Monday, March 02, 2026

होला मोहल्ला 2026: आनंदपुर साहिब में वीरता और भक्ति का संगम

 जब फाल्गुन का महीना आता है और होली के रंग चारों ओर फैलने लगते हैं, उसी समय पंजाब की पवित्र धरती पर एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। यह उत्साह है होला मोहल्ला का। यह केवल एक मेला नहीं, बल्कि सिख परंपरा की शान, इतिहास और साहस का जीवंत उत्सव है।

होला मोहल्ला मुख्य रूप से आनंदपुर साहिब में मनाया जाता है, जहां स्थित है पवित्र तख्त श्री केसगढ़ साहिब।

साल 2026 में यह पावन आयोजन 4 मार्च से 6 मार्च तक मनाया जाएगा। इन तीन दिनों में पूरा शहर श्रद्धालुओं, निहंग सिखों और पर्यटकों से भर जाता है।


होला मोहल्ला का इतिहास

होला मोहल्ला की परंपरा की शुरुआत सन् 1701 में हुई थी। इसके प्रवर्तक थे सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह।

कहते हैं कि गुरु जी ने होली के अगले दिन इस आयोजन की शुरुआत की, ताकि सिख समाज अपनी युद्धक क्षमता और साहस का प्रदर्शन कर सके। उस समय यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि सैन्य अभ्यास जैसा आयोजन था।

आज भी जब निहंग सिख मैदान में उतरते हैं, तो लगता है जैसे इतिहास फिर से जीवित हो उठा हो।

होला मोहल्ला 2026 की तिथियाँ

  • प्रारंभ: 4 मार्च 2026

  • समापन: 6 मार्च 2026

  • मुख्य स्थल: तख्त श्री केसगढ़ साहिब, आनंदपुर साहिब

इन तीन दिनों में सुबह से रात तक कार्यक्रम चलते रहते हैं। कीर्तन, कथा, प्रदर्शन, सेवा—सब कुछ एक साथ।

मेले की प्रमुख विशेषताएँ

1. गतका और शस्त्र प्रदर्शन

होला मोहल्ला का सबसे आकर्षक दृश्य होता है निहंग सिखों द्वारा किया जाने वाला ‘गतका’ प्रदर्शन। घुड़सवारी, तलवारबाजी, भाले और अन्य शस्त्रों के साथ उनके करतब देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

यह केवल कला नहीं, बल्कि सिख इतिहास की वीरता का प्रतीक है। बच्चे, बुज़ुर्ग, महिलाएं—सब मंत्रमुग्ध होकर देखते रहते हैं।

2. नगर कीर्तन और शोभा यात्रा

अंतिम दिन एक विशाल नगर कीर्तन निकाला जाता है। इसमें ‘पंज प्यारे’ सबसे आगे चलते हैं। कीर्तन की मधुर ध्वनि और “जो बोले सो निहाल” के जयकारे वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं।

सड़कें केसरिया रंग में रंगी दिखाई देती हैं। सच कहूं तो वह दृश्य शब्दों में पूरा बयां नहीं हो पाता।

3. लंगर और सेवा की परंपरा

होला मोहल्ला के दौरान विशाल स्तर पर लंगर लगाया जाता है। लाखों लोगों के लिए भोजन की व्यवस्था की जाती है।

कोई अमीर-गरीब नहीं, कोई छोटा-बड़ा नहीं—सब एक पंक्ति में बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। यही सिख धर्म की असली खूबसूरती है।

सेवा करने वाले लोग बिना थके दिन-रात जुटे रहते हैं। कई बार तो बाहर से आए लोग भी सेवा में हाथ बंटाने लगते हैं।

अन्य स्थानों पर भी आयोजन

हालांकि आनंदपुर साहिब इस पर्व का मुख्य केंद्र है, लेकिन यह उत्सव श्री नयना देवी मंदिर और ऊना जिले के मैड़ी स्थित बाबा बड़भाग सिंह गुरुद्वारा में भी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

इन स्थानों पर भी श्रद्धालुओं की अच्छी खासी भीड़ उमड़ती है। वातावरण में भक्ति और उत्साह साफ महसूस होता है।

निष्कर्ष

होला मोहल्ला वीरता, भक्ति और सेवा का अनोखा संगम है। यह हमें सिख इतिहास की गौरवपूर्ण परंपराओं की याद दिलाता है और साथ ही एकता का संदेश भी देता है।

यदि आप 2026 में कुछ अलग अनुभव करना चाहते हैं, तो 4 से 6 मार्च के बीच आनंदपुर साहिब की यात्रा अवश्य करें।

शायद आप भी लौटते समय अपने साथ केवल यादें नहीं, बल्कि एक नई ऊर्जा लेकर आएं। #HolaMohalla #HolaMohalla2026 #AnandpurSahib #PunjabFestival #SikhFestival #TakhtSriKesgarhSahib #GuruGobindSinghJi #Gatka #NihangSingh #SikhHistory #PunjabCulture #ReligiousFestival #SpiritualIndia #FestivalOfValor #IndianTraditions #SpiritualJourney #IndianPhilosophy #पवित्रता #ध्यान #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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संत तुकाराम महाराज जयंती 2026

 फाल्गुन कृष्ण द्वितीया का दिन महाराष्ट्र के लिए बहुत ही खास होता है। इसी दिन संत तुकाराम महाराज की जयंती, जिसे तुकाराम बीज कहा जाता है, मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह पावन तिथि 5 मार्च को पड़ रही है। इस दिन भक्ति, कीर्तन और नामस्मरण से पूरा वातावरण जैसे बदल सा जाता है।


संत तुकाराम का जन्म और प्रारंभिक जीवन

संत तुकाराम महाराज का जन्म सन् 1608 में पुणे जिले के देहू गांव में हुआ था। साधारण परिवार में जन्मे तुकाराम ने बचपन से ही जीवन की कठिनाइयों को देखा। व्यापार में हानि, पारिवारिक संकट और समाज की कठोरता — सब कुछ उन्होंने झेला।

लेकिन इन सबके बीच उनका मन हमेशा भगवान में ही लगा रहा। शायद इसी कारण उनके शब्दों में इतना दर्द और उतनी ही करुणा दिखाई देती है।

अभंगों के माध्यम से समाज जागरण

संत तुकाराम केवल संत नहीं थे, वे समाज को आईना दिखाने वाले कवि भी थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में भक्ति के साथ-साथ समता का संदेश दिया।

उनका प्रसिद्ध अभंग “जे का रंजले गांजले” आज भी हर उस व्यक्ति को प्रेरित करता है जो पीड़ितों के लिए कुछ करना चाहता है। उन्होंने कहा कि जो दुखियों की सेवा करता है, वही सच्चा भक्त है।

उनकी सभी रचनाओं का संग्रह तुकाराम गाथा के नाम से जाना जाता है। यह ग्रंथ मराठी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। इसमें भक्ति की गहराई भी है और जीवन का सरल दर्शन भी।

वारकरी परंपरा और विठ्ठल भक्ति

संत तुकाराम महाराज वारकरी संप्रदाय के प्रमुख संतों में गिने जाते हैं। वे पंढरपुर के विठ्ठल भगवान के अनन्य भक्त थे।

हर वर्ष देहू से पंढरपुर तक निकलने वाली पालखी यात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। यह केवल यात्रा नहीं होती, यह एक चलता-फिरता भक्ति उत्सव होता है। ढोल-ताशे, अभंग, नामजप — सब कुछ मन को छू लेने वाला होता है।

कई बार तो ऐसा लगता है जैसे समय ही थम गया हो और हर कोई बस “विठ्ठल विठ्ठल” में डूबा हो।

तुकाराम जयंती कैसे मनाई जाती है?

तुकाराम बीज के दिन विशेष भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। देहू में तो विशेष उत्सव होता है। मंदिरों में सजावट, शोभायात्रा और पालखी कार्यक्रम बड़ी श्रद्धा से आयोजित किए जाते हैं।

गांव-गांव में लोग उनके अभंग गाते हैं। कुछ लोग व्रत रखते हैं, तो कुछ पूरे दिन नामस्मरण में लीन रहते हैं। सच कहूं तो, उस दिन का माहौल शब्दों में बताना थोड़ा मुश्किल है… उसे महसूस करना पड़ता है।

आज के समय में संत तुकाराम का महत्व

आज जब समाज कई तरह की विषमताओं से जूझ रहा है, तब संत तुकाराम का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने सिखाया कि सच्ची भक्ति केवल मंदिर तक सीमित नहीं है।

भूखे को भोजन देना, दुखी को सहारा देना और हर इंसान में ईश्वर को देखना — यही असली साधना है।

उनका जीवन हमें यह याद दिलाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, अगर मन में विश्वास हो तो रास्ता खुद बन जाता है।

निष्कर्ष

संत तुकाराम महाराज की जयंती केवल एक धार्मिक तिथि नहीं है, बल्कि यह हमें अपने भीतर झांकने का अवसर देती है।

5 मार्च 2026 को जब तुकाराम बीज मनाई जाएगी, तब यह केवल उत्सव नहीं होगा… यह उनके विचारों को फिर से याद करने और उन्हें जीवन में उतारने का एक छोटा सा प्रयास होगा।

कभी-कभी लगता है, अगर हम उनके एक भी संदेश को सच्चे मन से अपना लें, तो शायद दुनिया थोड़ी बेहतर हो सकती है। 😊

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चैतन्य महाप्रभु जयंती 2026: प्रेम, कीर्तन और भक्ति की गौर पूर्णिमा

 फाल्गुन की पूर्णिमा… हल्की ठंडी हवा, होली का रंगीन माहौल और उसी के बीच एक बेहद पावन दिन — गौर पूर्णिमा। यही वह तिथि है जब भक्तजन श्री चैतन्य महाप्रभु का प्राकट्य उत्सव मनाते हैं। यह सिर्फ एक जन्मदिन नहीं, बल्कि भक्ति की उस लहर का स्मरण है जिसने सदियों पहले लोगों के दिलों को छू लिया था।


गौर पूर्णिमा क्या है?

गौर पूर्णिमा, फाल्गुन महीने की पूर्णिमा को मनाई जाती है। इसी दिन 16वीं सदी में श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्म हुआ था। वैष्णव परंपरा में यह दिन बहुत ही विशेष माना जाता है।

कहते हैं, इस दिन चंद्रमा भी कुछ अलग ही चमकता है… शायद इसलिए कि यह प्रेम और भक्ति का उत्सव है।

जन्म और बाल्यकाल

सन 1486, बंगाल का नवद्वीप (नादिया)। माता शचि देवी और पिता जगन्नाथ मिश्र के घर एक बालक ने जन्म लिया। घर में खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उस बालक का नाम रखा गया — निमाई

बचपन से ही उनमें कुछ अलग था। तेज बुद्धि, मधुर वाणी और गहरी आस्था। धीरे-धीरे वही निमाई आगे चलकर चैतन्य महाप्रभु के नाम से विख्यात हुए।

क्यों माने जाते हैं दिव्य अवतार?

गौड़ीय वैष्णव मत के अनुसार, महाप्रभु को श्रीकृष्ण और राधा रानी का संयुक्त स्वरूप माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि वे प्रेम-भक्ति का संदेश देने स्वयं अवतरित हुए।

उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग कठिन नहीं, बस सच्चे हृदय से नाम जपना चाहिए।

उनका संदेश: प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म

महाप्रभु ने समाज में फैली ऊँच-नीच और जाति-पांति की दीवारों को तोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि भगवान के सामने सभी समान हैं।

उन्होंने “हरे कृष्ण” महामंत्र को जन-जन तक पहुँचाया। हरिनाम संकीर्तन को उन्होंने भक्ति का सरल और सहज माध्यम बताया।

आज भी जब कीर्तन की धुन उठती है, तो लगता है जैसे वही परंपरा आज भी जीवित है।

गौर पूर्णिमा कैसे मनाई जाती है?

इस दिन भक्त उपवास रखते हैं। मंदिरों में विशेष पूजा और अभिषेक होता है। जगह-जगह कीर्तन मंडलियाँ निकलती हैं।

मायापुर, वृंदावन और उड़ीसा में इस दिन का दृश्य देखने लायक होता है। सड़कों पर भजन, मंदिरों में सजावट, और हर चेहरे पर भक्ति की चमक।

कई लोग पूरा दिन नाम जप में बिताते हैं। शाम को चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोला जाता है। सच कहूँ तो, उस समय का वातावरण कुछ अलग ही होता है… मन शान्त हो जाता है।

2026 में गौर पूर्णिमा कब है?

वर्ष 2026 में चैतन्य महाप्रभु जयंती 3 मार्च को मनाई जाएगी। कुछ पंचांगों में तिथि के अंतर के कारण 3 या 4 मार्च का उल्लेख भी मिलता है। इसलिए स्थानीय पंचांग देख लेना बेहतर रहेगा।

अंत में…

गौर पूर्णिमा हमें याद दिलाती है कि जीवन की दौड़ में अगर कुछ सच में टिकता है तो वह है प्रेम और नाम स्मरण।

कभी-कभी लगता है, अगर हम रोज थोड़ा सा कीर्तन कर लें, थोड़ा सा मन शांत कर लें… तो शायद बहुत सी उलझनें खुद-ब-खुद सुलझ जाएँ।

शायद यही महाप्रभु का संदेश था — सरल रहो, प्रेम करो, और नाम जपो। #ChaitanyaMahaprabhu #GaurPurnima #GauraPurnima2026 #BhaktiMovement #HareKrishna #HarinaamSankirtan #VaishnavTradition #SpiritualIndia #IndianFestivals #BhaktiMarg #MayapurDham #Vrindavan #SanatanDharma #DevotionalLife #FestivalOfFaith #SpiritualJourney #IndianPhilosophy #SanatanDharma #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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होली 2026: रंग, परंपरा और मन की सफ़ाई का पर्व

 फाल्गुन का महीना जैसे ही दस्तक देता है, हवा में कुछ बदलने लगता है। ठंड ढलने लगती है, दिन थोड़े छोटे महसूस होते हैं, पेड़ों पर नई कोंपलें झाँकने लगती हैं। आम की बौर पर भँवरे मंडराते दिखते हैं। सच कहूँ तो, वसन्तपञ्चमी के बाद से ही प्रकृति होली की तैयारी में लग जाती है।

और फिर… आता है होली — सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि दिलों को साफ करने का अवसर।


🌸 प्रकृति में होली का आगमन

माघ पूर्णिमा के दिन होली का डांडा रोप दिया जाता है। गाँवों में बच्चे लकड़ी और उपले इकट्ठा करते हैं। खेतों में नया अन्न पक चुका होता है। वातावरण में हल्की-सी मादकता होती है, जैसे प्रकृति खुद रंगों में नहाने को तैयार हो।

होली का उत्साह धीरे-धीरे बढ़ता है — पहले होलाष्टक, फिर पूजन, और अंत में होलिका-दहन।

🔥 होलिका दहन: बुराई पर अच्छाई की जीत

होली से एक दिन पहले होलिका पूजन किया जाता है। लकड़ियों का ढेर लगाया जाता है और विधिपूर्वक पूजा कर अग्नि प्रज्वलित की जाती है।

पूजन के समय यह मंत्र बोला जाता है:

“अतस्त्वां पूजयिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव।”

इस पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ भी कहा गया है। नए अन्न को अग्नि में अर्पित कर प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जाता है। इसी ‘होला’ शब्द से “होलिकोत्सव” नाम पड़ा माना जाता है।

📜 होली से जुड़ी प्रमुख कथाएँ

1️⃣ काम-दहन की कथा

कई मान्यताओं के अनुसार होली का संबंध कामदेव-दहन से है। जब भगवान शिव तपस्या में लीन थे, तब कामदेव ने उन्हें विचलित करने का प्रयास किया। क्रोधित होकर शिव ने अपनी तीसरी आँख से कामदेव को भस्म कर दिया।

यह घटना वासना पर संयम की विजय का प्रतीक मानी जाती है।

2️⃣ प्रह्लाद और होलिका की कथा

सबसे प्रसिद्ध कथा भक्त प्रह्लाद की है। उनके पिता हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान मानते थे, पर प्रह्लाद विष्णु भक्त थे।

हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती। योजना बनी कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठे।

पर हुआ उल्टा। होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गए।

यह कथा हमें याद दिलाती है — सच्ची आस्था की रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं।

3️⃣ होलाष्टक और लोक परंपराएँ

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक आठ दिन होलाष्टक मनाया जाता है। कई प्रदेशों में एक पेड़ की शाखा काटकर उसमें रंगीन कपड़े बाँध दिए जाते हैं और उसे भूमि में गाड़ा जाता है। उसके नीचे उत्सव मनाया जाता है।

इन दिनों कुछ शुभ कार्य वर्जित भी माने जाते हैं।

4️⃣ श्रीगोविन्द के दर्शन का महत्व

लोकमान्यता है कि जो लोग फाल्गुन पूर्णिमा के दिन एकाग्र चित्त से हिंडोले में झूलते श्रीगोविन्द पुरुषोत्तम के दर्शन करते हैं, उन्हें वैकुण्ठलोक की प्राप्ति होती है।

कई स्थानों पर आम्र-मंजरी और चंदन मिलाकर सेवन करने की भी परंपरा है।

5️⃣ भविष्य पुराण का उल्लेख

कथा मिलती है कि नारदजी ने युधिष्ठिर से कहा था — फाल्गुन पूर्णिमा के दिन सबको अभयदान दो, ताकि प्रजा हँस सके, खुलकर आनंद मना सके।

होलिका-दहन से अनिष्ट दूर होते हैं — ऐसी मान्यता है।

🎨 रंगों की होली: परंपरा और वर्तमान

होली सामाजिक समरसता का पर्व है। इसमें जाति, वर्ग, ऊँच-नीच का भेद नहीं रहता।

लेकिन… एक बात मन को खटकती है।

आजकल कहीं-कहीं रंगों की जगह कीचड़, मिट्टी, यहाँ तक कि अपशब्दों का प्रयोग भी हो जाता है। मज़ाक के नाम पर दिल दुखा देना — ये होली का संदेश नहीं है।

होली का अर्थ है —
रंग लगाओ, पर रिश्ते मत जलाओ।

💛 होली का सच्चा संदेश

होली हमें सिखाती है —

  • द्वेष छोड़ो

  • प्रेम अपनाओ

  • पुराने गिले-शिकवे मिटाओ

  • और एक नई शुरुआत करो

यह केवल रंगों का खेल नहीं, मन के मैल को धोने का अवसर है।

✍️ अंतिम बात

जब होलिका की अग्नि जले, तो बस एक क्षण के लिए आँख बंद करके सोचिए —
मैं इस अग्नि में क्या जला रहा हूँ?
अहंकार? ईर्ष्या? क्रोध?

अगर सच में कुछ बुराई जल गई… तो समझिए इस बार की होली सफल हुई।

आप सभी को रंगों, प्रेम और सद्भाव से भरी होली की हार्दिक शुभकामनाएँ। 🌸 #होली2026 #होलिका_दहन #फाल्गुन_पूर्णिमा #रंगों_का_त्योहार #भारतीय_संस्कृति #सनातन_परंपरा #नवान्नेष्टि #प्रह्लाद_कथा #वसंत_ऋतु #धार्मिक_पर्व #आध्यात्मिक_जीवन #भाईचारा #सद्भावना #FestivalOfColors #IndianTraditions #SpiritualJourney #IndianPhilosophy #SanatanDharma #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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वारुणी पर्व 17 मार्च – एक दुर्लभ पुण्ययोग का दिन

 चैत्र मास का कृष्ण पक्ष अपने आप में ही साधना और संयम का समय माना जाता है। लेकिन जब इसी पक्ष की त्रयोदशी तिथि आती है, और वह विशेष नक्षत्रों के साथ जुड़ती है, तब बनता है वारुणी पर्व। इस वर्ष यह पावन संयोग 17 मार्च को पड़ रहा है।

सच कहूँ तो बहुत से लोग इस पर्व के बारे में ज़्यादा नहीं जानते, परन्तु हमारे शास्त्रों में इसका बड़ा ही अद्भुत महत्त्व बताया गया है।

वारुणी पर्व क्या है?

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को यदि शतभिषा नक्षत्र (जिसे वारुण नक्षत्र भी कहा जाता है) उपस्थित हो, तो उस दिन को वारुणी कहा जाता है।

यह कोई साधारण तिथि नहीं मानी गई है। मान्यता है कि यह दिन विशेष रूप से जल, स्नान और दान से जुड़ा हुआ है। शायद इसीलिए इसका संबंध भगवान वरुण से भी जोड़ा जाता है।

वारुणी पर्व के तीन प्रकार

शास्त्रों में इस पर्व के तीन अलग-अलग रूप बताए गए हैं।

1. वारुणी

यदि चैत्र कृष्ण त्रयोदशी के दिन शतभिषा नक्षत्र हो, तो वह सामान्य वारुणी कहलाती है।

2. महावारुणी

अगर उसी दिन शतभिषा नक्षत्र के साथ शनिवार भी पड़ जाए, तो यह योग और भी प्रभावशाली हो जाता है। तब इसे महावारुणी कहा जाता है।

3. महामहावारुणी

और यदि त्रयोदशी, शतभिषा नक्षत्र, शनिवार तथा शुभ योग — ये सभी एक साथ मिल जाएँ, तो वह अत्यंत दुर्लभ संयोग महामहावारुणी पर्व कहलाता है।
ऐसा योग बार-बार नहीं आता… इसलिए इसे बहुत विशेष माना गया है।

स्नान और दान का अद्भुत फल

धर्मग्रंथों में उल्लेख है कि इस दिन गंगा आदि पवित्र नदियों में स्नान करने से करोड़ों सूर्यग्रहणों के समान पुण्यफल प्राप्त होता है।

यह तुलना यूँ ही नहीं की गई। सूर्यग्रहण का समय अपने आप में अत्यंत पवित्र और प्रभावशाली माना जाता है, और जब कहा जाए कि उसका फल करोड़ों गुना है, तो बात अपने आप समझ में आ जाती है।

इस दिन प्रातःकाल स्नान, फिर दान — विशेषकर जल, वस्त्र, अन्न या तिल का दान — शुभ माना गया है। कई लोग उपवास भी रखते हैं।

किन तीर्थों में विशेष महत्त्व?

इस तिथि पर काशी, प्रयाग और हरिद्वार जैसे तीर्थस्थलों में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है।

काशी

काशी में गंगा स्नान को मोक्षदायी कहा गया है। वारुणी के दिन यहाँ स्नान करने से जीवन के पाप क्षीण होते हैं, ऐसी मान्यता है।

प्रयाग

प्रयाग का संगम तो वैसे भी पुण्यभूमि है। यहाँ स्नान का महत्व हर पर्व पर रहता है, पर इस दिन विशेष फल की बात कही गई है।

हरिद्वार

हरिद्वार में हर की पौड़ी पर स्नान करना भक्तों के लिए एक अलग ही अनुभव होता है। वारुणी पर्व पर यहाँ श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।

एक छोटी सी भावना

कभी-कभी हम बड़े-बड़े उपाय ढूँढते हैं, लेकिन हमारे धर्म में साधारण दिखने वाले कर्म — जैसे स्नान, दान, संयम — ही सबसे बड़े माने गए हैं।

17 मार्च को आने वाला यह वारुणी पर्व हमें यही याद दिलाता है कि जल की पवित्रता, मन की सादगी और श्रद्धा — यही असली साधना है।

अगर संभव हो तो इस दिन प्रातः स्नान करें, थोड़ा सा दान दें, और मन ही मन प्रार्थना कर लें।
सब कुछ बहुत विधि-विधान से हो यह ज़रूरी नहीं… भावना सच्ची होनी चाहिए।

शायद यही इस पर्व का असली रहस्य है।

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शीतला अष्टमी 2026 (11 मार्च) – बसौड़ा व्रत की सम्पूर्ण जानकारी

 हर वर्ष चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को शीतला माता का पावन व्रत रखा जाता है। इस वर्ष शीतला अष्टमी 11 मार्च को मनाई जाएगी। कई स्थानों पर इसे होली के बाद आने वाले पहले सोमवार या गुरुवार को भी मनाया जाता है।

यह व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि हमारे लोकजीवन, परिवार और स्वास्थ्य से गहराई से जुड़ा हुआ पर्व है। गाँवों में आज भी इसे बड़े श्रद्धाभाव से मनाया जाता है।


शीतला माता कौन हैं?

शास्त्रों में शीतला माता को रोगनाशिनी देवी माना गया है। विशेष रूप से चेचक, फोड़े-फुंसियाँ, नेत्र रोग, ज्वर और त्वचा संबंधी कष्टों से रक्षा करने वाली माता के रूप में उनकी पूजा की जाती है।

‘शीतलास्तोत्र’ में उनका स्वरूप इस प्रकार बताया गया है —
वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनी-कलशोपेतां शूर्पालङ्कृतमस्तकाम्॥

अर्थात वे गधे पर विराजमान हैं, हाथ में झाड़ू और कलश धारण किए हुए हैं, और उनके मस्तक पर सूप सुशोभित है। यह स्वरूप प्रतीकात्मक है — स्वच्छता, शीतलता और रोगों के निवारण का।

शीतला अष्टमी का महत्व

लोकमान्यता है कि इस व्रत को करने से —

  • दाहज्वर, पीतज्वर और त्वचा रोग शांत होते हैं

  • बच्चों को होने वाले फोड़े-फुंसियों के दाग मिटते हैं

  • परिवार में सुख-शांति और आरोग्य बना रहता है

  • घर पर माता की कृपा बनी रहती है

गाँवों में बुजुर्ग आज भी कहते हैं — “बसौड़ा करो, घर में रोग नहीं टिकेगा।” शायद विज्ञान की भाषा में समझाएँ तो यह स्वच्छता और संयम का संदेश भी है।

बसौड़ा क्यों कहा जाता है?

इस व्रत की सबसे विशेष बात है — बासी भोजन

व्रत से एक दिन पहले ही सारे पकवान बना लिए जाते हैं। 11 मार्च को व्रत वाले दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता। माता को ठंडा (शीतल) भोग लगाया जाता है।

इसी कारण इस पर्व को ‘बसौड़ा’ कहा जाता है।

एक दिन पहले क्या बनता है?

  • पूड़ी, पूआ

  • दाल-भात

  • लपसी

  • मिठाई

  • मेवा

  • मोंठ और बाजरा

घर की महिलाएँ एक दिन पहले बड़े प्रेम से ये सब तैयार करती हैं। सच कहूँ तो उस दिन की रसोई की खुशबू अलग ही होती है।

व्रत की विधि (पूजा कैसे करें?)

1. स्नान और संकल्प

प्रातःकाल ठंडे जल से स्नान करें। फिर संकल्प लें —
“मेरे घर में शीतला जनित रोगों के शमन तथा आयु, आरोग्य और समृद्धि की वृद्धि के लिए मैं शीतला अष्टमी व्रत कर रहा/रही हूँ।”

2. रसोई में छाप लगाना

रसोईघर की दीवार पर घी में पाँचों उँगलियाँ डुबोकर छाप लगाई जाती है। उस पर रोली और चावल अर्पित किए जाते हैं। यह एक बहुत पुरानी परंपरा है, शायद हमारे बचपन में हमने दादी को करते देखा होगा।

3. पूजन सामग्री

एक थाली में रखें —

  • भात

  • रोटी

  • दही

  • चीनी

  • जल

  • रोली

  • चावल

  • हल्दी

  • मूँग की दाल का छिलका

  • धूपबत्ती

  • मोंठ और बाजरा

इस थाली को घर के सभी सदस्यों से स्पर्श करवाकर शीतला माता के मंदिर में चढ़ाया जाता है।

4. चौराहे पर जल अर्पण

कई स्थानों पर चौराहे पर जल चढ़ाने की भी परंपरा है। यह लोकआस्था से जुड़ा विधान है।

5. वायना और आशीर्वाद

मोंठ-बाजरे का वायना निकालकर उस पर धन रखकर सास को भेंट किया जाता है। फिर किसी वृद्धा को भोजन कराकर दक्षिणा दी जाती है। यह केवल पूजा नहीं, परिवारिक सम्मान और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक भी है।

कुंडारे भरने की परंपरा

कुछ घरों में बड़े और छोटे कुंडारे (मिट्टी के पात्र) भरने की परंपरा होती है। छोटे कुंडारों में बासी व्यंजन भरकर बड़े कुंडारे में रखा जाता है। हल्दी से पूजन कर माता के स्थान पर चढ़ाया जाता है।

पुत्र जन्म या विवाह के समय अतिरिक्त कुंडारे भरना शुभ माना जाता है।

शीतला माता की लोककथा

एक गाँव में एक स्त्री बसौड़े के दिन शीतला माता की पूजा करती थी और ठंडी रोटी खाती थी। बाकी गाँव वाले यह व्रत नहीं करते थे।

एक दिन गाँव में भीषण आग लगी। सबकी झोपड़ियाँ जल गईं, पर उस स्त्री की झोपड़ी सुरक्षित रही। लोगों ने कारण पूछा तो उसने बताया कि वह शीतला माता की पूजा करती है।

तब से पूरे गाँव में यह व्रत मनाया जाने लगा।

कहानी सुनते-सुनते मन में विश्वास जागता है… शायद यही आस्था की शक्ति है।

पारंपरिक लोकगीत

“मेरी माता का चिनिए चौबारा, दूध-पूत देने को चिनिए चौबारा।
किसने मैया ईंटें थपाई, किसने घोला है गारा?
श्रीकृष्ण ने ईंट थपाई, दाऊजी ने घोला है गारा…”

गीत गाते समय श्रीकृष्ण और दाऊजी के स्थान पर अपने परिवार के सदस्यों के नाम लिए जाते हैं। इससे एक अपनापन सा लगता है।

अंत में…

11 मार्च को जब आप शीतला अष्टमी मनाएँ, तो इसे केवल एक रस्म की तरह न करें। यह पर्व हमें सिखाता है —

  • स्वच्छता का महत्व

  • संयम

  • परिवार का सम्मान

  • और रोगों से बचाव

माता शीतला सब पर कृपा करें।
घर में सुख रहे, बच्चे स्वस्थ रहें… बस यही कामना है। #SheetalaAshtami #ShitalaMata #BasodaVrat #ShitalaAshtami2026 #11MarchFestival #HinduVrat #ChaitraAshtami #IndianTraditions #VratKatha #MataRani #SanatanDharma #HinduCulture #FestivalOfFaith #DesiRituals #BhaktiBhav #SpiritualJourney #IndianPhilosophy #SanatanDharma #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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