Thursday, April 16, 2020

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Thursday, April 09, 2020

लाल किताब के अनुभव सिद्ध टोटके

  1. लाल किताब के टोटके उत्तर भारत में ही नहीं, अब दक्षिण में भी बहुत प्रसिद्ध हैं। इस लाल किताब के लेखक पं. रूपचन्द्र जोशी जी ने इस पुस्तक में ज्योतिष और हस्त रेखा दोनों का फलादेश दिया है और ग्रह के कष्ट निवारण हेतु कुछ नुस्खों-टोटकों (Remedial measure) का वर्णन किया है उनमें से कुछ जो मेरे इस क्षेत्र में कई वर्षो के शोध कार्य से लाभप्रद सिद्ध हुए हैं, याने वास्तविक प्रकरणों में लाभप्रद सिद्ध हुए हैं, उन्हीं Remedial measure का वर्णय इस लेख में करूंगा जिससे जन साधारण उससे लाभान्वित हो सकें।
लाल किताब के लेखक की मान्यता है, कि जन्म कुन्डली देखते समय हमें फलादेश कहने के लिए व्यक्ति की जन्म लग्न कुछ भी हो उसके लग्न में मेष, द्वितीय भाव में वृषभ, तृतीय भाव में मिथुन, चतुर्थ में कर्क, पंचम में सिंह, छठे में कन्या, सातवें में तुला, आठवें में वृश्चिक, नवे में धनुः दसवें में मकर, ग्वारहवें में कुंभ और बारहवें में मीन राशि आदि मानकर फलादेश बताने से सटीक रहेगा। इसी प्रकार लाल किताब के रचयिता ने प्रथम भाव को सूर्य का भाव माना है, द्वितीय भाव को वृहस्पति का, तीसरा भाव मंगल का , चोथा भाव चंद्र का,पंचावा भाव वृहस्पति का,छटा भाव केतु का, सप्तम भाव शुक्र और बुध दोनों का, अष्टम भाव मंगल और शनि दोनों का, नवम पुनः गुरू का, दशम शनि का, एकादश पुनः गुरू का और द्वादश भाव राहु का मानकर फलादेश कहा गया है।
उपरोक्त दोनों मूल सिद्धान्तों को मानकर लाल किताब में फलादेश कहा गया है। उपरोक्त ज्योतिष के सिद्धातों के अलावा हस्त रेखा के सिद्धान्तों का भी पालन किया गया है। उसके अनुसार सभी बारह राशियों और ‘‘नवग्रहों’’ के स्थान हाथ में दर्शाए गए है वह हाथ का चित्र यहां सर्व साधारण की जानकारी के लिए दिया जा रहा है। उनके हस्त रेखा संबंध सिद्धान्तों का विश्लेषण अन्य लेख में करूंगा जिससे यह लेख विषय वस्तु के अनुरूप रहे।
लाल किताब के रचचिता के अनुसार यदि कोई ग्रह जन्म पत्री में पीड़ित हो तो उसके कष्ट निवारण हेतु उपाय इसमें दर्शाए गए है उदाहरण के तौर पर एक प्रसिद्ध कम्प्यूटर इंजीनियर की पत्रिका का परीक्षण करें। उनकी जन्म दिनांक 13 दिसम्बर, 1956 है। उनकी जन्म लग्न सिंह है और राशी मेष है। चतुर्थ स्थान में इनकी जन्म लग्न का स्वामी सूर्य, राहू और शनि द्वारा पीड़ित है। यहीं सूर्य, राशी से पंचम स्थान का स्वामी होकर अष्टम में पीड़ित है। अतः चंद्र के संबंधित वस्तुऐं दान करना उत्तम रहता है और चंद्र के लिए श्री शंकर भगवान की आराधना करना, शिव चालीसा का पाठ करना लाभ दायक रहेगा। इनके लिए सूर्य योग कारक है, अतः उसका पीड़ित रहना ठीक नहीं है। सूर्य का नग माणिक भी इन्हें लाभ देगा। इससे सूर्य बलवान होगा। 

इसी प्रकार एक प्रसिद्ध उद्योगपति जिनकी जन्म तारीख 30 जुलाई, 1965 है और धनु लग्न, सिंह राशी में जन्म हुआ है। इनका योगकारक गुरू पीड़ित है वह राहू के साथ छठे स्थान में हैं। अतः बुध से संबंधित वस्तुओं का दान करने से लाभ होगा। पीपल के वृक्ष को गमले में लगाकर पालना या पीपल को जल चढ़ाने से लाभ होगा। घर के सभी सदस्यों से पैसे इकट्ठें करके मंदिर में दान करने से लाभ होगा। गुरु इनके लिये योगकारक है, अतः पीला पुखराज भी लाभकारी रहेगा।
ग्रह के पीड़ित रहने पर उक्त ग्रह से संबंधित बीमारियां हो सकती हैं। सूर्य पीड़ित होने के समय एक टोटका यह भी है कि वह व्यक्ति मुंह में मीठी वस्तु खाकर ऊपर से पानी पीए। यह टोटका बहुत सरल है और इसके करने से सूर्य को चंद्र एवं मंगल जैसे मित्रों की सहायता से बल मिलेगा और सूर्य जनित कष्ट कम होंगे।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि उपरोक्त महानुभाव को बुध संबंधित वस्तुओं का दान करना या उन्हें पानी में बहा देने से लाभ होगा।
उपरोक्त महाशय के लिए लाल किताब के अनुसार मंगल बहुत योगकारी बन गया है। अतः मंगल की दशा-अंतर दशा बहुत उत्तम फल देगी। लाल किताब की थ्योरी के अनुसार इनका केतु मोक्ष कारक सिद्ध होगा वह धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति है। इनका चंद्र भी बुध के साथ प्रसन्न नहीं है। अतः शिव की आराधना लाभकारी रहेगा। इनकी मूल पत्रिका में शनि ने ‘‘शश’’ नामक ‘‘पंचमहापुरुष राजयोग’’ बनाया है और मंगल ने कुलदीपक योग बनाया है, परंतु लाल किताब के अनुसार इनका मंगल अधिक बलशाली साबित हुआ है। अतः यह यदि लाल मूंगे की अंगूठी धारण करें तो बहुत उन्नति कारक सिद्ध होगी।
अब मैं एक भाग्यशाली विद्वान महिला की पत्रिका का विशलेषण लाल किताब के अनुसार करूंगा। उनकी जन्म तारीक्ष 5 मई, 1958 है तथा मेष लग्न, वृश्चिक राशि है। यह उनकी आश्चर्यजनक पत्रिका है क्योंकि इस पत्रिका का फलादेश बताने में हमें, लाल किताब के अनुसार भी यह पत्रिका ऐसी ही रहेगी। इनका योग कारक गुरु सप्तम में पीड़ित है। अतः इन्हें शुक्र से संबंधित दान करना चाहिए- शुक्र का मंत्रजाप करना चाहिए। इससे जीवन में उत्तम फल मिलेगा। श्री महालक्ष्मी जी की पूजा अर्चना बहुत लाभकारी रहेगी।
किसी को सूर्य पीड़ित होने पर हृदय रोग हो सकता है, गवन्र्मेन्ट से हानि, आॅखों में कष्ट, पेट की बीमारियां, हड्डी की प्राबलम हो सकती है। ऐसे प्रकरण में गुड़, गेहूं, ताॅबा, लाल वस्त्र, लाल फूल दान करने से लाभ होता है। सूर्य को श्री विष्णु भगवान का स्वरूप माना है। अतः श्री विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ करने से लाभ होगा।
यदि किसी का सूर्य कर्म स्थान (दशम) में पीड़ित हो तो यह टोटका है कि बहते पानी में तांबे का सिक्का बहा देना लाभकारी रहेगा। प्रत्येक भाव में सूर्य अनिष्टकारी होने पर भिन्न-भिन्न टोटके दिए गए है। सभी का वर्णन करना संभव नहीं है। यही सिद्धान्त सभी ग्रहों के लिए है।
इसी प्रकार यदि चंद्र पीड़ित हो तो मां का बीमार रहना, मानसिक चिन्ता रहना, अस्थमा रोग आदि कष्ट हो सकते हैं। उसके लिए चांदी को को बहते पानी में बहा देना। दूसरा टोटका यह भी है कि रात को दूध या पानी का एक बर्तन सिरहाने रखकर सो जावें और अगले सवेरे वह कीकर के वृक्ष पर डाल दें। चंद्रमा के कष्ट को दूर करने के लिए श्री शिव आराधना लाभकारी रहेगा। प्रत्येक भाव में पीड़ित चंद्र के लिए भिन्न-भिन्न टोटके है- जैसे, चंद्र तृतीय भाव में पीड़ित हो तो हरे रंग का कपड़ा कन्याओं को दान में देना आदि और चतुर्थ में चंद्र पीड़ित हो तो रात्रि को दूध नहीं पियें और हो सके तो सोमवार को पंडितो को दूध पिलावें।
यदि मंगल अनिष्टकारी हो तो मीठी रोटी तंदूर की दान करें या रेवड़िया पानी में बहा दें, या मीठा भोजन दान करें। मंगल के लिए श्री बजरंगबली जी की आराधना करें और प्रसाद चढ़ाकर ग्रहण करें आदि।
बुध अनिष्टकारी रहने पर कौड़ियों को जलाकर उनकी राख नदी में उसी दिन बहा दें और तांबे के पैसे में छेद करके पानी में बहा दें या बुध से संबंधित वस्तुएं दान करें। जैसे हरे मूंग, हरा कपड़ा, चांदी। बुध के कष्ट दूर करने के लिए श्री दुर्गा जी की आराधना ‘‘श्री दुर्गा सप्तशती’’ का पाठ करना बहुत लाभप्रद रहेगा। यदि हो सके तो नाक छिदवावें। महिलाएं यह काम सरलता से कर सकती है। यदि बुध के कारण कोई रोग हो तो सीता-फल किसी देवी के मंदिर में दान करें।
गुरु के अनिष्टकारी रहने पर परिवार के सभी सदस्यों से पैसा जमा करके मंदिर में दान करें। पीपल का वृक्ष गमले में लगाकर परिक्रमा करें। गुरु की वस्तुएं जैसे चनादाल, हल्दी साबित, केसर, तांबा (सोने की जगह) पीले फूल, केशरिया कपड़ा गुरुवार के दिन दान करें आदि।
शुक्र के अनिष्टकारी होने पर अपने भोजन में से कुछ भोजन निकाल कर गायों को खिलावें। गौंवों को घास (चरी) खिलावें। शुक्र से संबंधित वस्तुएं दान करें और श्री महालक्ष्मी जी पूजा आराधना करें।
शनि कष्टकारी होने पर मछलियों को आटा खिलाना, कौवों को अपने खाने में से कुछ खिलाना लाभ प्रद रहता है। शनि से संबंधित वस्तुएं दान करें और श्री शिवजी की पूजा आराधना करें।
केतु के अनिष्टकारी रहने पर काले कुत्ते को खाना खिलाना श्री गणेश जी की पूजा आराधना करना लाभप्रद रहता है। यदि आपके लड़के का व्यवहार आपके साथ ठीक नहीं है तो, उपरोक्त विधि से कुत्ते को रोटी खिलाना और मंदिर में कंबल दान करें।
राहू यदि किसी जन्म पत्रिका में अनिष्टकारी हो तो नारियल पानी में बहा दें और जौ को दूध में धोकर पानी में बहाने से, कोयले को पानी में बहाने से लाभ होगा। राहू की वस्तुएं ‘‘स्वीपर’’ को दान में देने से भी लाभ होगा। यदि किसी पर क्रीमिनल प्रकरण चल रहा हो तो वह भी उपरोक्त विधि करें प्रकरण में लाभ होगा।
उपरोक्त उपाय विधि दिन में ही करें रात में नहीं करें।
उपरोक्त लेखक की मान्यता यह भी है कि यदि किसी को शनि पंचम स्थान में हो तो मकान बनाते समय उसके पुत्र को कष्ट होगा। यह सिद्धान्त उसके अपने मकान पर लागू होगा, उसके पुत्र द्वारा बनाए मकान पर लागू नहीं होगा।
यदि किसी पत्रिका में सूर्य-शनि साथ हों और पत्नी का स्वभाव ठीक नहीं हो तो पत्नी के वजन के बराबर ज्वार दान करें इससे लाभ होगा।
लेखक के सिद्धान्त बहुत अच्छे है और उनके द्वारा बताए गए उपाय (टोटके) रेमेडियल मेजर अधिकतर प्रकरणों में बहुत लाभकारी सिद्ध हुए है। यह मैंने अपने कई वर्षो के शोध कार्य से वास्तविक प्रकरणों में अजमा कर देखें है और लाभप्रद सिद्ध हुए है।

Wednesday, December 31, 2014

पुत्रदा एकादशी 01-01-2015

                                                                     पुत्रदा एकादशी
यह व्रत पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के पूजा का विधान है। इस व्रत के करने से सन्तान की प्राप्ति होती है।
कथा - किसी समय भद्रावती नगरों में सुकेतुनाम राजा राज्य करते थे। राजा तथा उनकी स्त्री शैया दानशील तथा धर्मात्मा थे। सम्पूर्ण राज्य, खजाना धन-धान्य से पूर्णहोने के बावजूद भी राजा-राजय संतानहीन होने के कारण अत्यंत दुखी थे। एक बार वे दोनों राज्य भार-मंत्रियों के ऊपर छोड़कर बनवासी हो गये तथा आत्म हत्या करने की ठान ली। लेकिन उन्हें सहसा याद आया कि आत्म हत्या के समान कोई दूसरा पाप नहीं! इसी उधेड़बुन में वे दोनों वहां आये, जहां मुनियों का आश्रम व जलाशय था। राजा-रानी मुनियों को प्रणाम कर बैठ गये। मुनियों ने योग-बल से राजा के दुःख का कारण जान लिया और आगे ऋषियों ने आशीर्वाद देते हुए ‘पुत्रदा एकादशी’ व्रत रहने को बताया।
राजा-रानी ने एकादशी व्रत रहकर विष्णु भगवान की पूजा की और पुत्र-रत्न प्राप्त किया।

Monday, April 21, 2014

भगवान परशुराम जयन्ती


मान्यवर
आप  सादर  आमंत्रित है  भगवान  परशुराम  जयन्ती  पर  जो   मई  २०१४  को बजे से बजे तक  आयोजित किया  जा रहा है  स्थानकाॅस्टीट्यूशन  क्लबविट्ठल  भाई  पटेल  हाऊसरफी मार्गनई दिल्ली११०००१   समय: दोपहर .०० बजे से रात्रि .०० बजे तक
आप से विनम्र प्रार्थना करता हूं कि आपकी उपस्थिति हमारे लिए गौरवपूर्ण एवं गरिमामय रहेगी।
आपका शुभेक्षु
दैवज्ञ पं. वेणीमाधव गोस्वामी  
(अध्यक्ष्)
09312832612

Sunday, April 06, 2014

कालरात्रि

 कालरात्रि
मां दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि नाम से जानी जाती है। इनके शरीर का रंग घने अन्धकार की तरह एकदम काला है। सिरके बाल बिखरे हुए हैं। गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं। ये तीनों नेत्र ब्रह्माण्ड के सदृश गोल हैं। इनसे विद्युत के समान चमकीली किरणें निःसृत होती रहती हैं। इनकी नासिका के श्वास प्रश्वास से अग्नि की भयंकर ज्वालाएं निकलती रहती हैं। इनका वाहन गर्दभरा-गदहा है। ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ की वरमुद्रा से सभी को वर प्रदान करती हैं। दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभय मुद्रा में है। बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में लोहे का कांटा तथा नीचे वाले हाथ में खड्ग (कटार) हैं।
मां कालरात्रि का सवरूप देखने में अत्यन्त भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल ही देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम ‘शुभक्करी’ भी है। अतः इनसे भक्तों को किसी प्रकार भी भयभीत अथवा आताकिंत होने की आवश्यकता नहीं है।
दुर्गा पूजा के सातवें दिन मां कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में स्थित रहता है। उसके लिये ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। इस चक्र में स्थित साधक का मन मन पूर्णतः मां कालरात्रि के स्वरूप में अवस्थित रहता है। उनके साक्षात्कार से मिलने वाले पुण्य का वह भागी हो जाता है। उसके समस्त पापों-विघ्नों का नाश हो जाता है। उसे अक्षय पुण्य-लोकों की प्राप्ति होती है।
मां कालरात्रि दुश्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भूत, प्रेत आदि इनके स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। ये ग्रह-बाधाओं को भी दूर करने वाली हैं। इनके उपासक को अग्नि-भय, जल-भय, जन्तु-भय, शत्रु-भय, रात्रि-भय आदि कभी नहीं होते। इनकी कृपा से वह सर्वथा भय-मुक्त हो जाता है।
मां कालरात्रि के स्वरूप-विग्रह को अपने हृदय में अवस्थित करके मनुष्य को एकनिष्ठ भाव से उनकी उपासना करनी चाहिये। यम, नियम, संयम का उसे पूर्ण पालन करना चाहिए। मन, वचन, काया की पवित्रता रखनी चाहिये। वह शुभक्करी देवी हैं। उनकी उपासना से होने वाले शुभों की गणना नहीं की जा सकती। हमें निरन्तर उनका स्मरण, ध्यान और पूजन करना चाहिए।

Friday, April 04, 2014

स्कन्दमाता

स्कन्दमाता
मां दुर्गा जी के पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। ये भगवान् स्कन्द ‘कुमार कात्तर््िाकेय’ नाम से भी जाने जाते हैं ये प्रसद्धि देवासुर-संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्तिधर कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है। इनका वाहन मयूर है। अतः इन्हें मयूरवाहन के नाम से भी अभिहित किया गया है।
इन्हीं भगवान् स्कन्द की माता होने के कारण मां दुर्गा जी के इस पांचवें स्वरूप को स्कन्दमाता के नाम से जाना जाता है। इनकी उपासना नवारात्रि-पूजा के पांचवें दिन की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘विशुद्ध’ चक्र में अवस्थित होता है। इनके विग्रह में भगवान् स्कदन्जी बालरूप में इनकी गोद में बैठे होते हैं। स्कन्दमाता रूपिणी देवी की चार भुजाएं हैं। ये दाहिनी तरफ की ऊपर वाली भुजा से भगवान् स्कन्द को गोद में पकड़े हुए हैं और दाहिनी तरफ की नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी हुई है उसमें कमल-पुष्प है। बायीं तरफ की ऊपर वाली भुजा वरमुद्रा में तथा नीचे वाली भुजा जो ऊपर की ओर उठी है उसमें भी कमल-पुष्प ली हुई हैं। इनका वर्ण पूर्णतः शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसी कारण से इन्हें पद्मासना देवी भी कहा जाता है। सिंह भी इनका वाहन है।
नवरात्र-पूजन के पांचवें दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्त्व बताया गया है। इस चक्र में अवस्थित मन वाले साधक की समस्त बाह्य क्रियाओं एवं चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है। वह विशुद्ध चैतन्य स्वरूप की ओर अग्रसर हो रहा होता है। उसका मन समस्त लौकिक, सांसारिक, मायिक बन्धनों से विमुक्त होकर पद्मासना मां स्कन्दमाता के स्वरूप में पूर्णतः तल्लीन होता है। इस समय साधक को पूर्ण सावधानी के साथ उपासना की ओर अग्रसर होना चाहिये। उसे अपनी समस्त ध्यान-वृत्तियों को एकाग्र रखते हुए साधना के पथ पर आगे बढ़ना चाहिये।
मां स्कन्दमाता की उपासना से भक्त की समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। इस मृत्युलोक में ही उसे परम शान्ति और सुख का अनुभव होने लगता है। उसके लिये मोक्ष का द्वार स्वयमेव सुलभ हो जाता है। स्कन्दमाता की उपासना से बालरूप स्कन्द भगवान् की उपासना भी स्वयमेव हो जाती है। यह विशेषता केवल इन्हीं को प्राप्त है, अतः साधक को स्कन्दमाता की उपासना की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज एवं कान्ति से सम्पन्न हो जाता है। एक अलौकिक प्रभामण्डल अदृश्यभाव से सदैव उसके चतुर्दिक् परिव्याप्त रहता है। यह प्रभामण्डल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता रहता है।
अतः हमें एकाग्र भाव से मन को पवित्र रखकर मां की शरण में आने का प्रयत्न करना चाहिये। इस घोर भव सागर के दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ बनाने का इससे उत्तम उपाय दूसरा नहीं है।

Tuesday, April 01, 2014

Bharamcharini

 ब्रह्मचारिणी
मां दुर्गा की नौ शक्तियों का दूसरा स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। यहां ‘ब्रह्मा’ शब्द का अर्थ तपस्या है। ब्रह्माचारिणी अर्थात् तप की चारिणी-तप का आचरण करने वाली। कहा भी है- वेदस्तत्त्वं तपो ब्रह्म-वेद, तत्त्व औरा तप ‘ब्रह्म’ शब्द के अर्थ हैं। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यन्त भव्य है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बायें हाथ में कमण्डल रहता है।
अपने पूर्वजन्म में जब ये हिमालय के घर पुत्री-रूप में उत्पन्न हुई थीं तब नारद के उपदेश से इन्होंने भगवान् शंकर जी को पति-रूप में प्राप्त करने के लिये अत्यन्त कठिन तपस्या की थी। इसी दुष्कर तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात् ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष उन्होंने केवल फल-मूल खाकर व्यतीत किये थे। सौ वर्षों तक केवल शाक पर निर्वाह किया था। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखते हुए खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के भयानक कष्ट सहे। इस कठिन तपस्या के पश्चात् तीन हजार वर्षों तक केवल जमीन पर टूटकर गिरे हुए बेलपत्रों को खाकर वह अहर्निश भगवान् शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद उन्होंने सूखे बेलपत्रों को भी खाना छोड़ दिया। कई हजार वर्षों तक वह निर्जल और निराहार तपस्या करती रहीं। पत्तों को भी खाना छोड़ देने के कारण उनका एक नाम ‘अपर्णा’ भी पड़ गया।
कई हजार वर्षों की इस कठिन तपस्या के कारण ब्रह्मचारिणी देवी का वह पूर्वजन्म का शरीर एकदम क्षीण हो उठा। वह अत्यन्त की कृशकाय हो गयी थीं। उनकी यह दशा देखकर उनकी  माता मेना अत्यन्त दुःखित हो उठीं। उन्होंने उन्हें उस कठिन तपस्या से विरत करने के लिये आवाज दी ‘उ मा’, अरे ! नहीं, ओ! नहीं! नहीं! तबसे देवी ब्रह्मचारिणी का पूर्वजन्म का एक नाम ‘उमा’ भी पड़ गया था।
उनकी इस तपस्या से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ब्रह्मचारिणी देवी की इस तपस्या को अभूतपूर्व पुण्यकृत्य बताते हुए उनकी सराहना करने लगे। अन्त में पितामह ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी के द्वारा उन्हें सम्बोधित करते हुए प्रसन्न स्वरों में कहा- ‘हे देवि! आज तक किसी ने ऐसी कठोर तपस्या नहीं की थी। ऐसी तपस्या तुम्हीं से सम्भव थी। तुम्हारे इस अलौकिक कृत्य की चतुर्दिक् सराहना हो रही है। तुम्हारी मनोकामना सर्वतोभावेन परिपूर्ण होगी। भगवान् चन्द्रमौलि शिवजी तुम्हे पतिरूप में प्राप्त होंगे। अब तुम तपस्या से विरत होकर घर लौट जाओ। शीघ्र ही तुम्हारे पिता तुम्हे बुलाने आ रहे हैं।’
मां दुर्गा जी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन
संघर्षों में भी उसका मन कत्र्तव्य-पथ से विचिलित नहीं होता। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान’ चक्र में स्थित होता है। इस चक्र में अवस्थित मन वाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है।

नौतपा 2026: आखिर क्यों माने जाते हैं साल के सबसे गर्म 9 दिन?

  गर्मी का मौसम आते ही लोग एक शब्द बार-बार सुनने लगते हैं — नौतपा । गांव हो या शहर, बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं, “अभी तो नौतपा बाकी है, असली...