Saturday, May 10, 2025

श्रीकूर्म जयंती 2025: 12 मई को मनाएं भगवान विष्णु के कूर्म अवतार का पर्व

 हर साल वैशाख महीने की पूर्णिमा को एक विशेष पर्व मनाया जाता है — श्रीकूर्म जयंती, जो भगवान विष्णु के कछुए अवतार को समर्पित होती है। इस दिन को लेकर भक्तों के बीच गहरी श्रद्धा और विश्वास होता है, क्योंकि यह वही रूप है जिसमें भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा की थी।




कूर्म अवतार: सृष्टि की रक्षा का प्रतीक

पुराणों के अनुसार, जब समुद्र मंथन का समय आया, तो पर्वत 'मंदराचल' को मथनी के रूप में प्रयोग किया गया। लेकिन जब वह डगमगाने लगा, तब भगवान विष्णु ने कछुए का रूप धारण कर उसे अपनी पीठ पर स्थिर किया। इस रूप को ही कूर्म अवतार कहा जाता है। यह अवतार केवल शक्ति का नहीं, बल्कि त्याग और संरक्षण का प्रतीक भी है।

कब मनाई जाती है कूर्म जयंती?

वैशाख महीने की पूर्णिमा को यह जयंती मनाई जाती है। इस साल, 2025 में यह पर्व 12 मई को मनाया जाएगा इस दिन देशभर में भक्त व्रत रखते हैं और विशेष पूजा अर्चना करते हैं।

श्रीकूर्म स्तोत्र और पूजा विधि

कूर्म जयंती के दिन श्रीकूर्म स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से किया जाता है। इस स्तोत्र में भगवान विष्णु के कूर्म रूप की महिमा का वर्णन मिलता है। घरों और मंदिरों में भगवान के इस रूप की प्रतिमा को स्नान कराकर, वस्त्र पहनाकर, पुष्प और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। कई स्थानों पर रात्रि जागरण और भजन-कीर्तन का आयोजन भी होता है।

क्यों है ये दिन इतना खास?

इस दिन को केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह हमें यह याद दिलाता है कि जब भी संसार पर संकट आता है, भगवान किसी ना किसी रूप में हमारी रक्षा के लिए अवश्य आते हैं। कूर्म अवतार हमें धैर्य और सहनशीलता का भी पाठ सिखाता है।

निष्कर्ष

श्रीकूर्म जयंती सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास का प्रतीक है। यह दिन हमें जीवन में धैर्य, त्याग और कर्तव्य के महत्व का बोध कराता है। अगर आपने इस साल यह पर्व मनाया, तो आप भाग्यशाली हैं कि आपने भगवान विष्णु के इस अद्भुत रूप की पूजा करने का सौभाग्य पाया। #श्रीकूर्मजयंती #कूर्मअवतार #भगवानविष्णु #जयश्रीकूर्म #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami For more information: www.benimadhavgoswami.com WhatsApp 9540166678 Phone no. 9312832612


12 मई: वैशाख स्नान का अंतिम और सर्वोच्च पुण्यकारी दिन

 वैशाख माह, जो आमतौर पर अप्रैल और मई के बीच आता है, हिंदू कैलेंडर में एक विशेष महत्व रखता है। इस महीने का आखिरी भाग, विशेष रूप से 12 मई, पुण्यलाभ के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान किए जाने वाले वैशाख स्नान को धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण माना गया है। यह स्नान न केवल पुण्य की प्राप्ति करता है, बल्कि जीवन में समृद्धि और शांति लाने का भी कार्य करता है।




वैशाख स्नान का महत्व

वैशाख माह में स्नान करने के कई लाभ हैं, जिन्हें पौराणिक ग्रंथों में विस्तार से बताया गया है। इसके कुछ प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:

1. पुण्य की प्राप्ति

वैशाख स्नान करने से मनुष्य को पुण्य की प्राप्ति होती है। यह स्नान भक्तों को भगवान विष्णु के साथ-साथ उनके दिव्य लोक की भी कृपा प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है।

2. पापों से मुक्ति

वैशाख माह में किया गया यह स्नान पापों से मुक्ति का एक साधन माना जाता है। साथ ही, यह 10 हजार अश्वमेध यज्ञ के फल के समान पुण्य देता है।

3. मोक्ष की प्राप्ति

वैशाख स्नान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसका नियमित रूप से पालन करने से भक्त भगवान विष्णु के प्रिय बन जाते हैं और उनका जीवन परिपूर्ण हो जाता है।

4. सुख और समृद्धि

वैशाख स्नान न केवल आध्यात्मिक लाभ देता है, बल्कि इससे जीवन में सुख, समृद्धि और शांति भी आती है। यह व्यक्ति को मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन प्रदान करता है।

वैशाख स्नान की विधि

वैशाख स्नान की विधि सरल और प्रभावशाली है। इसे निम्नलिखित चरणों में किया जा सकता है:

सूर्योदय से पहले स्नान

वैशाख स्नान सूर्योदय से पहले ही करना चाहिए। इस समय के दौरान स्नान करने से अधिक पुण्य मिलता है और दिन की शुरुआत सकारात्मक ऊर्जा से होती है।

पवित्र जल में स्नान

वैशाख स्नान के लिए पवित्र नदियों, सरोवरों या कुओं का जल सर्वोत्तम माना जाता है। अगर ये उपलब्ध न हो तो घर में गंगाजल डालकर भी स्नान किया जा सकता है। इससे पुण्य और आशीर्वाद मिलता है।

भगवान विष्णु का स्मरण

स्नान के दौरान भगवान विष्णु और श्री कृष्ण का ध्यान करना चाहिए। उनका स्मरण करने से मन में सकारात्मकता आती है और पुण्य का संचय होता है।

विष्णुसहस्रनाम का पाठ

स्नान के बाद विष्णुसहस्रनाम का पाठ करना अत्यधिक लाभकारी होता है। यह ना केवल भक्तों को मानसिक शांति देता है, बल्कि यह उनकी आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक होता है।

तुलसी पूजा और एक समय भोजन

वैशाख माह में तुलसी की पूजा विशेष रूप से की जाती है। साथ ही, पूरे महीने में एक समय ही भोजन करना चाहिए, जो शरीर और आत्मा की शुद्धि के लिए आवश्यक माना जाता है।

वैशाख माह में दान का महत्व

वैशाख माह में दान करना भी अत्यधिक पुण्यकारी माना गया है। इसे एक प्रकार से अपने अच्छे कर्मों का प्रतिफल माना जाता है।

जल दान

वैशाख माह में जल दान का विशेष महत्व है। गर्मी के इस मौसम में जल का दान न केवल प्यासे प्राणियों के लिए, बल्कि पुण्य अर्जन के लिए भी लाभकारी होता है।

अन्य दान

इसके अतिरिक्त, कंद, मूल, फल, शाक, नमक, गुड़, बेर, पत्र, जल और तक्र आदि का दान भी किया जा सकता है। इससे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

वैशाख माह में पितरों की पूजा

वैशाख माह में पितरों की पूजा का भी महत्व है। इस समय में अपने पूर्वजों की श्रद्धांजलि अर्पित करने से उनका आशीर्वाद मिलता है और जीवन में सुख और समृद्धि आती है। इसे पितर दोष निवारण के रूप में भी देखा जाता है।


निष्कर्ष

वैशाख स्नान केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक साधना है जो पुण्य, शांति और समृद्धि की प्राप्ति का मार्ग खोलती है। इस महीने के दौरान किए गए दान और अनुष्ठान जीवन को सकारात्मक दिशा में मोड़ने का कार्य करते हैं। इसलिए, इस वैशाख माह में इन महत्वपूर्ण कार्यों को अपनाकर आप न केवल अपने जीवन को संवार सकते हैं, बल्कि अपने आत्मिक और भौतिक जीवन में भी संतुलन ला सकते हैं।

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12 मई को मनाई जाएगी बुद्ध पूर्णिमा: जानें इसका धार्मिक महत्व

 बुद्ध पूर्णिमा, जिसे वैशाख पूर्णिमा भी कहा जाता है, बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए एक खास धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व है। यह दिन भगवान बुद्ध से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाओं की याद में मनाया जाता है। वैशाख माह की पूर्णिमा तिथि को यह पर्व हर साल मनाया जाता है। यह दिन भगवान बुद्ध के जन्म, उनके ज्ञान की प्राप्ति और महापरिनिर्वाण का प्रतीक है।




बुद्ध पूर्णिमा की तिथि और समय

2025 में, बुद्ध पूर्णिमा 12 मई को मनाई जाएगी। लेकिन यह पर्व 11 मई को शाम 8:01 बजे से शुरू होगा, जैसा कि कुछ धार्मिक सूत्रों ने बताया है। इस समय से लेकर अगले दिन तक, बौद्ध धर्म के अनुयायी भगवान बुद्ध के योगदानों का जश्न मनाते हैं।

बुद्ध पूर्णिमा का महत्व

बुद्ध पूर्णिमा का महत्व अत्यधिक गहरा है। इस दिन के साथ भगवान बुद्ध से जुड़ी तीन प्रमुख घटनाएं जुड़ी हुई हैं:

भगवान बुद्ध का जन्म

बुद्ध पूर्णिमा का पहला महत्वपूर्ण पहलू भगवान बुद्ध का जन्म है। माना जाता है कि भगवान बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी क्षेत्र में हुआ था। उनकी शिक्षा और जीवन दर्शन ने न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित किया।

ज्ञान की प्राप्ति

दूसरा पहलू है भगवान बुद्ध की बोधगया में ज्ञान की प्राप्ति। बोधि वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान बुद्ध ने संसार के दुखों को समझा और आत्मज्ञान प्राप्त किया। यह घटना न केवल बौद्ध धर्म के लिए, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है।

महापरिनिर्वाण

तीसरी घटना है भगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण। कुशीनगर में भगवान बुद्ध का निधन हुआ, लेकिन उनका उपदेश और उनके जीवन दर्शन आज भी जीवित हैं। इस दिन, बौद्ध धर्म के अनुयायी भगवान के चरणों में श्रद्धा अर्पित करते हैं।

कैसे मनाते हैं बुद्ध पूर्णिमा?

बुद्ध पूर्णिमा के दिन विशेष रूप से प्रार्थना, ध्यान और उपदेशों का आयोजन किया जाता है। लोग इस दिन बुद्ध की उपदेशों को याद करते हैं, उनके मार्गदर्शन का पालन करने का संकल्प लेते हैं, और उनके योगदानों का सम्मान करते हैं।

प्रार्थना और ध्यान

कई लोग मंदिरों में जाकर भगवान बुद्ध की पूजा करते हैं, ध्यान करते हैं और शांति की कामना करते हैं। यह दिन आत्मा की शांति और संतुलन की प्राप्ति के लिए उपयुक्त माना जाता है।

दान और सहयोग

इस दिन का एक अन्य पहलू दान और सहयोग है। बहुत से लोग जरूरतमंदों को दान देते हैं और समाज में एकता और प्रेम का संदेश फैलाने की कोशिश करते हैं। बौद्ध धर्म में दान का महत्व बहुत अधिक है, और यह समाज के कल्याण के लिए किया जाता है।

बुद्ध पूर्णिमा का सांस्कृतिक पहलू

बुद्ध पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए एक सांस्कृतिक पर्व भी है। यह दिन न केवल भारत में, बल्कि नेपाल, श्रीलंका, थाईलैंड, और अन्य देशों में भी मनाया जाता है। यह पर्व विश्वभर में शांति, अहिंसा और तात्त्विक ज्ञान की महिमा को उजागर करता है।

निष्कर्ष

बुद्ध पूर्णिमा बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए एक अवसर है, जब वे भगवान बुद्ध के योगदानों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं। यह दिन सिर्फ धर्मिक नहीं, बल्कि समाज के लिए भी शांति और सहयोग का प्रतीक है।

इस दिन हमें अपने जीवन में बुद्ध के उपदेशों को अपनाने और दूसरों के प्रति दया, प्यार और सहानुभूति का भाव रखने का प्रेरणा मिलती है। इस शुभ अवसर पर हम सभी को भगवान बुद्ध के दिखाए गए रास्ते पर चलने का संकल्प लेना चाहिए, ताकि समाज में शांति और सौहार्द बना रहे।

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Thursday, May 08, 2025

नृसिंह जयंती 2025: भगवान विष्णु के अवतार की पूजा का पर्व

हर साल जब वैशाख का महीना आता है, तो हिंदू धर्म के अनुयायी एक विशेष दिन का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं – नृसिंह  जयंती। यह दिन भगवान विष्णु के चौथे अवतार, नृसिंह  भगवान को समर्पित होता है। इस वर्ष नृसिंह  जयंती 11 मई 2025 (रविवार ) को मनाई जाएगी। यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, और इसके पीछे की कथा भी बेहद प्रेरणादायक है।




भगवान नृसिंह : आधा सिंह, आधा मानव

भगवान नृसिंह  का अवतार कुछ अलग ही रूप में हुआ था – आधे मानव और आधे सिंह के स्वरूप में। यह अवतार विशेष रूप से इसलिए लिया गया था ताकि एक अहंकारी राक्षस, हिरण्यकश्यप, का अंत किया जा सके।

वह कोई साधारण राक्षस नहीं था, उसने ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था जिससे उसे न देवता मार सकते थे, न मानव, न ही जानवर या पक्षी। न दिन में मारा जा सकता था और न ही रात में। न धरती पर, न आकाश में। ऐसे में भगवान को एक ऐसा रूप लेना पड़ा जो इन सभी शर्तों से परे हो।

हिरण्यकश्यप की कथा: जब तपस्या ने उसे घमंडी बना दिया

इस कहानी की शुरुआत होती है हिरण्याक्ष से – हिरण्यकश्यप का भाई, जिसे भगवान विष्णु ने वरा‌ह अवतार में मार दिया था। भाई की मौत से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने कठिन तप किया और ब्रह्मा जी से वरदान मांगा। उसने अपने वध को असंभव बनाने के लिए कई शर्तें जोड़ दीं।

लेकिन अहंकार जब सिर चढ़कर बोलने लगे, तो विनाश तय हो जाता है।

हिरण्यकश्यप खुद को अमर समझने लगा और उसने भगवान के प्रति श्रद्धा रखने वालों को सताना शुरू कर दिया – जिनमें उसका अपना पुत्र प्रह्लाद भी शामिल था।

प्रह्लाद की भक्ति और नृसिंह  अवतार की आवश्यकता

प्रह्लाद बचपन से ही विष्णु भक्त था, और उसके इस विश्वास से हिरण्यकश्यप चिढ़ता था। कई बार उसने प्रह्लाद को मारने की कोशिश की, लेकिन हर बार कोई न कोई चमत्कार उसे बचा लेता।

आख़िरकार, जब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से पूछा – "क्या तेरा भगवान इस खंभे में भी है?" – और खंभे को तोड़ा, तब उसमें से भगवान नृसिंह  प्रकट हुए।

वे न दिन में आए, न रात में – संध्याकाल में। न पूरी तरह से इंसान थे, न पशु। न ज़मीन पर बैठे थे, न हवा में – बल्कि हिरण्यकश्यप को अपनी जांघों पर रखकर उसका अंत किया।

कैसे मनाई जाती है नृसिंह जयंती?

इस दिन भक्त उपवास रखते हैं, व्रत की तैयारी करते हैं और भगवान नृसिंह  की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिरों में हवन, कीर्तन, और प्रवचन होते हैं। घरों में भी पूजा-पाठ और व्रत की विधि को पूरी श्रद्धा से निभाया जाता है।

आस्था की सीख

नृसिंह  जयंती केवल एक त्योहार नहीं है, ये हमें याद दिलाती है कि चाहे बुराई कितनी भी ताकतवर क्यों न लगे, सच्ची भक्ति और विश्वास से हर संकट को हराया जा सकता है। भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा के लिए आते हैं – कभी नृसिंह  बनकर, तो कभी राम या कृष्ण बनकर।

अंत में...

इस नृसिंह  जयंती पर आइए, हम सभी भगवान विष्णु के इस अद्भुत रूप का ध्यान करें और प्रह्लाद जैसी श्रद्धा अपने जीवन में अपनाएं। सच्चाई की राह मुश्किल ज़रूर होती है, लेकिन उसका फल हमेशा मीठा होता है।

जय श्री नृसिंह  देव!


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Thursday, January 18, 2024

|| आज का पंचांग।। 19/01/2024

 



|| आज का पंचांग।।
19/01/2024
शुरू कीजिए अपनी दिनचर्या गुरु ऋभुकान्त गोस्वामी जी द्वारा रचित पंचांग के साथ।












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Wednesday, January 17, 2024

।। आज का पंचांग।। 18/01/2024

 | आज का पंचांग।।



18/01/2024
शुरू कीजिए अपनी दिनचर्या गुरु ऋभुकान्त गोस्वामी जी द्वारा रचित पंचांग के साथ।
दिनांक 18 जनवरी 2024
वार: गुरुवार
विक्रम संवत : 2080
शक संवत : 1945
अयन : उत्तरायण
ऋतु : शरद् ऋतु
पक्ष : शुक्ल
मास : पौष
तिथि : अष्टमी 20:45 तक उपरांत नवमी
नक्षत्र : अश्वनी रात्रि 02:58 तक पश्चात भरणी
योग: सिद्ध 14:48 तक तदनंतर साध्य
दिशाशूल : दक्षिण पश्चिम
‌ ‌सूर्य उदय : 07:19
सूर्य अस्त : 17:44
राहु काल : दोपहर 01:30 बजे से अपरान्ह 03:00 बजे तक
व्रत और त्योहार : भद्रा प्रातः 09 बजकर 26 मिनट तक। श्री दुर्गाष्टमी। 
















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Friday, January 05, 2024

सफ़ला एकादशी , Saphala Ekadashi 2024: कब है सफ़ला एकादशी एकादशी? जानें शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और कथा

 सफ़ला एकादशी

Saphala Ekadashi 2024: कब है सफ़ला एकादशी? जानें शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और कथा 



Saphala Ekadashi 2024: 

इस बार सफला एकादशी 7 जनवरी 2024 के दिन मनाई जा रही है. एकादशी का पावन दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है. सनातन धर्म के अनुसार.सफला एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के सभी कार्य सिद्ध और सफल हो जाते हैं. साथ ही इस दिन व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है. 


सफला एकादशी पूजन विधि (Saphala Ekadashi 2024 Pujan Vidhi)  

यह व्रत पौष कृष्ण पक्ष एकादशी को रखा जाता है। इस दिन भगवान अच्युत और भगवान विष्णु  की पूजा का विशेष विधान है।

इस व्रत को धारण करने वाले को चाहिये कि प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु  की आरती करें तथा भोग लगायें।

ब्राह्मणों तथा गरीबों को भोजन अथवा दान देना चाहिए। रात्रि में जागरण करते हुए कीर्तन पाठ करना अत्यन्त फ़लदायी होता है। इस व्रत को करने से समस्त कार्यों में अवश्य ही सफ़लता मिलती है। इसीलिए इसका नाम ‘सफ़ला’ एकादशी है।

सफला एकादशी शुभ मुहूर्त (Saphala Ekadashi 2024 Shubh Muhurat)


सफला एकादशी पौष मास की कृष्ण पक्ष की तिथि को मनाई जाएगी. सनातन पंचांग के अनुसार, सफला एकादशी पौष मास की कृष्ण पक्ष की तिथि को मनाई जाएगी. सनातन पंचांग के अनुसार, सफला एकादशी का प्रारम्भ 7 जनवरी को रात 12 बजकर 41 मिनट पर होगी और समापन 8 जनवरी को रात 12 बजकर 46 मिनट पर होगा. 8 जनवरी को पारण का समय सुबह 7 बजकर 15 मिनट से लेकर 9 बजकर 20 मिनट तक रहेगा.  

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नौतपा 2026: आखिर क्यों माने जाते हैं साल के सबसे गर्म 9 दिन?

  गर्मी का मौसम आते ही लोग एक शब्द बार-बार सुनने लगते हैं — नौतपा । गांव हो या शहर, बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं, “अभी तो नौतपा बाकी है, असली...