आखिर क्यों माने जाते हैं साल के सबसे गर्म 9 दिन?

  गर्मी का मौसम आते ही लोग एक शब्द बार-बार सुनने लगते हैं — नौतपा । गांव हो या शहर, बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं, “अभी तो नौतपा बाकी है, असली...