Tuesday, October 28, 2025

गोपाष्टमी 2025: जानिए इस दिन क्या करें और कैसे मनाएँ यह पवित्र पर्व

भारत की संस्कृति में गाय को माता का स्थान दिया गया है। गोपाष्टमी का दिन गाय माता की आराधना, सेवा और सम्मान का सबसे पवित्र अवसर माना जाता है। यह पर्व हमें केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की भी याद दिलाता है — कि गोसंरक्षण हमारे जीवन का अभिन्न भाग है।

आइए जानते हैं कि गोपाष्टमी के दिन क्या-क्या करना चाहिए और कैसे इस दिन को भावपूर्ण ढंग से मनाया जाए।


गोपाष्टमी का महत्व

गोपाष्टमी का पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने पहली बार गोचारण (गाय चराने) का कार्य आरम्भ किया था। इसलिए इस दिन गायों, गोपालों और गोशालाओं का विशेष सम्मान किया जाता है।

गायों की पूजा और सजावट

गोपाष्टमी की सुबह सबसे पहले गायों को स्नान करवाएं। उन्हें साफ पानी से धोकर, ताजे कपड़े या गेरुए वस्त्र से सजाएं। उनके गले में फूलों की माला डालें, सींगों पर हल्दी और कुमकुम लगाएं। यह श्रद्धा से किया गया श्रृंगार उन्हें प्रसन्न करता है और वातावरण को पवित्र बनाता है।

गोशाला की सफाई

जहाँ गायें रहती हैं, उस स्थान की अच्छे से सफाई करें। जगह पर गोबर, सूखी घास या गंदगी न रहने दें। पूजा से पहले गोशाला में गोबर से लीपा जाए तो वह और भी शुभ माना जाता है।

गोपूजा और गोपालों का सम्मान

इस दिन गायों की विधिवत पूजा करें। दीपक जलाकर आरती करें और गुड़, चना, हरी घास आदि से उन्हें तृप्त करें। जो ग्वाले या गोपाल प्रतिदिन गायों की सेवा करते हैं, उनका आदर करें, उन्हें वस्त्र, भोजन या दक्षिणा दें।

कार्य से विश्राम लेकर गोसेवा

गोपाष्टमी के दिन अपने व्यवसाय, व्यापार या अन्य कार्यों को थोड़ी देर के लिए छोड़कर गोशालाओं में जाएँ। वहाँ के कार्यक्रमों और उत्सवों में भाग लें, गोपालन और गोसंरक्षण से जुड़ी बातें सुनें और दूसरों को भी प्रेरित करें।

दान और सहयोग

इस दिन गायों की सेवा में दान देना अत्यंत शुभ माना गया है। चाहे अन्न, धन, हरा चारा या अन्य सामग्री — जो भी संभव हो, गोशालाओं को अर्पित करें। यह दान सीधे-सीधे गोसेवा का रूप लेता है।

गोसंरक्षण पर चर्चा

गाँव या शहर में सभा रखी जा सकती है, जहाँ इन विषयों पर विचार किया जाए –

  • देशभर में गोहत्या को कैसे रोका जा सकता है?

  • गायों की नस्ल और दूध उत्पादन में सुधार के लिए कौन से उपाय करें?

  • गोबर और गोमूत्र को जैविक खेती में कैसे उपयोग करें?

  • गोपालकों को सुविधाएँ और आर्थिक मदद कैसे मिले?

ऐसी चर्चाओं से समाज में जागरूकता फैलती है और गोसंस्कृति को नई दिशा मिलती है।

गो-रक्षा का संकल्प

गोपाष्टमी केवल पूजा का नहीं, बल्कि संकल्प का भी दिन है। इस दिन सभी भक्तों को गोसंरक्षण का प्रण लेना चाहिए –

  • कभी भी अपनी गाय ऐसे व्यक्ति को न बेचें, जो उसे कसाई या व्यापारी को दे सकता हो।

  • चमड़े, हड्डी या चर्बी से बने वस्त्रों और वस्तुओं का प्रयोग न करें।

  • वनस्पति तेल या नकली घी का उपयोग न करें, क्योंकि इससे असली घी की माँग घटती है।

अच्छे साँड़ों की देखभाल

जहाँ पर अच्छे नस्ल के साँड़ न हों, वहाँ उनकी व्यवस्था करनी चाहिए। और जहाँ हों, वहाँ उनके भोजन और सुरक्षा का ध्यान रखा जाए। इससे आने वाली पीढ़ियों की गायें भी श्रेष्ठ बनेंगी।

गोवंश की गणना और प्रोत्साहन

अपने गाँव या नगर में कितनी गायें, बछिया, बछड़े और बैल हैं, इसका एक छोटा लेखा रखें। इससे गोसंख्या का सही ज्ञान रहेगा और योजना बनाना आसान होगा।
साथ ही जो लोग उत्तम नस्ल की गायों को पालते हैं, उनकी सेवा करते हैं — उन्हें सम्मान और पुरस्कार देकर प्रोत्साहित करें।

गोस्वास्थ्य की जानकारी

लोगों को सिखाया जाए कि गायों को बीमारियों से कैसे बचाया जा सकता है। संक्रामक रोगों की पहचान और उपचार के उपाय समझाना भी गोसेवा का महत्वपूर्ण भाग है।

भविष्य की योजना और समीक्षा

गोपाष्टमी के बाद आने वाले पूरे वर्ष के लिए गोसंवर्धन की योजना बनाएं। पिछली गोपाष्टमी से अब तक क्या सुधार हुए, क्या कार्य अधूरे हैं — इस पर भी समीक्षा करें।

सर्वधर्म एकता और सद्भाव

इस दिन अन्य धर्मों के सज्जनों — जैसे मुसलमान, ईसाई या सिख भाइयों को भी आमंत्रित करें। उन्हें प्रेम और सम्मानपूर्वक इस उत्सव में सहभागी बनाएं, ताकि सब मिलकर गाय के महत्व को समझें और गोसंरक्षण का समर्थन करें।

निष्कर्ष

गोपाष्टमी का दिन केवल पूजा का नहीं, बल्कि गोमाता के प्रति हमारी जिम्मेदारी का स्मरण कराने वाला पर्व है। जब हम गायों की रक्षा, पालन और सम्मान के लिए एकजुट होकर कार्य करते हैं, तभी समाज में समृद्धि और शांति आती है।

गाय हमारी संस्कृति की आत्मा है — उसकी सेवा ही सच्ची भक्ति है। #गोपाष्टमी #गोपाष्टमी2025 #गायकीपूजा #गोमाताकीसेवा #गोरक्षा #गोसेवा #गोपाष्टमीकापर्व #हिन्दूसंस्कृति #गौपूजन #गौभक्ति #गोशाला #गायहमारीमाता #गोपाष्टमीमहत्व #गोपाष्टमीव्रत #भारतीयपरंपरा #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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Saturday, October 25, 2025

सूर्य षष्ठी व्रत: बिहार का सबसे पावन लोकपर्व

 भारत की धरती विविध परंपराओं और उत्सवों की भूमि है, लेकिन बिहार का सूर्य षष्ठी व्रत, जिसे आम बोलचाल में छठ पर्व कहा जाता है, अपनी भव्यता और आध्यात्मिकता के लिए अद्वितीय है। यह पर्व भगवान सूर्य देव और माता षष्ठी की उपासना को समर्पित है। इस दिन महिलाएँ संतान की दीर्घायु, परिवार की समृद्धि और सुख-शांति की कामना करती हैं।


सूर्य षष्ठी व्रत का पौराणिक आधार

भारतीय संस्कृति में हर तिथि, हर पर्व के पीछे कोई न कोई पौराणिक कथा अवश्य जुड़ी होती है। जैसे गणेश जी की पूजा चतुर्थी तिथि को की जाती है, विष्णु भगवान की उपासना एकादशी को होती है, वैसे ही सूर्य देव की पूजा सप्तमी को करने की परंपरा है। लेकिन बिहार में सूर्य देव की पूजा षष्ठी तिथि को की जाती है, जो इस प्रदेश की एक अनोखी विशेषता है।

🌼 प्रकृति और षष्ठी देवी का संबंध

श्वेताश्वतर उपनिषद में कहा गया है कि सृष्टि की जननी प्रकृति ही परमात्मा की माया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में उल्लेख मिलता है कि सृष्टि रचना के समय परमात्मा ने स्वयं को दो भागों में विभक्त किया — एक भाग से पुरुष (शक्ति) और दूसरे से प्रकृति (सृष्टि) का जन्म हुआ।

प्रकृति ने अपने पाँच स्वरूपों को जन्म दिया — दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री। इन्हीं में से एक रूप है देवसेना देवी, जो सभी बालकों की रक्षक मानी जाती हैं। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन्हें षष्ठी देवी कहा गया।

षष्ठी देवी की कथा: जीवन देने वाली माता

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, प्रथम मनु स्वायम्भुव के पुत्र प्रियव्रत को संतान नहीं थी। उन्होंने महर्षि कश्यप से उपाय पूछा। ऋषि ने उन्हें पुत्रेष्टि यज्ञ करने का परामर्श दिया। यज्ञ के बाद रानी मालिनी ने पुत्र को जन्म दिया, परंतु वह शिशु मृत था।

राजा प्रियव्रत दुःख से व्याकुल हो उठे। तभी आकाश से एक दिव्य विमान उतरा, जिसमें षष्ठी देवी विराजमान थीं। उन्होंने मृत शिशु को स्पर्श किया, और वह जीवित हो गया। देवी ने कहा —

“मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री षष्ठी हूँ, जो अपुत्रों को पुत्र प्रदान करती हूँ।”

राजा ने देवी की आज्ञा से हर महीने की शुक्ल षष्ठी को देवी की पूजा आरंभ की। तभी से यह पर्व लोक में “षष्ठी पूजन” या “छठी” के रूप में प्रचलित हुआ।

सूर्य षष्ठी व्रत की उत्पत्ति

भविष्य पुराण और स्कंद पुराण दोनों में षष्ठी व्रत का उल्लेख मिलता है। परंतु बिहार की परंपरा में यह व्रत सूर्य देव की उपासना के साथ मनाया जाता है।

मैथिल ग्रंथ वर्षकृत्यविधि में इसे प्रतिहार षष्ठी कहा गया है। प्रतिहार का अर्थ होता है “चमत्कार करने वाला” — अर्थात यह व्रत भक्तों की मनोकामना पूरी करने में सक्षम है।

सूर्य षष्ठी व्रत विधि

🔹 व्रत का प्रारंभ

व्रत की शुरुआत पंचमी तिथि से होती है। इस दिन व्रती केवल एक बार भोजन करता है और संयमपूर्वक व्यवहार रखता है।

🔹 षष्ठी के दिन

  • व्रती पूर्ण रूप से निराहार रहता है।

  • दोपहर में नदी या तालाब के तट पर जाकर पूजा की जाती है।

  • भगवान सूर्य को लाल चंदन, लाल पुष्प, फल और घृत से बने पकवान अर्पित किए जाते हैं।

  • भक्त सूर्य की ओर मुख कर हाथ जोड़कर अर्घ्य देते हैं और लोकगीत गाते हैं।

“रक्तचंदन सम्मिश्रं, रक्तपुष्पाक्षतान्वितम्।”

🔹 पूजा का महत्व

षष्ठी देवी की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उनका पूजन किया जाता है। अगली सुबह पुनः पूजा कर देवी का विसर्जन किया जाता है।

बिहार में सूर्य षष्ठी का लोक रूप

बिहार में सूर्य षष्ठी व्रत सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था का उत्सव है। संध्या के समय जब महिलाएँ सूप और डलिया में दीप जलाकर घाट की ओर जाती हैं, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।

ठेकुआ: प्रसाद का विशेष स्थान

इस पर्व का प्रमुख प्रसाद ठेकुआ होता है, जो आटे, गुड़ और घी से बनता है। ठेकुए पर लकड़ी के साँचे से सूर्य देव के रथ का चक्र उकेरा जाता है।

अर्घ्य का दृश्य

संध्या और प्रातःकालीन अर्घ्य का दृश्य अवर्णनीय होता है। जब उगते सूर्य की पहली किरण जल में झिलमिलाती है, तब हर व्रती की आँखों में श्रद्धा और आँसुओं का संगम होता है।

सूर्य और षष्ठी की संयुक्त उपासना

सूर्य देव प्रत्यक्ष देवता हैं — जो जीवन, प्रकाश और ऊर्जा के दाता हैं। वहीं माता षष्ठी संतान की रक्षिका हैं। दोनों की संयुक्त आराधना से भक्त को संतान-सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होती है।

बिहार के लोकगीतों में भी यही भावना झलकती है —

“काहे लागी पूजेलू तुहूं देवल घरवा हे,
पुत्र लागी करिहं हम छठी के बरतिया हे।”

यह गीत बताता है कि भक्ति सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि मातृत्व की गहराई से जुड़ी भावना है।

 निष्कर्ष

सूर्य षष्ठी व्रत सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानव और प्रकृति के मधुर संबंध का प्रतीक है। यह पर्व सिखाता है कि जब मनुष्य श्रद्धा, संयम और सेवा की भावना से पूजा करता है, तो प्रकृति स्वयं उसकी रक्षा करती है।

इस प्रकार सूर्य षष्ठी, सूर्य की तेजस्विता और माता षष्ठी के वात्सल्य का संगम है — जहाँ भक्ति और मातृत्व, दोनों एकाकार हो जाते हैं। #सूर्यषष्ठीव्रत #सूर्यदेवकीपूजा #छठव्रतकामहत्व #सूर्यउपासना #कार्तिकषष्ठी #छठमइया #सनव्रत #हिंदूत्योहार #आध्यात्मिकजीवन #भक्ति_भावना #सनातनसंस्कृति #सूर्यअर्चना #पौराणिकव्रत #धार्मिकव्रत #सूर्यभक्ति #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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गोपाष्टमी: गायों के प्रति श्रद्धा और खुशियों का त्यौहार

 गोपाष्टमी का त्यौहार कार्तिक शुक्ल अष्टमी को मनाया जाता है। यह दिन खास तौर पर गायों के सम्मान और उनकी पूजा के लिए समर्पित होता है। सनातन धर्म में गाय को माता का रूप माना गया है और इस दिन उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना अत्यंत शुभ माना जाता है।


प्रातःकाल की पूजा

गायों का स्नान कराना गोपाष्टमी का पहला महत्वपूर्ण कर्म है। सुबह-सुबह गायों को साफ पानी से स्नान कराएं और उन्हें गंध-पुष्प, हल्दी-चंदन जैसे सामग्रियों से सजाएं।

इसके बाद उनका पूजन करें। इस दौरान गायों के साथ ग्वालों (गोपालों) का भी सम्मान किया जाता है। पूजा के समय गायों को हरी घास, चारा या गोग्रास देना शुभ माना जाता है।

परिक्रमा और आशीर्वाद

गायों को भोजन देने और सजाने के बाद उनके चारों ओर परिक्रमा करें। यदि थोड़ी दूरी तक उनके साथ चलते हैं, तो ऐसा करने से सभी प्रकार की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और घर में सुख-शांति आती है।

संध्या में स्वागत और पूजा

संध्या के समय, जब गायें चरकर वापस आती हैं, तो उनका स्वागत विशेष रूप से किया जाता है। उन्हें भोजन कराएं और पञ्चोपचार पूजन करके उनका सम्मान करें।

गायों की चरणरज को माथे पर लगाना शुभ माना जाता है। इससे घर में सौभाग्य और समृद्धि बढ़ती है।

गोपाष्टमी का महत्व

गोपाष्टमी न सिर्फ गायों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का दिन है, बल्कि यह दिन हमारे जीवन में सौभाग्य, समृद्धि और शांति लाने वाला माना गया है। गायों के सम्मान से परिवार में खुशहाली बढ़ती है और मन में एक सुकून का अनुभव होता है। #गोपाष्टमी #Gopashtami #गौमाता #GaumataKiJai #गौसेवा #CowWorship #HinduFestival #SpiritualIndia #गौपूजन #IndianTradition #BhaktiVibes #SanatanSanskriti #Gaupooja #GopashtamiCelebration #DivineCulture #SanatanDharma #सनातन #पवित्रता #ध्यान #मंत्र #पूजा #व्रत #धार्मिकअनुष्ठान #संस्कार #ऋभुकान्त_गोस्वामी #RibhukantGoswami #Astrologer #Astrology #LalKitab #लाल_किताब #PanditVenimadhavGoswami

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Tuesday, October 14, 2025

दीपावली – पावन पर्व और पूजन मुहुर्त


दीपावली, श्री महागणपति, महालक्ष्मी और महामाया महाकाली की पूजन और साधना का अत्यंत पवित्र पर्व है। इस दिन नए व्यवसाय या उद्योग की शुरुआत करने तथा पुराने खातों का पूजन करने की परंपरा प्रचलित है।

धर्मशास्त्रों के अनुसार दीपावली अमावस्या की रात, अर्थात प्रदोष काल और महानिशीथ काल में मनाई जाती है। यहाँ प्रदोष काल गृहस्थों और व्यापारियों के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि महानिशीथ काल तांत्रिक या आगम शास्त्रीय विधियों से पूजन के लिए उत्तम माना गया है।


प्रदोष काल का महत्व:

दिन विष्णु स्वरूप और रात लक्ष्मी स्वरूप होती है।

दिन-रात्रि के इस संयोग को प्रदोष काल कहा जाता है।

धर्मसिन्धु में उल्लेख है कि प्रदोष काल में दीप प्रज्ज्वलित करके घरों को सजाना चाहिए और पितरों के लिए श्राद्ध करना चाहिए।

इस वर्ष दीपावली का समय (2025)

इस वर्ष, श्री शुभ संवत् 2082, शाके 1947, कार्तिक कृष्ण अमावस्या प्रदोष कालीन 20 अक्टूबर 2025, सोमवार को है।

चतुर्दशी तिथि: सूर्योदय से अपराह्न 03:46 तक

अमावस्या तिथि प्रारम्भ: अपराह्न 03:46 के बाद

दीपावली पूजन के लिए महत्वपूर्ण समय:

प्रदोष काल: शाम 05:27 से रात्रि 08:09 तक

स्थिर लग्न वृष: शाम 06:50 से रात्रि 09 :47 तक

चर चौघड़िया:  शाम 05:27 – शाम 07:01

लाभ चौघड़िया:रात्रि 10:06 – रात्रि 11:43 

शुभ, अमृत, चर चौघड़िया (संयुक्त वेला) : रात्रि 01:18 – 06:02 (सूर्योदय पूर्व)

महानिशीथ काल: रात 11:45 – रात्रि 12:39

इसमें लाभ चौघड़िया: रात्रि 10:06 – रात्रि  01:18

स्थिर लग्न सिंह: रात्रि 01:18 – रात्रि 03:32

इसमें शुभ चौघड़िया: 01:18 – 02:53

इस प्रकार 20 अक्टूबर 2025 को अमावस्या रातभर रहेगी और उपरोक्त शुभ समयों में पूजन करना सर्वश्रेष्ठ रहेगा।


21 अक्टूबर 2025, मंगलवार की स्थिति

21 अक्टूबर 2025, मंगलवार को सूर्योदय से शाम 05:55 तक अमावस्या तिथि रहेगी। उसके बाद कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा प्रारंभ हो जाएगी।


प्रदोष काल: शाम 05:27 – रात्रि 08:06

स्थिर लग्न वृष: शाम 06:46 –रात्रि 08:43

इसमें काल चौघड़िया: सायं 05:26 –सायं 07:00 (अशुभ)

लाभ चौघड़िया: 07:00 – 08:34

विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस दिन अमावस्या तिथि सूर्यास्त के बाद केवल 29 मिनट रहेगी। इसके कारण पूजन का समय सीमित और कठिन है, क्योंकि इसमें अशुभ चौघड़िया का प्रभाव भी रहेगा।

महानिशीथ काल और स्थिर लग्न सिंह के समय, अमावस्या तिथि समाप्त हो चुकी होगी और शुक्ल प्रतिपदा प्रारंभ हो चुकी होगी। इसलिए 21 अक्टूबर को पूजा हेतु समय बहुत सीमित और असुविधाजनक रहेगा

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गुरु गोचर 2025: बृहस्पति की अतिचारी चाल से किसे मिलेगा लाभ, और किसे रहना होगा सावधान

ग्रहों की स्थिति और उनकी गति हमारे जीवन पर गहरा असर डालती है। इनमें सबसे शुभ माने जाने वाले देवगुरु बृहस्पति (Jupiter) इस समय अपनी अतिचारी गति में हैं। अतिचारी गति का अर्थ होता है जब कोई ग्रह अपनी सामान्य चाल से बहुत तेज गति करने लगे।

आम तौर पर गुरु एक वर्ष में केवल एक बार राशि परिवर्तन करते हैं, लेकिन साल 2025 में यह विशेष योग बन रहा है, जब गुरु बहुत कम समय में दो बार राशि परिवर्तन करेंगे।

पंचांग के अनुसार,

  • 14 मई 2025 को गुरु मिथुन राशि में प्रवेश कर चुके हैं।

  • 18 अक्टूबर 2025 को वे कर्क राशि में प्रवेश करेंगे।

  • और फिर 5 दिसंबर 2025 को वे दोबारा मिथुन राशि में लौट आएंगे।

यह असामान्य गति कई राशियों के जीवन में बड़े बदलाव लेकर आएगी — कुछ को उन्नति और खुशहाली मिलेगी, तो कुछ को थोड़ा संयम और सावधानी बरतनी होगी।

 मेष राशि (Aries): कार्य में प्रगति और नई शुरुआत


मेष राशि वालों के लिए यह समय उन्नति का रहेगा। कार्यक्षेत्र में सकारात्मक माहौल बनेगा और व्यापार में नई दिशा मिलेगी।

पुराने अधूरे कार्य पूरे होंगे और मित्रों से सहयोग प्राप्त होगा। सेहत अच्छी रहेगी और आत्मविश्वास बढ़ेगा।

 वृषभ राशि (Taurus): खर्चों में वृद्धि और आत्मसंयम की जरूरत


गुरु का यह गोचर वृषभ राशि के तृतीय भाव में होगा। इस दौरान आपके खर्चों में वृद्धि और आर्थिक अस्थिरता देखने को मिल सकती है। अनावश्यक चीजों पर खर्च बढ़ सकता है, जिससे मन में तनाव रहेगा।

शारीरिक थकान और कमजोरी भी महसूस हो सकती है। सलाह है कि बोलचाल में संयम रखें, क्योंकि कोई बात अनजाने में किसी को ठेस पहुँचा सकती है। परिवार और दोस्तों के साथ संबंध मधुर बनाए रखें।

 मिथुन राशि (Gemini): धन वृद्धि और मान-सम्मान में वृद्धि


मिथुन राशि के जातकों के लिए यह गोचर आर्थिक लाभ और पारिवारिक आनंद लेकर आएगा। यात्रा के योग बनेंगे और शुभ समाचार मिलने की संभावना है।

अधिकारियों का सहयोग मिलेगा, जिससे नौकरी में प्रमोशन या प्रतिष्ठा बढ़ सकती है।

 कर्क राशि (Cancer): नए अवसर और जीवन में सकारात्मक बदलाव


कर्क राशि के जातकों के लिए यह गोचर बहुत शुभ रहने वाला है, क्योंकि गुरु आपकी ही राशि में प्रवेश कर रहे हैं।
आपके व्यवसाय में नई ऊर्जा और रचनात्मकता आएगी। नौकरीपेशा लोगों के लिए प्रमोशन या नई जिम्मेदारी के संकेत हैं।

अगर आप सिंगल हैं, तो यह समय प्रेम या विवाह के नए अवसर लेकर आएगा। सोशल मीडिया या मित्रों के माध्यम से कोई खास व्यक्ति जीवन में आ सकता है।

 सिंह राशि (Leo): आलस्य से बचें, विरोधियों से सावधान रहें


सिंह राशि वालों के लिए यह समय थोड़ा चुनौतीपूर्ण रह सकता है। गुरु का प्रभाव आपके भीतर सुस्ती और लापरवाही बढ़ा सकता है। कामकाज में देरी और निर्णय लेने में उलझन रहेगी।

आपके विरोधी सक्रिय रह सकते हैं, इसलिए कार्यक्षेत्र में सावधानी जरूरी है। किसी पर भी आंख मूंदकर भरोसा न करें। खासतौर पर अपने राज़ या व्यक्तिगत बातें दूसरों से साझा न करें। वित्तीय निर्णय सोच-समझकर लें।

कन्या राशि (Virgo): आत्मविश्वास में वृद्धि और पारिवारिक सुख


कन्या राशि के लोगों के लिए यह गोचर सकारात्मक रहेगा। जीवनसाथी के साथ धार्मिक यात्रा या तीर्थ दर्शन के योग हैं। पुराने निवेश से लाभ मिल सकता है।

राहु-केतु की कृपा से आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा। परिवार में खुशी का माहौल रहेगा और कोई शुभ समाचार मिलने की संभावना है।

 तुला राशि (Libra): करियर में सफलता और नए अवसर


तुला राशि के लिए गुरु का यह गोचर दसवें भाव में हो रहा है, जो करियर और प्रतिष्ठा से जुड़ा है।
लंबे समय से रुका हुआ प्रमोशन या पदोन्नति अब संभव है। आपकी मेहनत रंग लाएगी और नए अवसरों का मार्ग खुलेगा।

व्यापारियों के लिए यह समय विस्तार का है, जबकि नौकरीपेशा लोग अपने कार्य से उच्च पदस्थ अधिकारियों को प्रभावित कर पाएंगे।

 वृश्चिक राशि (Scorpio): धन लाभ और पारिवारिक शांति


वृश्चिक राशि वालों के लिए गुरु का गोचर सुख और समृद्धि लेकर आएगा। परिवार के विवाद खत्म होंगे, व्यापार से जुड़ी यात्राएँ लाभदायक साबित होंगी।

समाज में आपका सम्मान बढ़ेगा और लंबे समय से रुके हुए कार्य अब पूरे होंगे। अचानक धन प्राप्ति के योग भी मजबूत हैं।


 धनु राशि (Sagittarius): भाग्य का साथ और नई ऊंचाइयाँ


धनु राशि वालों के लिए यह गोचर बहुत शुभ रहेगा। करियर, शिक्षा और विदेश यात्रा के नए अवसर मिलेंगे। पिता या गुरुजनों का सहयोग मिलेगा।

आर्थिक रूप से निवेश और बचत के लिए यह उत्तम समय है। धर्म, अध्यात्म और तीर्थयात्रा में रुचि बढ़ेगी। पारिवारिक जीवन में शांति बनी रहेगी।

 मकर राशि (Capricorn): रिश्तों में मिठास और साझेदारी में लाभ


मकर राशि के जातकों के लिए यह गोचर सातवें भाव में है, जो विवाह और साझेदारी से संबंधित होता है।
जीवनसाथी के साथ संबंध और भी मजबूत होंगे, और आपसी समझ बढ़ेगी।

व्यवसायिक साझेदारी से लाभ होगा और पार्टनर का पूरा सहयोग मिलेगा। रिश्तों में संतुलन बनाए रखें और दूसरों की भावनाओं का आदर करें।

 कुंभ राशि (Aquarius): सेहत और धन दोनों पर ध्यान दें


कुंभ राशि के जातकों के लिए गुरु का गोचर षष्ठ भाव में हो रहा है, जो शत्रुओं और रोगों से जुड़ा माना जाता है। इस समय मानसिक दबाव बढ़ सकता है और कार्यभार भी अधिक रहेगा।

किसी से उधार लेना या देना परेशानी का कारण बन सकता है। खान-पान में परहेज रखें और बाहर का तला-भुना खाना न खाएँ। योग और ध्यान से आपको राहत मिलेगी।

 मीन राशि (Pisces): रिश्तों में सुधार और व्यापारिक लाभ


मीन राशि के जातकों के लिए गुरु का गोचर वैवाहिक जीवन और साझेदारी में सुधार लाएगा। शादीशुदा लोगों के बीच प्यार और समझ बढ़ेगी।

व्यापारिक साझेदारी से लाभ मिलेगा। अविवाहितों को शादी के अच्छे प्रस्ताव मिल सकते हैं। धार्मिक प्रवृत्ति बढ़ेगी और विदेश यात्रा के अवसर बनेंगे।
हालांकि मानसिक तनाव से बचने के लिए योग या ध्यान करें।


✨ निष्कर्ष

गुरु गोचर 2025 हर राशि के लिए एक नया अध्याय लेकर आएगा। कुछ के लिए यह समय सफलता और सम्मान का द्वार खोलेगा, तो कुछ को धैर्य और संयम के साथ आगे बढ़ना होगा।

शुभ परिणाम पाने के लिए इस अवधि में गुरु मंत्र का जाप, पीले वस्त्र धारण करना, और गुरुवार को दान-पुण्य करना अत्यंत लाभकारी रहेगा।
याद रखें — ग्रहों की चाल चाहे जैसी हो, अगर आपका मन स्थिर और कर्म शुभ हैं, तो हर ग्रह आपके पक्ष में कार्य करता है। 🌼

🔮 अनुशंसित उपाय

  • बृहस्पति देव को प्रतिदिन पीले फूल चढ़ाएँ।

  • बृहस्पतिवार के दिन व्रत रखें।

  • “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें।

  • जरूरतमंदों को पीले वस्त्र या चना दान करें।

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मकर-संक्रान्ति गीत

   मकर-संक्रान्ति आई रे, ले आई उजियारा, सूरज बदले अपनी चाल, जग बोले जय-जयकारा। तिल-गुड़ की ये मिठास में, घुल जाए हर एक दूरी, दान, स्ना...